भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८५६ रामायणमीमांसा द्वाविंश महाभारत में काल-गणना अश्विनी आदि नक्षत्रों से न होकर कृत्तिका आदि से है । ( म० भा० अनु० ६४ और ८९) । मेष, वृषभ आदि राशियों का महाभारत में कहीं उल्लेख नहीं है । इससे यह समझा जाता है कि यूनानियों के सहवास से हिन्दुस्तान में मेष, वृष आदि राशियों के आने से पहले अर्थात् सिकन्दर से पहले ही महाभारत रचा गया होगा । इससे भी अधिक महत्त्व की बात है श्रवण आदि नक्षत्र-गणना के विषय की । महाभारत आदि पर्व ( ७१।३४) में कहा है कि विश्वामित्र ने श्रवण आदि की नक्षत्र-गणना आरम्भ की थी । टीकाकारों के अनुसार उस समय श्रवण से उत्तरायण का आरम्भ होता था । वेदाङ्गज्योतिष के समय धनिष्ठा से उत्तरायण आरम्भ होता था । वह काल शकसंवत्सर से १५०० वर्ष पूर्व होता है । ज्योतिर्गणित के अनुसार एक नक्षत्र पीछे हटने में उदगयन होने का काल शक के पहले ५०० वर्ष पूर्व आता है । उसी समय महाभारत बना होगा । भारतीय ज्योतिःशास्त्र में यही अनुमान किया गया है ( पृ० ८७-९०, १११।१४७ ) । किन्तु महाभारत में मेष, वृषभ आदि राशियों का उल्लेख नहीं है, अतः महाभारत बौधायन के पहले का ही है । बौद्ध धर्म बौद्ध ग्रन्थों से यह स्पष्ट है कि बुद्ध के समय चार वेद, वेदाङ्ग-व्याकरण, ज्योतिष आदि, इतिहास, निघण्टु आदि धर्मग्रन्थ प्रचलित हो चुके थे । बुद्ध अध्यात्मदृष्टि से अनात्मवादी थे । तथापि आचरण की दृष्टि से उपनिषदों के संन्यास धर्म से प्रभावित थे । पर अशोक के समय से बौद्ध भिक्षु जङ्गल में रहना छोड़कर प्रचार और परोपकार में लगे थे । महावग्ग ( ५।१।२७ ) में बुद्ध के एक शिष्य सोनकोलीविस की कथा में कहा है कि जो भिक्षु निर्वाणपद तक पहुँच चुका है उसके लिए न तो कोई काम ही अवशिष्ट रहता है और न किया हुआ कार्य ही भोगना पड़ता है । यह शुद्ध संन्यासमार्ग है “तस्य कार्यं न विद्यते” इस गीतावचन के समानार्थक है । बौद्धों के नये मत के प्रकट होने पर पुराने मत से झगड़ा हो गया । पुराने लोग अपने को थेरवाद स्थविर या वृद्ध पन्थ कहने लगे । नवीन पन्थ के लोग अपने मत को महायान तथा पुराने को हीनयान कहने लगे । अश्वघोष महायानपन्थ का था । इसलिए उसने सौन्दरनन्द ( १८।५४ ) में वर्णन किया है कि जब नन्द अर्हत् अवस्था में पहुँच गया तब बुद्ध ने उपदेश दिया था- “अवाप्तकार्योऽसि परां गतिं गतो न तेऽस्ति किञ्चत् करणीयमण्वपि । विहाय तस्मादिह कार्यमात्मनः कुरु स्थिरात्मन् परकार्यमप्यथो ॥” तेरा कार्य हो चुका, तुझे उत्तम गति मिल गयी । अब तेरे लिए तिल भर भी कर्म नहीं रहा, अतः अब तू अपना कार्य छोड़कर परकार्य कर । “तस्य कार्यं न विद्यते ॥” (गीता ३।१७) और “तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचार ।” (गीता ३।१९) इन गीतावचनों से मेल मिलता है । अतः मानना होगा कि अश्वघोष को ये सब तर्क गीता से ही मिले । बुद्धधर्मानुयायी तारानाथ ने अपने बुद्धधर्मविषयक इतिहाससम्बन्धी ग्रन्थ में, जो तिब्बती भाषा में लिखा है, कहा है-बौद्धों के पूर्वकालीन संन्यासमार्ग में महायान पन्थ ने जो कर्मविषयक सुधार किया था, उसे ज्ञानी श्रीकृष्ण और गणेश से महायान के पुरस्कर्ता नागार्जुन के गुरु राहुलभद्र ने जाना । इस ग्रन्थ का अनुवाद रूसी भाषा से जर्मनी भाषा में किया गया है । डा० केर्न ने १८९९ ई० में बुद्धधर्म पर एक पुस्तक लिखी थी । उसी से लोकमान्य तिलक ने यह अंश गीतारहस्य में लिखा है । संन्यासधर्मप्रधान बौद्धधर्म में कर्मप्रधान तथा भक्तिप्रधान महायान पन्थ की उत्पत्ति गीता से हुई थी ।