भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 935

अतएव विश्वासपूर्वक यह कौन कह सकता है कि आयु के इस भाग में उनका बौद्ध भिक्षुओं से प्रत्यक्ष या पर्याय से कुछ भी सम्बन्ध हुआ न होगा। क्योंकि उस समय बौद्ध यतियों का दौरदौरा यूनान तक हो चुका था। नेपाल के बौद्धमठ के ग्रन्थ में स्पष्ट वर्णन है कि उस समय ईसा हिन्दुस्थान में आया था और वहाँ उसे बौद्धों से ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह ग्रन्थ निकोलुसनोटोविश नाम के एक रूसी के हाथ लग गया था। उसने फ्रेञ्च भाषा में इसका अनुवाद सन् १८९४ ई० में प्रकाशित किया था। ईसाई पण्डित कहते हैं कि नोटोविश का अनुवाद भले ही सच हो, परन्तु मूल ग्रन्थ का प्रणेता लफङ्गा था। जो भी हो, परन्तु ईसाई-धर्म का मूल बौद्ध धर्म और परम्परा से गीता और वैदिक धर्म ही हो सकता है। जब दो ग्रन्थों के सिद्धान्त एक से होते हैं तो समानता के बल पर यह कहना सम्भव नहीं होता कि अमुक ग्रन्थ पहले रचा गया और अमुक बाद में। क्योंकि यहाँ दो बातें सम्भव हो सकती हैं। इन दोनों ग्रन्थों में से पहले ग्रन्थ के विचार दूसरे ग्रन्थ से लिये गये हों अथवा दूसरे ग्रन्थ के विचार पहले से। अतएव जब दोनों ग्रन्थों के काल स्वतन्त्ररूप से निश्चित कर लिये जायँ तभी यह सम्भव है। दूसरे यह भी होता है कि दो विभिन्न देशों में दो ग्रन्थकारों को एक ही से विचारों का एक ही समय में अथवा आगे पीछे स्वतन्त्र रीति से सूझ पड़ना कोई अशक्य बात नहीं है। अतः वहाँ यह भी विचार करना पड़ता है कि वे स्वतन्त्ररूप से आविर्भूत होने योग्य हैं या नहीं और उन दोनों देशों में आवागमन द्वारा एक देश के विचारों का दूसरे देश में पहुँचना सम्भव था या नहीं। इस तरह चारों तरफ से विचार करने पर स्पष्ट विदित होता है कि ईसाई-धर्म से किसी भी बात का लिया जाना सम्भव नहीं। बल्कि गीता से ही बाइबिल में अनेक अंशों का सङ्कलन सम्भव है। ईसाई-धर्म का मूल यहूदियों की पुरानी बाइबिल है। अग्नि में पशु या अन्य वस्तुओं का हवन करना और ईश्वर के बनाये हुए नियमों का पालन कर के जिह्नोवा को सन्तुष्ट करना आदि से वह कर्म-प्रधान था। नयी बाइबिल उसका ही सुधारा हुआ रूपान्तर है। जैसे वैदिक यज्ञादि धर्मों के अनन्तर अहिंसा तथा ज्ञानप्रधान संन्यासधर्म का प्रादुर्भाव हुआ ऐसी पाश्चात्यों की धारणा है वैसे ही कर्म-प्रधान यहूदियों के धर्म में भी अहिंसा तथा ज्ञानप्रधान ईसाई-धर्म का उद्भव हुआ है ऐसा क्यों न माना जाय ? कई लोग पाईथा गोरस के तत्त्वज्ञान का प्रभाव बाइबिल पर मानते हैं। परन्तु उसकी अपेक्षा बौद्ध धर्म से ही इसमें समता है। जैसे ईसा को भ्रम में फँसाने का शैतान ने प्रयत्न किया वैसे ही बुद्ध को सिद्धावस्था प्राप्ति में अनेक विघ्न उत्पन्न हुए। जैसे ईसा ने ४० दिन तक उपवास किया, वैसे ही ४९ दिन तक बुद्ध निराहार रहे। जब बौद्ध धर्म की निर्विवाद प्राचीनता सिद्ध है। तब ईसाई तथा बौद्ध धर्म में दिखनेवाले साम्य के सम्बन्ध में दो ही पक्ष रह जाते हैं। वह साम्य स्वतन्त्र रीति से दोनों ओर उत्पन्न हो अथवा इन तत्त्वों को ईसा ने या ईसा के शिष्यों ने बौद्धधर्म से लिया हो। प्रो० हिसडेविड्स के अनुसार बुद्ध और ईसा की परिस्थिति एक सी होने के कारण दोनों ओर यह सादृश्य अपने आप स्वतन्त्र रीति से हुआ है। परन्तु विचार करने से यह ठीक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि जब कोई बात किसी स्थान में स्वतन्त्ररूप से उत्पन्न होती है, तब उसका प्रचार सदैव क्रमशः होता है। उदाहरणस्वरूप जैसे वैदिक कर्मकाण्ड से ज्ञानकाण्ड, भक्ति, पातञ्जलयोग, अन्त में बौद्धधर्म का उदय हुआ। परन्तु कर्ममय यहूदी-धर्म से एकाएक संन्यासप्रधान ईसाई-धर्म का