रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 946, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६९ का गण था । शिवप्रसाद से ही जैसे उसने अन्य चमत्कारपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त की थीं वैसे ही भावी अग्निप्रवेश का भी ज्ञान एवं उल्लेख उसके द्वारा सम्भव है । भावी वृत्तान्त का निर्देश भी सौकर्य-द्योतन के लिए परोक्ष अतीत रूप से किया जाता है । तभी तो 'व्योतेने किरणावलीमुदयनः' प्रयोग हुआ है । किरणावलीकार ग्रन्थ के आरम्भ में ही कहते हैं—'व्यातेने किरणावलीम्' किरणावली का निर्माण मेरे लिए इतना सुकर है कि समझ लेना चाहिये कि उदयन ने किरणावली का निर्माण किया और इतने अनायास से किया कि उसको भी नहीं ज्ञात हुआ । कवि दण्डी भी शूद्रक का वैसा ही स्मरण करते हैं । वे हर्षचरित के टीकाकार रङ्गनाथ अग्निमित्र को ही शूद्रक मानते हैं। वही समरों में आदित्यवत् प्रकाशमान होने में विक्रमादित्य की संज्ञा को प्राप्त हुए थे । उनकी ऐतिहासिकता में उनका प्रचलित विक्रमीय संवत् ही परम प्रमाण है । वह युधिष्ठिरसंवत्, कलिसंवत्, बुद्धसंवत्, वीरसंवत् आदि सबसे अधिक प्रसिद्ध है । विशेषतः आसेतु हिमाचल वैदिक सम्प्रदाय तथा पञ्चाङ्गों में उसी का सर्वाधिक प्राधान्य है । कहा जाता है कि जो पर्याप्त सुवर्णदान के द्वारा भूतल में सभी का ऋण उतार देता है । वही संवत्सर की स्थापना कर सकता है । वीर विक्रमादित्य के सम्बन्ध में जैनसम्प्रदाय में ऐसी ही प्रसिद्धि है । प्रभावकचरित्र नामक ग्रन्थ में निम्नोक्त श्लोक मिलते हैं— “शकानां वंशमुच्छेद्य कालेन कियतापि हि । राजा श्रीविक्रमादित्यः सार्वभौमोपमोऽभवत् ।। स चोन्नतमहासिद्धिसौवर्णपुरुषोदयात् । मेदिनीमनृणां कृत्वाऽचीकरद् वत्सरं निजम् ।।” अर्थात् कुछ ही काल में शकों का वंशोच्छेद कर राजा विक्रमादित्य सार्वभौम तुल्य हो गये थे । उनकी महासिद्धि से सौवर्ण पुरुष का उदय होने से सम्पूर्ण मेदिनी को अनृण कर के उन्होंने अपना संवत्सर चलाया था । फिर भी कुछ लोगों का आक्षेप है कि यह संवत् अपने प्रारम्भ की शताब्दियों में विक्रम के नाम से सम्बद्ध नहीं था । उस समय के ज्योतिषियों ने अपने ग्रन्थों में शक संवत्सर का ही प्रयोग किया है, विक्रम संवत् का नहीं । साथ ही राजस्थान आदि तत्समीपवर्ती प्रान्तों में प्राप्त लेखों में कृत नाम से इस संवत् का उल्लेख है । उदयपुर में नन्दसायूपाभिलेख में कृत संवत् २८२ तथा चैत्र पूर्णिमा तिथि का उल्लेख है— “कृतयोर्द्वयोर्वर्षशतयोः द्व्यशीत्योः चैत्रपूर्णमास्याम् ।” राजस्थान के कोटाराज्य में उपलब्ध बडवायूपाभिलेख में कृत संवत् २९५ का उल्लेख है । मालव में उप- लब्ध दशपुर ( मंदसौर ) के अभिलेख में कृत संवत् और मालव संवत् —“श्रीमालवगणाम्नाते प्रशस्ते कृतसंज्ञके ।” कुमारगुप्त के दशपुराभिलेख में मालवगण संवत् दिया है— “मालवगणस्थितिवशात् कालज्ञानाय लिखितेषु ।” कोटाराज्य में उपलब्ध किसी शिवगणाभिधेय ने कनस्वामिलेख में मालवेश से संवत् का उल्लेख किया है— ‘ संवत्सरशतैर्याते''''मालवेशानाम् ।’ चण्डमहासेन के धौलपुर के अभिलेख में ८९८ विक्रम संवत् का उल्लेख है—‘‘वसुनवाष्टौ वर्षगतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य ।” विद्दग्धराज के बीजापूरीय लेख में ९७३ विक्रमकाल का उल्लेख है—“विक्रमकाले गते ।” बोधगया के लेख में विक्रम संवत् १००५ का उल्लेख है। उदयपुर के राज्य में नरवाहन नामक एकलिङ्ग के अभिलेख में विक्रमादित्य संवत् १०२८ का उल्लेख है— “विक्रमादित्यभूपतः अष्टाविंशतियुक्ते शते दशगुणे सति ।”