रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 947, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिरोहि पूर्णपाल के वसन्तगढ़ीय लेख में १०९९ विक्रम संवत् का उल्लेख है—'नवनवतिरिहासीद् विक्रमादित्यकाले ।' विद्वानों का मत है कि कृत, मालवा तथा विक्रम नाम से प्रख्यात संवत् एक ही है । यहाँ प्रश्न होता है कि यदि विक्रम ही इस संवत् के स्थापक हैं तो पहले ही से इनके नाम से इसकी प्रख्याति क्यों नहीं हुई ? पहले कृत नाम से, फिर मालव नाम से और फिर विक्रम नाम से प्रख्याति क्यों हुई ? इसका समाधान यह हो सकता है कि विक्रमादित्य मालवगण के प्रमुख थे, निरङ्कुश राजा नहीं थे । अतः उन्होंने मालव संवत् की ही स्थापना की होगी । अपने नाम से ही संवत् स्थापन करने में गणभेद की सम्भावना हो सकती थी । मालवगण के द्वारा बर्बर शकों के पराजित होने पर शान्तियुग का समय आया होगा । जनता में शान्ति और समृद्धि का युग होने के कारण उसे पहले कृत नाम से कहा जाने लगा, परन्तु विक्रम राज्यारोहण से १३५ वर्ष बाद शक फिर से विजयी हो गये थे जैसा कि 'प्रभावकचरित' में उल्लेख है— 'ततो वर्षशते पञ्चत्रिंशता साधिके पुनः तस्य राज्ञोऽन्वयं हत्वा वत्सरः स्थापितः शकैः ।' परन्तु मालवगण का विजयी शकों से सङ्घर्ष बना ही था । फिर भी मालवगण जीवित था । तब कृत काल तो स्वप्नप्राय ही हो गया, अतः अब मालवगण नाम से वही संवत्सर चलने लगा । चौथी शती पूर्वार्ध में गुप्तसाम्राज्य के वृद्धिगत होने पर भी मालवशक्ति विद्यमान थी ही । सम्राट् समुद्र गुप्त ने मालवगण को पराजित करके छोड़ दिया था । इसी लिए समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति में गणतन्त्र-नामावली में मालव का प्रथम नाम है । “मालवार्जुनायनयौधेयभाद्रकाभीरप्रार्जुनसनकानीककाकखर्परिकादिगणानुन्मूल्य साम्राज्यसीमा विस्तारिता पश्चात् महत्त्वमाकाङ्क्षमाणेण द्वितीयचन्द्रगुप्तेन ।” पश्चात् द्वितीय चन्द्रगुप्त ने पूर्वोक्त गणों का उन्मूलन करके अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ायी थी । गुप्त राजाओं ने भी गुप्तसंवत् चलाया था, परन्तु विक्रमादित्य की न्यायप्रियता का प्रभाव जनमानस में बद्धमूल था । अतः गुप्तशासनकाल में भी प्रजा ने विक्रमसंवत्सर का ही आदर किया था । अतः महान् सम्राट् कुमार- गुप्त ने अपने अभिलेख में मालव-संवत्सर का ही उल्लेख किया । फलतः गुप्तसाम्राज्य समाप्त होने पर मालवीय प्रजा फलतः विक्रम संवत् को ही दृढ़ता से ग्रहण करती रही । आठवीं शती में भारत में निरङ्कुश राजतन्त्र की स्थापना हुई । गणतन्त्र की भावना जनमानस से लुप्त हो गयी तब लोकप्रिय प्रभविष्णु विक्रमादित्य सम्राट् के नाम से वही संवत्सर प्रसिद्ध हो गया । प्रारम्भिक शताब्दियों में विक्रम संवत् जैसे विक्रम नाम से प्रख्यात नहीं हुआ, वैसे ही शक-संवत् भी स्वस्थापना से ५०० वर्ष बाद शकनाम से प्रचलित हुआ । सन् संवत् भी स्वप्रचलन से पाँच छः सौ वर्ष बाद ईसा के नाम से सम्बद्ध हुआ था । गुप्त संवत् २२१ वर्ष तक गुप्त नाम से निर्दिष्ट नहीं होता था । हाल प्रतिष्ठान के राजा ( सातवाहन ) प्रथम शती में विद्यमान थे । उन्होंने गाथा-सप्तशती में विक्रमा- दित्य का उल्लेख किया है । “संवाहण सुहरसतो सियेण दन्तेण तुह करे लक्खरूयं चललेण विक्कमा इव चरियम् अणु सिक्खियम् तिस्सा ।” टीकाकार गदाधर के अनुसार “विक्रमादित्योऽपि भृत्यकृत्येन तुष्टः सन् भृत्यस्य करे लक्षं ददाति स्म ।” अर्थात् विक्रमादित्य भृत्य के कार्य से तुष्ट होकर उसके हाथ में लक्ष मुद्रा देते थे । बृहत्कथा के अनुसार भी विक्रमादित्य ईसवीय सन् से पहले के ही हैं । गुणाढ्य ने पिशाची भाषा में बृहत्कथा लिखी थी । गुणाढ्य सात- वाहन की सभा के अलङ्कार थे । अतः सातवाहन के समकालीन ही थे । बृहत्कथा का अनुवाद काश्मीरपरम्परा में ११वीं शती के क्षेमेन्द्र ने बृहत्कथामञ्जरी के नाम से किया था ।