भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म वैदिक धर्म के पुत्र लोकमान्य के अनुसार यह बात निर्विवाद सिद्ध हो चुकी है कि जैनधर्म के समान ही बौद्धधर्म भी अपने वैदिक धर्म पिता का ही पुत्र है। अपनी सम्पत्ति का हिस्सा लेकर ये किसी कारण विभक्त हो गये। बुद्ध के अनुसार आत्मा ब्रह्म यथार्थ में कुछ नहीं है। केवल भ्रम है। इसलिए आत्मा अनात्मा के विचार या ब्रह्मचिन्तन के पचड़े में पड़कर किसी को अपना समय न खोना चाहिये। सब्बास्रवसूत्र (९।१३) बुद्ध के सिद्धान्त में दुःख, समुदय, निरोध और मार्ग ये चार आर्य सत्य मान्य हैं। संसार छोड़कर मन को निर्विषय तथा निष्काम करना ही मनुष्य का कर्तव्य है। बृहदारण्यक उपनिषद् (४।४।६) के इसी अंश को बुद्ध ने स्वीकार किया है। महानिर्वाणसुत्त (१-२४) के अनुसार सिद्ध है कि वैदिक हिंसात्मक यज्ञ आदि धर्म बुद्ध को अग्राह्य थे। केवल स्मार्त पञ्चमहायज्ञ, दान, परोपकार आदि आचरण गृहस्थ के धर्म ही बुद्ध को ग्राह्य थे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, सर्वभूतानुकम्पा, आत्मौपम्य, शौच तथा मन की पवित्रता आदि मान्य थे। जैनों के मतानुसार अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर थे, पर वे अध्यात्मवादी थे। लोकमान्य कहते हैं खाने की ही दृष्टि से जो प्राणी मारे न गये हों उनके पवत्त (संस्कृत प्रवृत्त) अर्थात् तैयार किये हुए मांस को स्वयं बुद्ध खाते थे और पवत्त मांस तथा मछलियाँ खाने की आज्ञा बौद्ध भिक्षुओं को भी दी गयी है। जैन और बौद्ध के पुराणादि वैदिक कथाओं के ही विकृत रूप हैं। अहिंसा, सत्य, दम आदि बहुत से ऐसे निवृत्तिमार्गीय धर्म वैदिक संन्यासियों और बौद्ध भिक्षुओं के समान रूप से वर्णित हैं। इसका कारण यही है कि वे सब अंश वैदिक धर्म के ही हैं। इतना ही नहीं दशरथजातक के समान वैदिक पुराण तथा इतिहास की सभी कथाओं का बौद्धधर्म के अनुसार रूपान्तर तैयार किया गया है। जैनों ने भी अपने अभिनव पुराणों में वैदिक कथाओं के ऐसे ही रूपान्तर किये हैं। सेल साहब ने लिखा है ईसा के अनन्तर प्रचलित मोहम्मदी धर्म में ईसा के चरित्र का इसी तरह विपर्यास किया गया है। पुरानी बाइबिल में सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय तथा नूह आदि कथाएँ प्राचीन खाल्दीजाति की धर्म-कथाओं के रूपान्तर हैं। उपनिषद्, प्राचीन धर्मसूत्र तथा मनुस्मृति में वर्णित कथाएँ तथा विचार बौद्ध ग्रन्थों में पाये जाते हैं। कई बार तो बिल्कुल शब्दशः वही के वही होते हैं। जय से वैर की वृद्धि होती है, वैर से वैर शान्त नहीं होता (म० भा० उद्योग० ६१।५९-६३)। क्रोध को शान्ति से जीतना चाहिये, विदुरनीति तथा महाभारत उद्योगपर्व (३८।७३)। यदि मेरी एक भुजा में चन्दन लगाया जाय और दूसरी काटकर अलग कर दी जाय तो मुझे दोनों बातें समान ही हैं (म० भा० ३२०।२६)। ये ही सब बातें धम्मपद (५।२२३) तथा मिलिन्दप्रश्न (७।३।५) में हैं। गीता और ईसाई-धर्म डॉक्टर लरिनसर ने गीता के जर्मन भाषानुवाद के अन्त में लिखा है कि गीता में नयी बाइबिल के एक सौ से अधिक शब्दसादृश्य पाये जाते हैं। जैसे उस दिन तुम जानोगे कि तुम अपने पिता में, तुम मुझमें और मैं तुम में हूँ (जान्० १४।२०)। "येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।" (गीता ४।३५) वे कहते हैं गीताकार बाइबिल से प्रभावित थे। ईसा से लगभग ५०० वर्षों बाद गीता बनी (इण्डियन एण्टीक्वेरी)। परन्तु जब पूर्वोक्त प्रमाणों से गीता का काल ईसा से ५०० वर्ष पूर्व सिद्ध होता है तो यही मानना होगा कि गीता से ही बाइबिलकार ने उन अंशों को बाइबिल में सङ्गृहीत किया है। अंग्रेजी ग्रन्थकार लिलि तथा फ्रेञ्च पण्डित एमिल बुर्नफ ने भी यही अनुमान किया है। बाइबिल में इस बात का कहीं भी वर्णन नहीं मिलता कि ईसा अपनी आयु के बारहवें वर्ष से तीस वर्ष तक क्या करता था और कहाँ था। इससे प्रकट है कि उसने यह समय धर्मचिन्तन और प्रवास में ज्ञानार्जन में बताया होगा।