रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८५९ उदय कैसे हो सकता है ? अतः उसमें किसी बाहरी शक्ति का हाथ अवश्य ही मानना चाहिये । बौद्ध धर्म के साथ ईसाई-धर्म की पूर्ण समता दिखायी देती है । वैसी समता का स्वतन्त्र रीति से उत्पन्न होना सम्भव नहीं है । यदि बौद्ध धर्म से उसका सम्बन्ध होना असम्भव होता तो दूसरी बात थी । परन्तु प्रकृत में तो इतिहास से सिद्ध होता है कि सिकन्दर के समय ही नहीं, अशोक के समय भी यूनान तक बौद्ध भिक्षुओं का सञ्चार हो रहा था । बाइबिल-काल मेथ्यू (२।१) में यह वर्णन है कि जब ईसा पैदा हुआ तब पूर्व की ओर से कुछ ज्ञानी पुरुष यरूशलम गये थे । उस समय बौद्ध धर्म काश्मीर, काबुल, ईरान तथा तुर्किस्तान तक पहुँचा था । अतः वे ज्ञानी बौद्ध ही हो सकते हैं । अतः भक्तियुक्त संन्यास प्रधान बौद्धधर्म से ही ईसाई धर्म का विकास होना सम्भव है । बौद्ध धर्म का मुख्य स्रोत वैदिक धर्म है । यह भी स्पष्ट ही है, अतः वैदिक धर्म उपनिषद्, गीता आदि से ही बौद्ध धर्म एवं बौद्ध धर्म से ही ईसाई-धर्म में भक्ति, ज्ञान आदि का आविर्भाव हुआ है। पूर्वोक्त उद्धरणों से स्पष्ट ही प्रतीत होता है कि बौद्ध धर्म के आचरण-सम्बन्धी आधार वैदिक ही हैं । लोकमान्य तिलक ने अपने गीता-रहस्य ग्रन्थ में पूर्वोक्त रीति से पाश्चात्यों की शैली से गीता का काल ईसा से ५०० वर्ष पूर्व बतलाया है । उनके अनुसार बुद्ध-निर्वाण के बाद तथा शक से ५०० वर्ष पहले महाभारत का निर्माण हुआ था । किन्तु उनका यह निर्णय भी पाश्चात्य-प्रभाव से ही प्रभावित है । भारतीय शास्त्रीय दृष्टिकोण से महाभारत का ही काल ईसा से तीन हजार वर्ष से भी प्राचीन है । गीता का तो सुतरां महाभारत से भी प्राचीन काल है । सर विलियम जोन्स, जनरल प्रिंसेप, जनरल कनिङ्घम आदि पाश्चात्य विद्वानों ने महाभारत का युद्धकाल लगभग १७०० वर्ष पीछे हटाया है । पर यह विचार भ्रमपूर्ण ही है । उसका आधार है मेगस्थनीज की पुस्तक में लिखित सैण्ड्राकोटस को मौर्य चन्द्रगुप्त और उसकी राजधानी पालिबोथ्रा को पाटलिपुत्र मान लेना और उसी के समर्थन के लिए अशोक की धर्मलिपियों के प्रज्ञापन दूसरे और तेरहवें में अन्तियोकस आदि पश्चिम भारत के पाँच राज्यों में यूनान देश के पाँच राजाओं के नामों की कल्पना की गयी है । इस भ्रान्ति के पोषण के लिए महाभारत के युद्धकाल से लेकर मौर्य चन्द्रगुप्त अथवा अशोकवर्धन के समय तक जितने राजा हुए हैं, जिनकी राजवंशावलियाँ उनके राजत्वकाल के सहित हमारे पुराणों में स्पष्ट पायी जाती हैं, उन राजवंशावलियों के राजत्वकालों के अशुद्ध पाठों के आधार पर मनमाना अर्थ किया गया है। उनके अनुयायी भारतीय विद्वानों ने भी उसी का समर्थन किया है। परीक्षित् के जन्म से महापद्म के अभिषेक तक बार्हद्रथों के १००० वर्ष, प्रद्योतों के १३८ वर्ष और शिशुनाकों के ३६२ वर्ष सब मिलाकर १५०० वर्ष होते हैं । "महापद्माभिषेकात्तु यावज्जन्म परीक्षितः । एकवर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पञ्चशतोत्तरम् १ ।। (म० पु० १७२।४५) कलियुगारम्भ विक्रम संवत् पूर्व ३०४५ और ईसवी सन् पूर्व ३१०२ का समय है। महापद्मनन्द का अभिषेक काल युधिष्ठिर स० १५०१, विक्रम पूर्व १५४५ एवं ई० सन् पू० १६०२ प्रमाणित होता है । चन्द्रगुप्त मौर्य का राजत्वकाल कलि सं० १६०१, विक्रम पूर्व १४४५, ई० पू० १५०२ से कलि सं० १६२५ विक्रम सं० पु० १४२१ १. पञ्चाशदुत्तरमित्येव पाठो लभ्यते ।