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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६९ का गण था । शिवप्रसाद से ही जैसे उसने अन्य चमत्कारपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त की थीं वैसे ही भावी अग्निप्रवेश का भी ज्ञान एवं उल्लेख उसके द्वारा सम्भव है । भावी वृत्तान्त का निर्देश भी सौकर्य-द्योतन के लिए परोक्ष अतीत रूप से किया जाता है । तभी तो 'व्योतेने किरणावलीमुदयनः' प्रयोग हुआ है । किरणावलीकार ग्रन्थ के आरम्भ में ही कहते हैं—'व्यातेने किरणावलीम्' किरणावली का निर्माण मेरे लिए इतना सुकर है कि समझ लेना चाहिये कि उदयन ने किरणावली का निर्माण किया और इतने अनायास से किया कि उसको भी नहीं ज्ञात हुआ । कवि दण्डी भी शूद्रक का वैसा ही स्मरण करते हैं । वे हर्षचरित के टीकाकार रङ्गनाथ अग्निमित्र को ही शूद्रक मानते हैं। वही समरों में आदित्यवत् प्रकाशमान होने में विक्रमादित्य की संज्ञा को प्राप्त हुए थे । उनकी ऐतिहासिकता में उनका प्रचलित विक्रमीय संवत् ही परम प्रमाण है । वह युधिष्ठिरसंवत्, कलिसंवत्, बुद्धसंवत्, वीरसंवत् आदि सबसे अधिक प्रसिद्ध है । विशेषतः आसेतु हिमाचल वैदिक सम्प्रदाय तथा पञ्चाङ्गों में उसी का सर्वाधिक प्राधान्य है । कहा जाता है कि जो पर्याप्त सुवर्णदान के द्वारा भूतल में सभी का ऋण उतार देता है । वही संवत्सर की स्थापना कर सकता है । वीर विक्रमादित्य के सम्बन्ध में जैनसम्प्रदाय में ऐसी ही प्रसिद्धि है । प्रभावकचरित्र नामक ग्रन्थ में निम्नोक्त श्लोक मिलते हैं— “शकानां वंशमुच्छेद्य कालेन कियतापि हि । राजा श्रीविक्रमादित्यः सार्वभौमोपमोऽभवत् ।। स चोन्नतमहासिद्धिसौवर्णपुरुषोदयात् । मेदिनीमनृणां कृत्वाऽचीकरद् वत्सरं निजम् ।।” अर्थात् कुछ ही काल में शकों का वंशोच्छेद कर राजा विक्रमादित्य सार्वभौम तुल्य हो गये थे । उनकी महासिद्धि से सौवर्ण पुरुष का उदय होने से सम्पूर्ण मेदिनी को अनृण कर के उन्होंने अपना संवत्सर चलाया था । फिर भी कुछ लोगों का आक्षेप है कि यह संवत् अपने प्रारम्भ की शताब्दियों में विक्रम के नाम से सम्बद्ध नहीं था । उस समय के ज्योतिषियों ने अपने ग्रन्थों में शक संवत्सर का ही प्रयोग किया है, विक्रम संवत् का नहीं । साथ ही राजस्थान आदि तत्समीपवर्ती प्रान्तों में प्राप्त लेखों में कृत नाम से इस संवत् का उल्लेख है । उदयपुर में नन्दसायूपाभिलेख में कृत संवत् २८२ तथा चैत्र पूर्णिमा तिथि का उल्लेख है— “कृतयोर्द्वयोर्वर्षशतयोः द्व्यशीत्योः चैत्रपूर्णमास्याम् ।” राजस्थान के कोटाराज्य में उपलब्ध बडवायूपाभिलेख में कृत संवत् २९५ का उल्लेख है । मालव में उप- लब्ध दशपुर ( मंदसौर ) के अभिलेख में कृत संवत् और मालव संवत् —“श्रीमालवगणाम्नाते प्रशस्ते कृतसंज्ञके ।” कुमारगुप्त के दशपुराभिलेख में मालवगण संवत् दिया है— “मालवगणस्थितिवशात् कालज्ञानाय लिखितेषु ।” कोटाराज्य में उपलब्ध किसी शिवगणाभिधेय ने कनस्वामिलेख में मालवेश से संवत् का उल्लेख किया है— ‘ संवत्सरशतैर्याते''''मालवेशानाम् ।’ चण्डमहासेन के धौलपुर के अभिलेख में ८९८ विक्रम संवत् का उल्लेख है—‘‘वसुनवाष्टौ वर्षगतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य ।” विद्दग्धराज के बीजापूरीय लेख में ९७३ विक्रमकाल का उल्लेख है—“विक्रमकाले गते ।” बोधगया के लेख में विक्रम संवत् १००५ का उल्लेख है। उदयपुर के राज्य में नरवाहन नामक एकलिङ्ग के अभिलेख में विक्रमादित्य संवत् १०२८ का उल्लेख है— “विक्रमादित्यभूपतः अष्टाविंशतियुक्ते शते दशगुणे सति ।”

सिरोहि पूर्णपाल के वसन्तगढ़ीय लेख में १०९९ विक्रम संवत् का उल्लेख है—'नवनवतिरिहासीद् विक्रमादित्यकाले ।' विद्वानों का मत है कि कृत, मालवा तथा विक्रम नाम से प्रख्यात संवत् एक ही है । यहाँ प्रश्न होता है कि यदि विक्रम ही इस संवत् के स्थापक हैं तो पहले ही से इनके नाम से इसकी प्रख्याति क्यों नहीं हुई ? पहले कृत नाम से, फिर मालव नाम से और फिर विक्रम नाम से प्रख्याति क्यों हुई ? इसका समाधान यह हो सकता है कि विक्रमादित्य मालवगण के प्रमुख थे, निरङ्कुश राजा नहीं थे । अतः उन्होंने मालव संवत् की ही स्थापना की होगी । अपने नाम से ही संवत् स्थापन करने में गणभेद की सम्भावना हो सकती थी । मालवगण के द्वारा बर्बर शकों के पराजित होने पर शान्तियुग का समय आया होगा । जनता में शान्ति और समृद्धि का युग होने के कारण उसे पहले कृत नाम से कहा जाने लगा, परन्तु विक्रम राज्यारोहण से १३५ वर्ष बाद शक फिर से विजयी हो गये थे जैसा कि 'प्रभावकचरित' में उल्लेख है— 'ततो वर्षशते पञ्चत्रिंशता साधिके पुनः तस्य राज्ञोऽन्वयं हत्वा वत्सरः स्थापितः शकैः ।' परन्तु मालवगण का विजयी शकों से सङ्घर्ष बना ही था । फिर भी मालवगण जीवित था । तब कृत काल तो स्वप्नप्राय ही हो गया, अतः अब मालवगण नाम से वही संवत्सर चलने लगा । चौथी शती पूर्वार्ध में गुप्तसाम्राज्य के वृद्धिगत होने पर भी मालवशक्ति विद्यमान थी ही । सम्राट् समुद्र गुप्त ने मालवगण को पराजित करके छोड़ दिया था । इसी लिए समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति में गणतन्त्र-नामावली में मालव का प्रथम नाम है । “मालवार्जुनायनयौधेयभाद्रकाभीरप्रार्जुनसनकानीककाकखर्परिकादिगणानुन्मूल्य साम्राज्यसीमा विस्तारिता पश्चात् महत्त्वमाकाङ्क्षमाणेण द्वितीयचन्द्रगुप्तेन ।” पश्चात् द्वितीय चन्द्रगुप्त ने पूर्वोक्त गणों का उन्मूलन करके अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ायी थी । गुप्त राजाओं ने भी गुप्तसंवत् चलाया था, परन्तु विक्रमादित्य की न्यायप्रियता का प्रभाव जनमानस में बद्धमूल था । अतः गुप्तशासनकाल में भी प्रजा ने विक्रमसंवत्सर का ही आदर किया था । अतः महान् सम्राट् कुमार- गुप्त ने अपने अभिलेख में मालव-संवत्सर का ही उल्लेख किया । फलतः गुप्तसाम्राज्य समाप्त होने पर मालवीय प्रजा फलतः विक्रम संवत् को ही दृढ़ता से ग्रहण करती रही । आठवीं शती में भारत में निरङ्कुश राजतन्त्र की स्थापना हुई । गणतन्त्र की भावना जनमानस से लुप्त हो गयी तब लोकप्रिय प्रभविष्णु विक्रमादित्य सम्राट् के नाम से वही संवत्सर प्रसिद्ध हो गया । प्रारम्भिक शताब्दियों में विक्रम संवत् जैसे विक्रम नाम से प्रख्यात नहीं हुआ, वैसे ही शक-संवत् भी स्वस्थापना से ५०० वर्ष बाद शकनाम से प्रचलित हुआ । सन् संवत् भी स्वप्रचलन से पाँच छः सौ वर्ष बाद ईसा के नाम से सम्बद्ध हुआ था । गुप्त संवत् २२१ वर्ष तक गुप्त नाम से निर्दिष्ट नहीं होता था । हाल प्रतिष्ठान के राजा ( सातवाहन ) प्रथम शती में विद्यमान थे । उन्होंने गाथा-सप्तशती में विक्रमा- दित्य का उल्लेख किया है । “संवाहण सुहरसतो सियेण दन्तेण तुह करे लक्खरूयं चललेण विक्कमा इव चरियम् अणु सिक्खियम् तिस्सा ।” टीकाकार गदाधर के अनुसार “विक्रमादित्योऽपि भृत्यकृत्येन तुष्टः सन् भृत्यस्य करे लक्षं ददाति स्म ।” अर्थात् विक्रमादित्य भृत्य के कार्य से तुष्ट होकर उसके हाथ में लक्ष मुद्रा देते थे । बृहत्कथा के अनुसार भी विक्रमादित्य ईसवीय सन् से पहले के ही हैं । गुणाढ्य ने पिशाची भाषा में बृहत्कथा लिखी थी । गुणाढ्य सात- वाहन की सभा के अलङ्कार थे । अतः सातवाहन के समकालीन ही थे । बृहत्कथा का अनुवाद काश्मीरपरम्परा में ११वीं शती के क्षेमेन्द्र ने बृहत्कथामञ्जरी के नाम से किया था ।

अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल ८७१ दूसरा अनुवाद सोमदेव ने कथासरित्सागर नाम से किया है। क्षेमेन्द्र ने यद्यपि लम्बकों के पौर्वापर्य में कुछ स्वातन्त्र्य का भी अवलम्बन किया था, किन्तु सोमदेव तो कहते हैं — मैं यथामूल ही लिख रहा हूँ। इसमें किञ्चित् भी मूल का अतिक्रम नहीं है— “यथा मूलं तथैवैतत् न मनागप्यतिक्रमः ।” नेपालपरम्परा में आठवीं शती से भी पूर्व बुद्धस्वामी ने श्लोकसंग्रह नाम से बृहत्कथा का अनुवाद किया था। उस बृहत्कथा में कहा गया है कि भगवान् शिव का माल्यवान् नामक गण ही उनके आज्ञानुसार विक्रमादित्य के रूप में आया था। ऋषि सर्वज्ञकल्प होते हैं, अतः विक्रम से कई सौ वर्ष पूर्व नरवाहनदत्त को कण्व द्वारा विक्रम की कथा सुनाना असम्भव नहीं है। जैन मेरुतुङ्गाचार्य ने अपने विचारश्रेणी नामक प्राकृत ग्रन्थ में विशाला (उज्जयिनी) के इतिहास का वर्णन करते हुए कहा है कि महावीरनिर्वाण ईस्वी सन् प्रारम्भ से ५२७ वर्ष पूर्व हुआ था। महावीरनिर्वाण के ४७० वर्षों के पश्चात् शकों का उन्मूलनकर मालव के राजा विक्रमादित्य उदित होंगे— “कालान्तरेण केण वि उप्पाडिता सगाणतं वंशं हो हि । मालव राया नामेण विक्कमा इच्छो ॥” ज्योतिर्विदों की परम्परा में भी संवत्सरकर्त्ता के रूप से विक्रमादित्य का स्मरण होता है— “युधिष्ठिरो विक्रमशालिवाहनौ नराधिनाथौ विजयाभिनन्दनः । इमे तु नागार्जुनमेदिनीविभुर्बली क्रमात् षट् शककारकाः कलौ ॥” संवत् १६९९ की लिखित अभिज्ञानशाकुन्तल की प्रति में निम्न वाक्य है— “आर्ये, रसभावविशेषदीक्षागुरोः श्रीविक्रमादित्यसाहसाङ्कस्य अभिरूपपण्डितभूयिष्ठेयं परिषद् । अस्यां च कालिदासप्रयुक्तेन अभिज्ञानशाकुन्तलनाम्ना नवेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः ।” इसमें स्पष्ट ही विक्रमादित्य की पण्डितभूयिष्ठा परिषद् में कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल के अभिनय की बात कही गयी है। कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण में उसके निर्माण का काल कलि संवत् ३०६८ वैशाख कहा गया है— “वर्षेः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणैर्यति कलौ सम्मिते । मासे माधवसंज्ञिते च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः ॥” यह कलि का ५०७३ व्यतीत संवत् है और विक्रमराज्य से २०२९ गताब्द हैं। इस तरह विक्रमादित्य के सिंहासनारोहण से २४ वर्ष बाद २५वें वर्ष के वैशाख में इस ग्रन्थ की रचना प्रारम्भ हुई है। “काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततः कियदहो श्रुतिकर्मवादः । ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो द्विजतो बभूव ॥” इस श्लोक से स्पष्ट है कि कालिदास की कृतियों में रघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत काव्यत्रय तथा कोई मीमांसाग्रन्थ श्रुतिकर्मवाद एवं ज्योतिर्विदाभरण प्रधान ग्रन्थ हैं। कालिदास ने विक्रमादित्य के सभासदों की गणना भी वहीं बतायी है— “शङ्कुः सुवाग् वररुचिर्मणिरङ्गदत्तो जिष्णुस्त्रिलोचनहरी घटखर्पराख्यः । अन्येऽपि सन्ति कवयोऽमरसिंहपूर्वा यस्यैव विक्रमनृपस्य सभासदोऽमी ॥”

८७२ रामायणमीमांसा द्वाविंश उसी ग्रन्थ में विक्रमसभा के नवरत्नों की भी गणना है— “धन्वन्तरिक्षपणकामरसिंहशङ्कुवेतालभट्टघटखर्परकालिदासाः । ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥” उपर्युक्त वचनों में धन्वन्तरि १, क्षपणक २, अमरसिंह ३, शङ्कु ४, वेतालभट्ट ५, घटखर्पर ६, कालिदास ७, वराहमिहिर ८ वररुचि ९ ये विक्रमादित्य की सभा के नौ रत्न हैं। पहले श्लोक में मणि, अङ्गदत्त, विष्णु, त्रिलोचन और हरि अन्य विद्वानों के नाम हैं। ११७३ के महाराज लक्ष्मणसेन के सभापण्डित कवि धोयी ने जिनकी चर्चा जयदेव ने धोयीकविक्ष्मापतिः कहकर की है, अपने को वररुचि के तुल्य प्रशंसित बतलाते हुए वररुचि की चर्चा की है— “ख्यातो यश्च श्रुतधरतया विक्रमादित्यगोष्ठी- विद्याभर्तुः खलु वररुचेराससाद प्रतिष्ठाम् ॥” कथासरित्सागर में वररुचि को सकृच्छ्रुतधर कहा गया है। जिनप्रभसूरि विरचित विविधतीर्थकल्प ग्रन्थ की अनुश्रुति के अनुसार सिद्धसेन दिवाकर के आज्ञानुसार वररुचि ने विक्रमादित्य की शासनपट्टिका (जिसमें विक्रमादित्य के शासन सिद्धान्त का निर्देश है) विक्रम प्रथम संवत् के चैत्रशुक्ल प्रतिपदा तिथि में लिखी है। जिनप्रभ ने स्वयं उसे देखा था। कात्यायन ही वररुचि हैं। वे स्वयं पत्रकौमुदी ग्रन्थ में लिखते हैं— “विक्रमादित्यभूपस्य कीर्तिसिद्धेर्निदेशतः । श्रीमान् वररुचिर्धीमान् तनोति पत्रकौमुदीम् ॥” विक्रमसभा के नवरत्नों में ८वें वराहमिहिर हैं। प्रसिद्ध पञ्चतन्त्र नीति ग्रन्थ का पारसी भाषा में अनुवाद ईसा की पाँचवीं शती में हुआ है, यह निर्विवाद है। उस पञ्चतन्त्र में मित्रभेद-प्रसङ्ग में वराहमिहिर का नाम ग्रहणपूर्वक उनके चार श्लोक उद्धृत हैं। “रोहिणीशकटमर्कनन्दनश्चेद् भिनत्ति रुधिरोऽथवा शशी । किं वदामि तदनिष्टसागरे सर्वलोक उपयाति संक्षयम् ॥” इत्यादि । ग्रन्थ खण्डखाद्य की आमराजकृत टीका में लिखा है— “नवाधिकपञ्चशतसंख्याके शके वराहमिहिरो दिवं गतः ।” अर्थात् ५०९ शक संवत्सर में वराहमिहिर स्वर्ग चले गये। यदि इस वाक्य के शक का अर्थ प्रचलित शक संवत्सर गृहीत है तब तो ५८७ ईसवीय वर्ष में उनकी मृत्यु मानना होगा। ऐसी स्थिति में ईसा की पाँचवी शती में पारसी भाषा में अनूदित पञ्चतन्त्र में वराहमिहिर का नाम कैसे आ सकता था। मूल पञ्चतन्त्र जिसका पाँचवीं ईसवी में पारसी भाषा में अनुवाद हुआ था और भी प्राचीन सिद्ध होता है। फिर उसमें ईसा की छठी शती में मृत वराह- मिहिर का नाम कैसे आ सकता है ? अतः यही विदित होता है कि वर्तमान शक संवत्सर से भिन्न कोई शक संवत्सर ईसा से पूर्व ही प्रचलित था । शक शब्द से संवत्सर ही गृहीत है । शकविशेष नहीं। उसी का उल्लेख खण्डखाद्य की टीका में किया गया है। वराहमिहिर ने भी अपने बृहत्संहिता ग्रन्थ में उसका उल्लेख किया है । “आसन् मघासु मुनयः शासति पृथिवीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्ञश्च ॥” (बृ० सं० १३।३) अर्थात् प्रस्तुत महाराज युधिष्ठिर का समय क्या है ? इस जिज्ञासा का उत्तर देते हुए वराहमिहिर ने कहा था कि शककाल में २५२६ संख्या जोड़ देने से युधिष्ठिर का काल निकल आता है। २०२९ विक्रम संवत्सर बीतने

पर युधिष्ठिर शक या कलिगत संवत् ५०७३ होता है। इस समय से २५४७ वर्ष पूर्व विक्रम संवत्सर आरम्भ से ५१८ वर्ष पूर्व ईसवीय सन् से ५७५ वर्ष पूर्व किसी शक संवत्सर की प्रवृत्ति वराहमिहिराचार्य को मान्य है। इस दृष्टि से स्पष्ट हो जाता है कि वराहमिहिर की स्थिति का काल ईसा की पांचवीं या छठी शती नहीं है। किन्तु ईसा के जन्म से पूर्व विक्रम एवं कालिदास की स्थिति का काल ही उनकी स्थिति का काल है। उसी काल का संकेत खाद्यखण्ड टीका में है। उस शक संवत्सर के अनुसार ४०९ में वराहमिहिर स्वर्गवासी हुए थे। युधिष्ठिरशासन के समय सप्तर्षि मघा पर थे। इसका समर्थक वृद्धगर्ग का भी वचन है, जिसका उद्धरण भट्टोत्पल ने बृहत्संहिता की टीका में किया है— “कलिद्वापरसन्धौ तु स्थितास्ते पितृदैवतम्। मुनयो धर्मनिरताः प्रजानां पालने रताः॥ एकैकस्मिन्नृक्षे शतं शतं ते चरन्ति वर्षाणाम्।” बृहत्संहिता १३।४) इस वचन से एक-एक नक्षत्र पर सप्तर्षियों की स्थिति सौ-सौ वर्ष रहती है। श्रीमद्भागवत में भी इसी का समर्थन है— “ते त्वदीये द्विजाः काले अधुना चाश्रिता मघाः ।” (भाग० १२।२।२८) हे राजन् परीक्षित्, तुम्हारे जन्म के समय और अब मृत्यु के समय भी सप्तर्षि मघा पर ही हैं। राजा सुधन्वा के दानपत्र से (संस्कृतचन्द्रिका खण्ड १-३) तथा राजा सर्वजित् वर्मा के दानपत्र से (संस्कृतचन्द्रिका खण्ड १४ संख्या २-२) और पञ्चाङ्गों की प्रचलित अविच्छिन्न परम्परा के अनुसार भी युधिष्ठिर संवत् और कलि संवत् का ऐक्य ही सिद्ध होता है। पीछे कहा गया है कि ईसवी सन् से ५७५ वर्ष पूर्व कोई शक संवत्सर आरम्भ हुआ था उसमें २५२६ जोड़ने से ३१०१ होता है। वराहमिहिर और आमराज ने उसी संवत् की चर्चा की है। इस शक शब्द से बहुतों को प्रचलित शक संवत्सर का ही भ्रम हुआ है। कल्हण को भी उसी से भ्रम हुआ है। इस लिए उन्होंने ६५३ वर्ष काल घटाकर पाण्डवकाल घोषित किया था। पञ्चसिद्धान्तिका में वराहमिहिर ने उसका निर्माण-काल निम्नोक्त कहा है— “सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ । अर्धास्तमिते भानौ यवनपुरे सौम्यदिवसाद्यः ॥” अर्थात् शक काल में ४२७ घटाने पर चैत्र शुक्ल १ प्रतिपदा को बुधवासर था, भानु का अर्ध अस्तंगमन हो रहा था, भारत में अर्धोदय हो रहा था इस समय इसका निर्माण प्रारम्भ हुआ है। पं० सुधाकर द्विवेदी ने शक शब्द से शालिवाहन शक ग्रहण कर के देखा तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को बुधवार नहीं मिला तब उन्होंने सौम्य का अर्थ सोमवार ग्रहण किया है। इस तरह वराहमिहिर के शब्द का उन्हें परिवर्तन करना पड़ा। परन्तु मद्रास के प्रसिद्ध गणितवेत्ता श्रीवेङ्कटाचार्य ने अपने ‘दी एण्टी क्यूटी ऑफ हिन्दू एस्ट्रोनोमी एण्ड दी तामिल’ ग्रन्थ में ईसवी सन् पूर्वभावी शक को ही शक शब्द से लेकर गणना करके यह घोषित किया है कि ४२७ वर्ष व्यवकलन करने (घटाने) पर अर्थात् ईसा सन् के प्रारम्भ से १२४ वर्ष पूर्व ३ मार्च बुधवार को शुक्लप्रतिपदा थी और उस समय यवनपुर में सूर्य का अर्धास्तगमन भी होता था। अलबरूनी ने भी ३२७ शक काल में पञ्चसिद्धान्तिका का निर्माण माना है। परन्तु यह शक विक्रम संवत् के पूर्व का है। जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। ११०

८७४ रामायणमीमांसा द्वाविंश ८८७ प्रचलित शकाब्द के भट्टोत्पल ने वराहमिहिर के ग्रन्थों पर विवृत्ति लिखी है। उसमें उन्होंने किसी यवनेश्वर का मत लिखा है। “यवनेश्वरेण स्फुजिध्वजेनान्यच्छास्त्रं कृतम्। तथा च स्फुजिध्वजः गतेन साम्यर्धशतेन युक्ता- प्यङ्केन वेषां न गताब्दसंख्याकालः शकानां १०४४ संविशोध्य तस्मादतीतवर्षाद् युगवर्ष जातम्। एवं स्फुजिध्वजकृतं शककालस्यार्वाग् ज्ञायते।।” इससे यह स्पष्ट विदित होता है कि स्फुजिध्वज का समय उन्होंने नहीं लिखा तथापि भट्टोत्पल से अति प्राचीन स्फुजिध्वज थे। उनके समय में किसी शक के १०४४ शकाब्द व्यतीत हुए थे। अतः ईसा के पूर्व कई शकाब्द थे। उनमें से ही एक वराहमिहिर द्वारा निर्दिष्ट काल है। जिसके अनुसार वराहमिहिर ने युधिष्ठिर की स्थिति बतायी है। श्रीशङ्करबालकृष्ण दीक्षित ने रघुनाथ टेंभुकर द्वारा परम्पराप्राप्त एक श्लोक अपने ( भारतीय ज्योतिष ) ग्रन्थ पृष्ठ २९४ में उद्धृत किया है— “स्वस्तिश्रीनृपसूर्यसूनुजशके याते द्विवेदाम्बर- त्रेमानाब्दमिते त्वनेहसि जये वर्षे वसन्तादिके। चैत्रे श्वेतदले शुभे वसुतिथावादित्यदासाद्भूद् वेदाङ्गे निपुणो वराहमिहिरो विप्रो रवेराशिषा॥” अर्थात् सूर्यपुत्र धर्म उनके पुत्र राजा युधिष्ठिर संवत् ३०४२ वर्ष बीतने पर जय नाम संवत् के चैत्र शुक्ल ८मी को सूर्य के आशीर्वाद से आदित्यदास नामक विप्र से वेदवेदाङ्गनिपुण वराहमिहिर उत्पन्न हुए। वराहमिहिर दीर्घायु थे अतएव ईस्वी सन् प्रारम्भ से १४८ वर्ष पूर्व उन्होंने पञ्चसिद्धान्तिका लिखी। बीच में अन्य अनेक ग्रन्थ लिखे। वे ई० ५७ पूर्व विक्रमादित्य सिंहासनारोहण के पश्चात् उनकी सभा के रत्नरूप में थे। आज भी रूस आदि देशों में १५०, २०० वर्ष की आयुवाले लोग मिलते हैं। वराहमिहिर की स्थिति दीर्घकाल तक रही हो, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। पुष्यमित्र के पुरोहित पतञ्जलि महाभाष्य में किसी प्राचीन नाटक का श्लोक उद्धृत करते हैं— “यस्मिन् दशसहस्राणि पुत्रे जाते गवां ददौ। ब्राह्मणेभ्यः प्रियाख्येभ्यः सोऽयमुञ्छेन जीवति॥” यह श्लोक “यस्मिञ्जाते ददौ द्रोणो गवां दशशतं धनम्। ब्राह्मणेभ्यो महार्हेभ्यः सोऽश्वत्थामैष गर्जति॥” द्रोणपर्व १९६।२९ वें श्लोक से मिलता है। ३।३।१६७ पा० सू० में 'कालः पचति भूतानि' श्लोक उद्धृत है, जो महाभारत आदि पर्व १।२४८ में है- “कालः पचति भूतानि कालः संहरति प्रजाः।” चरक संहिता का तीसरा अध्याय दृढ़बल से पूर्व का है। यह पतञ्जलि से भी पहले का है, इसमें विष्णु- सहस्रनाम के पाठ का विधान है। “विष्णुं सहस्रमूर्धानं चराचरपति विभुम्। स्तुवन्नामसहस्रेण ज्वरान् सर्वान् व्यपोहति॥४।२॥

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७५ चक्रपाणि आदि टीकाकारों ने लिखा है यह सहस्रनाम भारत में है । विष्णुसहस्रनाम में 'रामो विरामो विरतः' राम का नाम आता है । फलतः राम और रामायण आदि प्राचीन हैं । विष्णुगुप्त (कौटिल्य) के अर्थशास्त्र में महाभारत की छायावाले श्लोक हैं— “एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्को धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्रं सराजकम् ॥” ( उद्योग पर्व ३३।४२ ) “एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुः क्षिप्तो धनुष्मता । प्राज्ञेन तु मतिः क्षिप्ता हन्याद् गर्भगतानपि ॥३२४॥” ( अर्थशास्त्र १०।६ ) पाणिनि इनसे पूर्व के हैं । वे सूत्र ६।२।३८ में महाभारत शब्दसिद्धि लिखते हैं । 'महान्व्रीहि-अपराह्न- गृष्टि-इष्वास····भार-भारत····रौरव प्रवृद्धेषु' सूत्र में महाभारत के महान् शब्द में प्रकृतिस्वर का विधान किया गया है । उसमें 'विष्वक्सेनार्जुनौ' २।२।३१, 'सात्यकि' २।४।५९, 'भीमभीष्म' ३।४।७४, 'जरत्कारु' ४।१।११२, 'गाण्डीव' २।४।३१, 'श्वाफल्कि' २।४।६२, 'रुक्मिणी' ४।१।१२३ आदि शब्दों की सिद्धि पाणिनि ने की है। इन सबका महाभारत से विशेष सम्बन्ध है । आश्वलायनगृह्यसूत्र में भारत तथा महाभारत दो नाम मिलते हैं ३।३।५ । ये शौनक शिष्य थे । शौनक महाभारतयुद्ध से ३०० वर्ष पश्चात् दीर्घ सत्र कर रहे थे । कौषीतकि गृ० सूत्र २।५।३ में महाभारत नाम पठित है । इससे निश्चित होता है कि कौरव और पाण्डवों के युद्ध के पश्चात् ३०० वर्ष के भीतर महाभारत नाम प्रख्यात था । आन्ध्र और गुप्त काल के शिलालेखों में महाभारत काल के अनेक व्यक्तियों का स्मरण किया गया है । इससे स्पष्ट है कि उस समय के पण्डित महाभारत के इतिहास में विश्वस्त थे । वेबर आदि महाभारत में यवन शब्द का प्रयोग देखकर सिकन्दर के आगमन के बाद का महाभारत समझते हैं । पर यह भ्रान्ति है । क्योंकि यवन शब्द यूनानियों के अर्थ में प्रयुक्त नहीं, किन्तु मनु १०।४३,४४ से मालूम पड़ता है वे कभी आर्य ही थे । कालान्तर में यवन आदि बन गये । अतएव देवकीपुत्र कृष्ण में कारुमान् यवन को मारा था । अतएव यवन शब्द के आधार पर अष्टाध्यायी और मनुस्मृति का कालनिर्णय करना सर्वथा असंगत है । महाभारत में अर्थशास्त्र या राजशास्त्र के अनेक आचार्यों की चर्चा है । “बृहस्पतिर्हि भगवान् न्याय्यं धर्मं प्रशंसति । विशालाक्षश्च भगवान् काव्यश्चैव महातपाः ॥ सहस्राक्षो महेन्द्रश्च तथा प्राचेतसो मनुः । भरद्वाजश्च भगवान् तथा गौरशिरा मुनिः ॥ राजशास्त्रप्रणेतारो ब्रह्मण्या ब्रह्मवादिनः ।” ( म० भा० शा० ५८ ) इसी प्रकार महाभारत में वाल्मीकि के श्लोकों का भी उद्धरण है— “श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना । आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत ॥ राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ॥” ४१ ( शा० ५७ ) “प्राचेतसेन मुनिना श्लोको चेमावुदाहृतौ । राजधर्मेषु राजेन्द्र तदिहैकमनाः शृणु ॥४३॥

८७६ रामायणमीमांसा द्वाविंश षडेतान् पुरुषो जह्याद् भिन्नां नावमिवार्णवे । अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥४४॥ अरक्षितारं राजानं भार्या चाप्रियवादिनीम् । ग्रामकामञ्च गोपालं वनकामञ्च नापितम् ॥४५॥ (शा० ५७) “सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव तत्।।” (शा० १४३।६७, ६८) इस तरह महाभारत में प्राचीन विशिष्ट पुरुषों का वर्णन है। आधुनिक व्यक्तियों का उल्लेख नहीं है। अतः महाभारत की प्राचीनता सिद्ध है। भास कवि के बालचरित नाटक में कृष्ण की बालकीड़ाओं का वर्णन है। गोपियों का भी उल्लेख है। इससे निःसन्देह सिद्ध होता है कि भास से पहले ही महाभारत एवं हरिवंश की कथाएँ खूब प्रचलित थीं। भास के नाटकों के प्रकाशक गणपति शास्त्री ने स्वप्नवासवदत्त नाटक की भूमिका में लिखा है कि भास के नाटक का एक श्लोक कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उद्धृत है। इससे भास चाणक्य से भी प्राचीन सिद्ध होते हैं। कुछ जैनों के अनुसार महावीर स्वामी विक्रम संवत् से ४०७ वर्ष पूर्व के हैं। महावीर स्वामी ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र को मिथ्या शास्त्र कहा है। इससे कौटिल्य उनसे भी पूर्व के सिद्ध होते हैं। प्रो० वेबर ने सन् १८६० में जर्मनी देश में अश्वघोष-व्याख्या सहित वज्रसूचिकोपनिषद् प्रकाशित किया था। उस व्याख्या में ‘सप्त व्याधा दशार्णेषु’ श्लोक उद्धृत है। जो कि हरिवंश २४।२०,२१ शान्ति पर्व का है। अतः अश्वघोष के समय महाभारत एवं हरिवंश प्रख्यात थे। बौधायनगृह्यसूत्र में विष्णुसहस्रनामस्तव का उल्लेख है तथा गीता के ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयम्’ इस श्लोक का उद्धरण है। इससे ईस्वीय सन् से अति प्राचीन बौधायन से भी प्राचीन महाभारत सिद्ध होता है। इस तरह अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग सभी परीक्षाओं से लक्षश्लोकात्मक महाभारत पाँच हजार वर्ष प्राचीन सिद्ध होता है। ५०७३ वर्ष पूर्व कृष्ण का लीलासंवरण हुआ। वर्तमान कल्पारम्भ से अब तक १९७२९४९०७३ एवं सृष्ट्यारम्भ से अब तक १९५५८८५०७३ वर्ष व्यतीत हुए हैं। इतने समय में ६ मनु बीत गये। सप्तम वैवस्वत मनु के २७ महायुग व्यतीत हो गये। २८ वें महायुग के तीन युग बीत गये। चतुर्थ युग कलि के ५०७३ वर्ष बीत गये। यही युधिष्ठिर का संवत्सर है। विक्रमी प्रारम्भ से २०२९ तथा शकारम्भ से १८९४ वर्ष व्यतीत हुए हैं। “सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः ।” (पातञ्जल सू० २।४२) के व्यासभाष्य में एक वचन उद्धृत है— “यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥” यह श्लोक महाभारत शा० प० १०४।१४६; १७७।५२ में मिलता है। धर्मराज युधिष्ठिर के प्रपौत्र महा- राज जनमेजय का ताम्र शासनपत्र सबसे बड़ा प्रमाण है। उसकी प्रतिलिपि सन् १८७५ नवम्बर में मुद्रित इण्डियन एण्टिक्वेरी पुस्तक में निम्नरूप में है— श्रीगणाधिपतये नमः । “पान्तु नो जलदश्यामाः शार्ङ्गं ज्याघातकर्कशाः । त्रैलोक्यमण्डपस्तम्भाश्चत्वारो हरिबाहवः ॥”

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७७ स्वस्ति श्रीजयाभ्युदये युधिष्ठिरशके प्लवङ्गाख्ये एकोननवतित्संवत्सरे सहस्य (पौष) मासे अमावश्यायां सोम्यवासरे श्रीमन्महाराजाधिराजपरमेश्वरो वीरप्रतापशाली कुरुकुलोद्भवो वैयाघ्रपाद- गोत्रजः श्रीजनमेजयभूपः किष्किन्धानगर्यां सिंहासनस्थः सकलवर्णाश्रमधर्मप्रतिपालकः पश्चिमदेशस्थ- सीतापुरकेदारक्षेत्रे तत्रत्यमुनिवृन्दमठस्य गरुड़वाहनतीर्थश्रीमद्शिष्यकैकयनाथैराराधितसीतारामस्य पूजार्थं कृतभूदानसाधनमस्मत्प्रपितामहयुधिष्ठिराधिष्ठितमुनिवृन्दक्षेत्रेऽस्मिन् चतुःसीमापरमितिक्रमः पूर्वभागे उत्तरवाहिन्याः तुङ्गभद्रायाः पश्चिमे दक्षिणभागे अगस्त्याश्रमसंगमादुत्तरे पश्चिमे पाषाणनद्याः पूर्वे उत्तरभागे भिन्ननद्या दक्षिणे एतन्मध्यस्थमुनिवृन्दक्षेत्रे भवच्छिष्यपरम्परया आचन्द्रार्कपर्यन्तं निधिनिक्षेप-जल-पाषाण-अक्षिणी आगामिसिद्धसाध्यतेजःस्वाम्यसहितं स्वबुद्ध्यनुकूलेन अस्मन्मातापित्रोः विष्णुलोकप्राप्त्यर्थं हरिहरसन्निधौ उपरागसमये सहिरण्येन तुङ्गभद्राजलधारापूर्वकं क्षेत्रं यतिहस्ते दत्तवानस्मि। एतद्धर्मसाधनस्य साक्षिणः आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ।। दानपालनयोर्मध्ये दानाच्छ्रेयोऽनुपालनम् । दानात्स्वर्गमवाप्नोति पालनादच्युतं पदम् । स्वदत्ताद् द्विगुणं पुण्यं परदत्तानुपालनम् । परदत्तापहारेण स्वदत्तं निष्फलं भवेत् । स्वदत्ता पुत्रिका ज्ञेया पितृदत्ता सहोदरा । अन्यदत्ता तु जननी दत्तभूमि परित्यजेत् । अन्येस्तु छर्दितं शूद्रैः श्वभिश्च छर्दितं ननु । ततः कष्टस्ततो नीचः स्वयं दत्तापहारकः । स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्ति हरेच्च यः । षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ।। इति ।। उक्त ताम्रपत्र जनमेजय राजा का है। उसमें कृष्ण की वन्दना करके युधिष्ठिर शक प्लवङ्गम संवत् में नवासी वर्ष में सहस्य मास (पौष मास) अमावस्या सौम्य वासर के दिन वैयाघ्रपादगोत्रज कुरुकुलोद्भव राजा जनमेजय ने किष्किन्धा नगरी में सिंहासनस्थ होकर तुङ्गभद्रा अगस्त्याश्रम आदि अमुक अमुक तीर्थ सीमायुक्त हिरण्यसहित भूक्षेत्र का दान किया आदि आदि । इसमें जनमेजय द्वारा सीताराम की पूजा के लिए भूक्षेत्र का दान कहा गया है। सुतरां सीताराम-पूजा ईसा से हजारों वर्ष पूर्व से प्रचलित सिद्ध होती है, अतः बुल्के का यह कहना निराधार ही है कि ई० पू० पहली या दूसरी शती में राम की पूजा होने लगी थी। कुछ लोग कहते हैं प्लवङ्गम संवत्सर सहित उक्त योग अब से पहले तेरहवीं शती में आया था, अतः वही महाभारत का समय है। परन्तु वाराणसेय राजकीय संस्कृत महाविद्यालयीय गणिताध्यापक बापूदेव शास्त्री ने उस मत का निराकरण कर के ताम्रशासन का काल ही निर्धारित किया है। उपर्युक्त अनेक उद्धरणों, शिलालेखों एवं ताम्रलेखों से २०२९ वर्तमान विक्रमीय संवत्सर से ३०४४ वर्ष पूर्व ५०७३ कलि संवत्सर युधिष्ठिर संवत् सिद्ध है। धृतराष्ट्र के मरणोपरान्त युधिष्ठिर के राज्यकाल में महाभारत का निर्माण हो चुका था। गीता तो इससे भी पहले युद्धारम्भ के दिन ही प्रकट हुई थी। महाभारत तथा गीता में चर्चित राम एवं उनके समय का ही रामायणग्रन्थ अति प्राचीन सिद्ध होते हैं। तथा च पाश्चात्यों की यह कल्पना अत्यन्त असंगत है कि बुद्ध के पश्चात् ईसा से पूर्व तीसरी शती में रामायण का निर्माण हुआ है। पुराणों के आधार पर भी रामायण एवं राम की अतिप्राचीनता सिद्ध होती है— "द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके । प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मथुरायां भविष्यति ।। (म० भा० शा० ३२९।८९) द्वापर और कलि की सन्धि में कंसवधार्थ मथुरा में कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है। इस वचन से कृष्ण का भी आविर्भाव काल वही सिद्ध होता है।

८७८ रामायणमीमांसा द्वाविंश चालुक्यवंशीय महाराज पुलकेशिन द्वितीय के बीजापुर एहोल नामक पर्वतीय क्षेत्र में स्थित जैनमन्दिर में उत्कीर्ण शिलालेख से भी महाभारत-संग्राम का यही समय सिद्ध होता है। शिलालेख के श्लोक निम्नोक्त हैं— “त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः । सप्ताब्दशतयुक्तेषु गतेष्वब्देषु पञ्चसु ॥ पञ्चाशत्सु कलौ काले षट्सु पञ्चशतीषु च । समासु समतीतासु शकानामपि भूभुजाम् ॥” अर्थात् महाभारत युद्ध से ३७३५ वर्ष बीतने पर तथा कलि में शक राजाओं-के ५५६ वर्ष बीतने पर यह शिलालेख उत्कीर्ण हुआ है। जो आज से १३५८ वर्ष पूर्वका हैं। ३७३५ में १३३८ मिला लेने पर ५०७३ वर्ष पूर्व भारत-युद्ध का होना सिद्ध होता है। आश्चर्य है कि इस प्रकार समस्त प्राचीन भारतीय साहित्यकार, रामायण तथा महाभारत को वाल्मीकि और व्यासकृत मानते हैं किन्तु कुछ पाश्चात्य तथा उनके अनुयायी अपना हठ नहीं छोड़ते । पुराणों की मान्यता नवीं शताब्दी में मेधातिथि लिखते हैं 'पुराणानि व्यासादिप्रणीतानि' (३।२२२) । ६८७ के ऋग्भाष्यकार स्कन्दस्वामी पुराणों का उद्धरण करते हैं—१।२०।७ पुराणेषु प्रसिद्धम्, (१।२५।१३), पौराणिकाः कक्षीवन्तमङ्गिरसं स्मरन्ति (१।११६।७) । सांख्यकारिका २२ के भाष्य में गौडपादाचार्य पुराणों का उल्लेख करते हैं। दुर्गाचार्य वसिष्ठोत्पत्ति की कथा देकर कहते हैं—इति पुराणे श्रूयते (निरुक्त ५।१४) । यह कथा मत्स्यपुराण (२०।२३-२९) में मिलती है । विक्रम १ श० वररुचि 'निरुक्तसमुच्चय' में कहते हैं—'तथा चाहुः पौराणिकाः ।' न्यायभाष्यकार वात्स्यायन पुरातन ब्राह्मण ग्रन्थ का वाक्य लिखते हैं और कहते हैं कि प्रमाणभूत ब्राह्मण से इतिहास और पुराण का प्रामाण्य सिद्ध होता है। जो ऋषि मन्त्र तथा ब्राह्मणों के द्रष्टा और प्रवक्ता हैं वे ही इतिहास-पुराण तथा धर्मशास्त्र के कर्त्ता हैं— “प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते । ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एनदितिहासपुराणमभ्यवदन् 'इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः' इति । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति ।” पतञ्जलि पुरातन वाङ्‌मय का परिगणन करते हुए पुराण और इतिहास की भी चर्चा करते हैं:— “वाकोवाक्यमितिहासः पुराणं वैद्यकमिति ।” कौटिल्य भी इन पुराणों का उल्लेख करते हैं 'इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रवित् ।' अ० ९६ । वह पौराणिक सूत और सारथि सूत में भेद भी करते हैं 'ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सूतः पौराणिकस्त्वन्यः सूतो मागधश्च ब्रह्मक्षत्राद्विशेषतः ।' पौराणिक सूत अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने से विशिष्ट है (अध्याय ६४) । याज्ञवल्क्य उनसे भी प्राचीन हैं। वे भी पुराणों को जानते हैं— “पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानाम् ।”( १।३ ) गौतमधर्मसूत्रभाष्यकार मस्करी सूत्र १।३९ में कण्वधर्मसूत्र का एक वचन देता है 'अथर्ववेदेतिहास- पुराणानि ध्यायन्' इससे प्रतीत होता है—कण्वसूत्रकार को पुराण विदित थे । गौतमध० सू० ८।६ और ११।२१ में पुराणशब्द मिलता है ।

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७९ आपस्तम्बधर्मसूत्र १।६।१९।१३।१४ पुराण के दो श्लोक उद्धृत हैं । यह कहा ही गया है कि सर्वप्राचीन मनु ने भी इतिहास-पुराण को श्राद्ध में श्रवण करना कहा है । चरकसंहिता के शारीरस्थान ४।४४ में 'श्लोका- ख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलम्' उल्लेख है। यह बुद्ध से बहुत पहले का है। आरण्यकों और ब्राह्मणों में भी पुराण शब्द है । 'ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् नाराशंसीः' (तै० आ० २।९) । "तानुपदिशति पुराणं वेदः सोऽयमिति सोऽयमिति किञ्चित् पुराणमाचक्षीत ।” ( श० ब्रा० ११।४।३।१३ ) । पराशरज्योतिषसंहिता में "वेदवेदाङ्गेतिहासपुराणशास्त्रावदातम् ।” पुराण इतिहास की चर्चा है । वा० रा० बालकाण्ड अ० २ "नरेन्द्र श्रूयतां तावत् पुराणे यन्मया श्रुतम्” ।।५।। अथर्ववेद ( १५।३०१) में अनेक विद्याओं के साथ पुराणों का भी वर्णन है । तमितिहासं पुराणं च ऋचः सामानिच्छन्दांसि । पुराणं यजुषा सह उच्छिष्टाज्जज्ञिरे तस्माद्दिवि देवाः ।। प्रसिद्ध ऐतिहासिक अलवेरूनी सं० १०८७, १८ पुराणों की स्वल्पभेदवाली दो सूचियाँ देता है। राजशेखर ९९७ काव्यमीमांसा अ० २ में कहता है 'तत्र वेदार्थानोपनिबन्धनप्रायं पुराण- मष्टादशधा ।' बालभारत में “राजशेखर अष्टादशपुराणसारसंग्रहकारिन् ।” (पृ० ४) गौतमधर्मसूत्रमस्करीभाष्य ( ८।६) 'पुराणं ब्रह्माण्डादि' । वाचस्पतिमिश्र ८०८ योगभाष्य टीका में विष्णुपुराण २।३२—५२।५४ में और १।१९-२५, ४।१ में वायुपुराण की चर्चा करते हैं । आद्यशङ्कराचार्य विष्णुसहस्रनामभाष्य में भविष्योत्तरपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण तथा पद्मपुराण की चर्चा करते हैं । ६३७ संवत् के बाणभट्ट ने हर्षचरित में लिखा है 'पवनप्रोक्तं पुराणं पपाठ । महाभारत के वनपर्व ( १९४।१९ ) में वायुप्रोक्त पुराण का उल्लेख है । महाभारत दा० पा० में पुराणविदों की दाशरथिरामविषयक गाथाएँ उद्धृत हैं । ये गाथाएँ वायुपुराण ( ८८।१९६ ) में हैं । कुमारिल ने तन्त्रवार्तिक १।३ में पुराणप्रामाण्य कहा हैं । सांख्यकारिका माठरवृत्ति ( १२।० ) में पुराण- वर्णित भविष्य, कलिक का उल्लेख है । योगभाष्य ( ३।२३ ) का एक वचन न्यायवार्तिक एवं न्यायभाष्य ( १।६ ) में मिलता है— “यस्मिन् परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम् ।” महाभाष्यकार ने भी लिखा है-- “तदपि नित्यं यस्मिन् तत्त्वं न विहन्यते ।” “स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात् स्वाध्यायमासते । स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥” यहाँ वाचस्पतिमिश्र कहते हैं 'वैयासिकीं गाथामुदाहरति' यह वचन विष्णुपुराण ( ६।६।२) में मिलता है । बाण हर्षचरित में पुरूरवा के मरने की एक कथा लिखते हैं । सुबन्धु की वासवदत्ता, अश्वघोष का बुद्धचरित तथा कौटिल्य भी इसका संकेत करते हैं । यह कथा वायुपुराण में मिलती है । “पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया विननाश ।” ( वायु० पु० ३।२०-२३ ) पाश्चात्यों ने अर्थशास्त्र को ई० ३री शती का माना है । वस्तुतः वे मौर्य सम्राट् चन्द्रगुप्त के महामात्य थे । ई० सन् पूर्व के थे । दण्डी ने दशकुमारचरित में कहा है विष्णुगुप्त ने ६००० श्लोकों के परिमाण में अर्थशास्त्र रचा—

“आचार्यविष्णुगुप्तेन मौर्यार्थे षड्भिः श्लोकसहस्रैः संक्षिप्ता।” वात्स्यायन न्यायभाष्य में अर्थशास्त्र का वचन उद्धृत करते हैं— “पदसमूहो वाक्यमर्थसमाप्तौ” (अ० शा० अध्या० २१) । न्यायभाष्य (२।१।५४) में लिखा है— “पदसमूहो वाक्यमर्थसमाप्ताविति ।” न्यायभाष्य १।१।१ में लिखा है— “प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तितः ॥” ठीक यही श्लोक अर्थशास्त्र के विद्यासमुद्देश प्रकरण में मिलता है । न्यायवार्तिक का काल वि० २य शती से पहले का है । न्यायभाष्य विक्रम १ श० पूर्व का है । अर्थशास्त्र वि० पू० ३ श० का है । क्षमाकल्याण के दीपमालाकल्प में निर्वाण संवत् ५०९ कल्कि का होना लिखा है । नेमिचन्द्र अपने तिलो- सार ग्रन्थ में निर्वाण संवत् १००० कल्कि को मानता है । इस भेद का कारण परम्पराविच्छेद ही है । महावीरजी का निर्वाण बहुत पुराने काल की बात है । जैन भिक्षु उस काल को भूल गये । विक्रम सं० ४७० यह विवरण नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग १० अंक ४ में मिलता है । यह विवरण मुनि कल्याणविजय का है । बौद्धपरम्परा ह्वेनसांग, जो नालन्दा विश्वविद्यालय में वर्षों पढ़ता था, जिसने अनेक बौद्ध आचार्यों का साक्षात्कार किया था, उसके काल से बौद्धनिर्वाणकाल १२००, १३००, १५०२ और ९०० से १००० वर्ष पूर्व तक का काल भिन्न-भिन्न विद्वान् मानते हैं । हिन्दी अनुवाद पृष्ट ३०४ तथा शमनह्वोली कृत ह्वेनसांग का जीवनचरित, एसवील का अंग्रेजी अनुवाद सन् १९१४ पृ० ९८ बुद्धनिर्वाण काल के विषय में सन् ४०१ से लेकर कई वर्ष तक भारत में भ्रमण करनेवाले फाह्यान कहता हैं मूर्ति की स्थापना बुद्धदेव के परिनिर्वाणकाल से ३०० वर्ष पीछे हुई है । उस समय देश में चाववंशी महाराजा पुङ्ग का राज्य था । (हिन्दी अनुवाद पृ० १६ अनुवादक की टिप्पणी यों है पुङ्ग का शासन काल ७५०-७१९ तक ई० पू० था ।) अर्थात् बुद्धनिर्वाण ई० पू० ११वीं श० अधिक से अधिक ई० से १०९० वर्ष पूर्व हुआ । सिंहल देश को उपलब्ध परम्परा के अनुसार बुद्धनिर्वाण की तिथि और ही है । तत्त्वसंग्रह की भूमिका में पाश्चात्य लेखकों ने सब मतों को छोड़कर उसे ही प्रधानता दी है । जब बौद्ध सम्प्रदाय में अपने धर्मप्रवर्तक के काल के विषय में इतने मत हैं, तब अन्य ऐतिहासिक विषयों में उनका प्रामाण्य कितना हो सकता है ? इसी लिए तो दशरथजातक में सीता को राम की भगिनी कहा है । धम्मपद की टीका में वासवदत्ता को चन्द्रमहासेन की भगिनी कहा है अर्थात् इन बौद्ध ग्रन्थों का सर्वथा प्रामाण्य कहना कठिन है । वेदों में रामायणसम्बन्धी व्यक्तियों का उल्लेख “चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः” ऋ० १।१२६।४ में दशरथ का उल्लेख है । अथर्ववेद १०।२।२८ “देवानां पूरयोध्या ।” में अयोध्या राजधानी का वर्णन है । “नीचीनवारं वरुणः कबन्धं प्र ससर्ज” ऋ० सं० ५।८५।३ में कबन्ध तथा “स इहासं तु वीरवं प्रतिदंनपषडक्षं त्रिशीर्षाणम् ॥” ऋ० १०।९९।६ में त्रिशिरा का वर्णन है ।

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८१ “ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः । स सोमं प्रथमः पपौ स चकार रसं विषम् ॥” ( अथ० सं० ४।६।१ ) में दसमुख रावण का वर्णन है— “इन्द्रः सीतां निगृह्णातु” (ऋ०सं० ४।५७), “घृतेन सीता मधुना समक्ता” (अथ०सं० ३।१७।९) में सीता का वर्णन है । “अघो रामो सवित्रिः” ( यजुःस० २९।५९ ) सवितृकुल के राम का वर्णन है । “भद्रो भद्रया सचमान आगात्” ( ऋ० सं० १०।२।३ ) मे रामभद्र का उल्लेख है । वेदों में राम के पूर्वजों का संकेत निम्नोक्त प्रकार से मिलता है— “मनुर्वे यत्किञ्चावदत् तद् भेषजमेवावदत् ।” ( का० सं० ११।५।४९ ) मनु की उक्ति को भेषज तुल्य कहा गया है । “यं त्वा वेद इक्ष्वाको” (अथ०सं० १९।३९।९) तथा “ईज इक्ष्वाको राज” (श० ब्रा० १३।५।४। ९५) में इक्ष्वाकु की चर्चा है । “सुद्युम्नो द्युम्नः यजमानाय धेहि” (मैत्रायणीसं० १।२।१९) में सुद्युम्न की चर्चा है । “विश्वामित्रो यदव हते सुदासम्” (ऋ० सं० ३।५३।९) में सुदास की चर्चा है। “षष्टि सहस्रानवति च कोरम् ।” (अथ०सं० २०११२७।१) में सगर के साठ हजार पुत्रों का संकेत है । “रघुः श्येनः पतयत् ।” (ऋ० सं० ५।४५।९) में रघु का संकेत है । “अथ किमेतैर्वाऽपरेऽन्ये महाधनुर्धराश्चक्रवर्तिनः केचित् सुद्युम्न-भूरिद्युम्नेन्द्रद्युम्नकुवलयाश्व- यौवनाश्व-वध्यश्वाश्वपति-शशबिन्दुहरिश्चन्द्रऽम्बरीषो ननक्तुः शर्यातिर्ययातिरनरण्योऽश्वसेनादयोऽथ मरुत्तभरतप्रभृतयो राजानो मिषतो बन्धुवर्गस्य महतीं श्रियं त्यक्त्वाऽस्माल्लोकादमुं लोकं प्रयाताः” (मैत्रायणीयोपनिषद् अन्तिम आख्यायिका १।१४) में । “यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः । न चेत्पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः ॥ इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥” (वायुपु० १।२००, २०१) “जातमात्रं च यं वेदः उपतस्थे ससंग्रहः ।” (वायुपु० १।४३) “प्राजापत्या श्रुतिर्नित्या तद्विकल्पास्त्विमे स्मृताः । अनित्यभावाद् देवानां मन्त्रोत्पत्तिः पुनः पुनः ॥” (वायुपु० उपो० ६१।७५) जो चारों साङ्गवेदों को जानकर भी पुराणों को नहीं जानता वह विचक्षण नहीं होता है । अल्पश्रुत से वेद भयभीत होता है और यह समझता है कि यह अल्पश्रुत, अर्थ का अनर्थ कर, मुझपर प्रहार करेगा । भारतीय दृष्टिकोण से पैमाना—१८ निमेष की ( १ ) एक काष्ठा ३० काष्ठा की ( १ ) एक कला ३० कला का ( १ ) एक मुहूर्त ३० महर्त का ( १ ) एक अहोरात्र

८८२ रामायणमीमांसा द्वाविंश पितरों का एक अहोरात्र = १ मास देवताओं का एक अंहोरात्र = १ वर्ष सत्ययुग काल— ४००० × ३६० = १४४०००० वर्ष सन्धि— ४०० × ३६० = १४४००० वर्ष सन्ध्यंश— ४०० × ३६० = १४४००० वर्ष योग— = १७,२८००० वर्ष त्रेता काल— ३००० × ३६० = १०८,०००० वर्ष सन्धि— ३०० × ३६० = १०८,००० वर्ष सन्ध्यंश— ३०० × ३६० = १०८,००० वर्ष योग— = १२,९६००० वर्ष द्वापर काल— २००० × ३६० = ७२,०००० वर्ष सन्धि— २०० × ३६० = ७२,००० वर्ष सन्ध्यंश— २०० × ३६० = ७२,००० वर्ष योग— = ८,६४००० वर्ष कलियुग काल— १००० × ३६० = ३६,०००० वर्ष सन्धि— १०० × ३६० = ३६००० वर्ष सन्ध्यंश— १०० × ३६० = ३६००० वर्ष योग— = ४३२,००० वर्ष चतुर्युग काल— १७२८००० वर्ष १२९६००० ,, ८६४००० ,, ४३२००० ,, ─────────── ४३२०००० वर्ष ब्राह्म दिन = ४३२०००० × १००० = ४३२,००००००० वर्ष ब्राह्म अहोरात्र = ८६४,००००००० वर्ष

ब्राह्म वर्ष = ८६४,००००००० X ३६० = ३११०४,०००००००० वर्ष ( ३१ खरब, १० अरब, ४० करोड़ वर्ष ) ब्रह्मा का प्रथम परार्ध = ६११०४,०००००००० x ५० = १५५५२०००००००००० वर्ष ( १५ नील, ५५ खरब, २० अरब वर्ष ) ∵ १४ मनु = ४३२,००००००० ∴ १ ,, = $\frac{४३२०००००००}{१४}$ ३० करोड़, ८५ लाख, ७१ हजार, ४२८ वर्ष, २०५ दिन, २१ मुहूर्त, १२ कला, २५ काष्ठा, १२ ६/७ निमेष । ब्रह्मा का इस संवत् २०२९ विक्रम तक का काल = १५ नील, ५५ खरब, २० अरब, १२ करोड़, ५ लाख, तेंतीस हजार ७३ वर्ष ब्रह्मायु का काल विष्णु का एक घड़ी काल होता है। १२ लाख विष्णु का काल रुद्र का कलार्ध होता है। अर्बुदरुद्रों का अक्षर ब्रह्म होता है— “चतुर्युगसहस्रेण ब्रह्मणो दिनमुच्यते । पितामहसहस्रेण विष्णोश्च घटिका स्मृता ॥ विष्णोर्द्वादशलक्षाणि कलार्धं रौद्रमुच्यते । रुद्रस्यार्बुदसंख्यानां ततो ब्रह्माक्षरं भवेद् ॥” विश्वामित्र ने समुद्र-मन्थन का वर्णन किया है। वह वाल्मीकिरामायण के अनुसार ११ करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था, क्योंकि क्षीरसमुद्र का मन्थन वैवस्वतमन्वन्तर के द्वितीय कृत युग के अन्त में हुआ था— “प्रह्लादो निजितो युद्धे इन्द्रेणामृतमन्थने ।” ( मत्स्यपु० ४७।४५ ) । वेद में भी इसकी चर्चा है। देवता और असुर लोगों ने जलों के रस क्षीरसमुद्र का मन्थन किया था— देवाश्चासुराश्चापां रसममन्थत । तस्मान्मध्यमानादमृतमुदतिष्ठत । ततः सर्वतो रसमस्रवत् । स सोमः तत्सोमस्य सोमत्वम् ।” ( तै० सं० ), काठकब्राह्मण और वायुपुराण के अनुसार वर्तमान वैवस्वतमन्वन्तर के १६वें कृत युग में शाकुन्तल भरत थे । उन्हीं के नाम से भारत देश प्रख्यात हुआ है । उन्होंने प्रजा का विशेषरूप से भरण किया था । “षोडशतमे हि राजा दुष्यन्तश्च कृते युगे । शकुन्तलायां भरतस्तन्नाम्ना तु भारतम् ॥” ( वायु० पु० ९९।५५ ) “विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम् ।” ( ऋ० सं० ३।५३।१२ ) इस मन्त्र में भारतसम्बन्धी जन की रक्षा की बात कही गयी है । कुरु, पाञ्चाल आदि देश भारत नाम से विख्यात थे ।

“शकुन्तलायां भरतनाम्ना तु भारतं कृते । षोडशतमे प्राप्ते प्रजानां भरणं कृतम् ॥” (वायु० पु० ) श्रीभागवत के पञ्चम स्कन्ध में कहा गया है कि अजनाभवर्ष नाम से प्रसिद्ध यह देश ऋषभपुत्र भरत के नाम से भारत हुआ था । कल्पभेद से दोनों व्यवस्थाएँ प्रामाणिक समझनी चाहिये । एक अन्य दृष्टि से मनु का नाम भी भरत है । उनके नाम से भी इस देश का भारतवर्ष नाम है— “भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते । निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम् ॥” (वायुपु० उपो० १०।४५।७६) पुराणों में तारकामय संग्राम का वर्णन है । उसका समय विक्रम शती से १२ करोड़ वर्ष पूर्व है, क्योंकि वृत्रवध के बाद कृतयुग में तारकामय संग्राम हुआ, यह हरिवंश में वर्णित है— “वृत्ते वृत्रवधे तावद् वर्तमाने कृते युगे । आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः ॥” ( १।४२।१० ) उस संग्राम में आङ्गिरस बृहस्पति देवताओं के सहायक थे, अतः बृहस्पति को ई० शती २-४ के मध्य में मानना अत्यन्त असंगत है । भाषाविज्ञान के अनुसार आयुर्वेद को ब्राह्मणकाल से अर्वाचीन मानना भी प्रामाणिक नहीं है । संस्कृत प्रकृति, प्रत्यय, समास, तद्धित आदि अनादि ही हैं । मन्वन्तरसम्बन्धी विचारों के अनुसार मन्वन्तरों में इन्द्र होते हैं । उनके गुरु बृहस्पति भी होते हैं । इसी प्रकार न्यायसूत्रकार गौतम एवं न्यायभाष्यकार वात्स्यायन भी अर्वाचीन नहीं हैं । तभी आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व महाभारत शान्तिपर्व में गौतम का वर्णन है— “न्यायतन्त्रं हि कात्स्न्र्येन गौतमो वेत्ति तत्त्वतः ।” ( म० भा० शान्ति० २१२।३४ ) । वैवस्वत मन्वन्तर की सन्धि में उत्पन्न बौधायन, आपस्तम्ब आदि भी प्राचीन ही हैं । दैत्यराज विरोचन की कन्या वृत्रज्वाला कुम्भकर्ण की पत्नी थी ( वा० रा० ) । उसका भ्राता बलि वैवस्वत मन्वन्तर के द्वितीय त्रेता में हुआ था । भृगु, पुलस्त्य, अङ्गिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ ये सप्तर्षि एवं स्वायम्भुव मनु आदि त्रेतायुग में उत्पन्न हुए थे । बुद्धि एवं प्रयत्न के बिना ही उन लोगों को नक्षत्रों के तुल्य वेदमन्त्रों का दर्शन हुआ था । यह वायुपुराण के उपोद्घात से सिद्ध है— “सप्तर्षीणां मनोश्चैव आद्ये त्रेतायुगस्य तु । अबुद्धिपूर्वकं तेषामक्रियापूर्वमेव च ॥ अभिव्यक्तास्तु ते मन्त्राः तारकाद्यैर्निदर्शनैः । ते मन्त्रा वै पुनस्तेषां प्रतिभासमुत्थिताः ॥” ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्रांश्चाथर्वणानि च ।” ( वा० पु० उ० ४३–४५ ) ब्रह्मा की प्रेरणा से मन्वादि ने उसी समय श्रौतस्मार्त धर्म का उपदेश किया । “आद्ये त्रेतायुगे पूर्वमासन् स्वायम्भुवोऽन्तरे ।” ( ब्रह्माण्ड पु० २।३६।९ ) “तत्र त्रेतायुगस्यादौ मनुः सप्तर्षयश्च ते । श्रौतस्मार्तंञ्च धर्मञ्च ब्रह्मणा च प्रचोदितम् ॥” ( प्राहुः ) “दाराग्निहोत्रसंयोगमृग्यजुःसामसंश्रितम्……। परम्परागतं धर्मं स्मार्तंञ्चाचारलक्षणम् ॥ वर्णाश्रमाचारयुतं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥” ( वायु० पु० १।४०, ४१ )

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८५ अतः वर्तमान मनुस्मृति सर्वप्राचीन संविधान है । ब्रह्मर्षियों की सभा में सर्वसंमति से भृगु ने उसे लिखा था । आधुनिक दृष्टि से भी विक्रमशती से ४०० वर्ष पूर्व यूनान में हेरोडोट्स् हुआ है । उसके एमिसिस ग्रन्थ के अनुसार १७ सहस्रवर्ष पूर्व ८ या १२ देव हुए हैं। उनमें विष्णु एक थे । डायोनिसियस दानवों के और विष्णु के नेता थे । भारतीय दृष्टि के अनुसार कश्यपपत्नी दाक्षायणी अदिति के इन्द्र आदि बारह पुत्र प्रसिद्ध हैं । उनमें एक विष्णु हैं— सेवेन्टीन थाउजेन्ड इयर्स बिफोर दी रिजिन आफ अमेसिस दी ट्वेल्व गाड्स् वेयर दे ए फेर्म प्रोड्यूस्ड फ्रॉम दि एट ऑपरीजवेल्व हिक्यूलिस इज वन बुक ११ चेप्टर ४३ ईरानी और फारसी भाषा में विवस्वत् के लिए विवहन्त का प्रयोग किया गया है । उसके चार मनु, श्राद्धदेव यम और अश्विद्वय हुए थे । प्रायः पुराणों के पुरुषों की संख्या के अनुसार कालनिर्धारण की गलती आधुनिक लोग करते हैं । परन्तु यह वेद प्रमाण से सिद्ध है कि कई लोगों की आयु सामान्य मनुष्यों से बड़ी होती थी । जैसे दीर्घतमा महर्षि की आयु दस पुरुषायु के बराबर थी— “त उ दीर्घतमा दशपुरुषायुषाणि जिजीव ।” ( शाङ्ख्यायनारण्यक २।१७ ) । ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार “मामतेयो भरतं दौष्यन्तिमाभिषिषेच” ( ८।२३ ) । कक्षीवान् वैवस्वत मन्वन्तर के तृतीय द्वापर में हुए थे जो कि विक्रम सं० से १२ करोड़ वर्ष पूर्व का काल होता है । दीर्घतमा १६ वें कृत युग के थे । दौष्यन्ति भरत के सम- कालिक थे । वह विक्रम से ५ करोड़ १८ लाख ८६ हजार १ सो ४४ वर्ष पूर्व का काल है । प्रथम त्रेता के अत्रिपुत्र सोम हुए । उनके पुत्र बुध हुए । बुध के पुत्र पुरुरवा हुए । “पुरुरवस एवासीत् त्रयी त्रेतामुखे नृप ।” ( भाग० ९।१४।४९ ) त्रेता में परशुराम का आविर्भाव हुआ था— “एकोनविंश्यां त्रेतायां सर्वक्षत्रान्तकोऽभवत् । जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः ॥” ( वायुपु० १८।९१ ) त्रेताद्वापरयोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतांवरः । असकृत् पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ॥” ( म० भा० ३।२।३ ) इसी प्रकार २४ वें त्रेता में वसिष्ठ पुरोधा के साथ दशरथपुत्र राम रावण के वधार्थ विष्णु का अवतार होगा । ( विष्णुवचन है ) त्रेता द्वापर की सन्धि में २४ वें त्रेता में मैं विश्वामित्र पुरस्सर दाशरथि राम राजा हूँगा । “चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा । सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः ॥” ( वायुपु० १८।७२ ) “सन्ध्यंशे समनुप्राप्ते त्रेतायां द्वापरस्य च । अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः ॥” ( म० भा० १२।३३९ ) 'चतुर्विंशयुगे चापि विश्वामित्रपुरःसरः । रामो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः ॥” ( हरिवंश ४।४१, ब्रह्माण्डपुराण १०४।११ ) “अष्टाविंशतिमे तद्वत् द्वापरस्यांशसंक्षये । नष्टे धर्मे तदा जज्ञे विष्णुर्वृष्णिकुले प्रभुः ॥” ( वायुपु० ९८।९७ )

८८६ रामायणमीमांसा द्वाविंश वैवस्वत मन्वन्तर के २८ वें द्वापर के अन्त में धर्म एवं यज्ञ के नष्टप्राय होने पर विष्णु वृष्णिकुल में कृष्णरूप से उत्पन्न होंगे । गाधिकन्या सत्यवती में महर्षि ऋचीक से ज्येष्ठ पुत्र जमदग्नि हुए थे । अग्निवेश, वल्मीक आदि ९९ पुत्र अन्य भी हुए थे । उन्हीं वल्मीक के पुत्र वाल्मीकि हुए थे । वे अग्नि वाल्मीकि भी कहे जाते थे । उन्होंने रामायण का निर्माण किया था । उनके पुत्र अग्निवेश हुए थे जो कि आयुर्वेद और धनुर्वेद के आद्याचार्य थे । उन्होंने भरद्वाज से आग्नेय अस्त्र आदि प्राप्त किये थे— “अग्निवेशं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान् । प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रं वेदविदांवरः ॥” ( म० भा० आदि पर्व २२१।१५ ) दीर्घजीवी अग्निवेश से द्रोण ने तथा द्रोण से अर्जुन ने आग्नेय आदि अस्त्र प्राप्त किये थे— “अग्निवेश इति ख्यातस्तस्य शिष्योऽस्ति भारत । तपसा यन्मया प्राप्तममोघमशनिप्रभम् ॥ अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम यद् दहेत् पृथिवीमपि । त्वया प्राप्तमिदं वीर दिव्यं नान्योज्हैति त्विदम् ॥” (म० भा० आदि पर्व १४१) वाल्मीकिरामायण के अनुसार भी वाल्मीकि राम के समकालिक थे । उन्होंने राम के पुत्रों का संस्कार कर उन्हें वेदादि शास्त्र पढ़ा कर वेद के उपबृंहणार्थ उन्हें रामायण महाकाव्य पढ़ाया था ( वा० रा० उ० ) इससे सुतरां रामायण की अतिप्राचीनता सिद्ध होती है । पूर्वोक्त पुराणवचन के अनुसार राम २४ वें त्रेता में प्रकट हुए थे । उसी समय रामायण का निर्माण हुआ । पाश्चात्यों एवं तदनुयायी भारतीयों की दृष्टि में भारत के तीन संस्करण हुए हैं—पहला संस्करण व्यास- कृत चौबीस हजार श्लोकों की चतुर्विंशतिसाहस्री भारतसंहिता, दूसरा संस्करण वैशम्पायन-जनमेजय-संवादरूप और तीसरा संस्करण सौति-शौनकसंवादरूप । वही महाभारत है । अन्तिम दोनों व्यास की कृति नहीं हैं । इस तरह कुछ लोगों के अनुसार व्यास, वैशम्पायन एवं सौति इन तीनों कवियों ने महाभारत की रचना की है। व्यासकृत ग्रन्थ का नाम जय था, वैशम्पायन विरचित भारत ग्रन्थ था एवं सौतिकृत ग्रन्थ महाभारत है । उसी में जय एवं भारत दोनों ग्रन्थ लीन हो गये । प्रमाण में कहा जा सकता है— “वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् । सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ॥ प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च । संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ॥ (म० भा० १।१६३,८९,९०) इससे मालूम होता है कि सुमन्तु आदि ने पृथक्-पृथक् भारतीय संहिताएँ प्रकाशित की हैं। इससे भी भारत की कई संहिताएँ प्रतीत होती हैं । सुमन्तु-जैमिनि-वैशम्पायन-पैल-सूत्रभाष्य-भारत-महाभारतधर्माचार्याः इस आश्वलायनसूत्र के अनुसार भारत और महाभारत का पृथक्-पृथक् उल्लेख है— “अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् । एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत ॥”

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८७ अनुक्रमणिका अध्याय में— ‘‘इदं शतसहस्राख्यं लोकानां पुण्यकर्मणाम् । उपाख्यानैः सह ज्ञेयं श्राव्यं भारतमुत्तमम् ॥ चतुर्विंशतिसाहस्रं चक्रे भारतसंहिताम् । उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः ॥ मन्वादि भारतं केचिद् आस्तीकादि तथापरे । तथोपरिचरादन्ये विप्रा सम्यगधीयते ॥’’ (म० भा० १।१।५२) कोई प्रथम मन्त्र से, कोई आस्तीक की कथा से और कोई उपरिचर वसु की कथा से भारत कहते हैं । परन्तु उपर्युक्त वचनों पर भी विचार करने से महाभारत अनेक कवियों की कृति है, यह नहीं सिद्ध होता, क्योंकि— ‘‘संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ।’’ इस वचन से भारत की संहिताओं का प्रकाशन ही कहा गया है, निर्माण नहीं; अतः सुमन्तु आदि भारत की पृथक्-पृथक् संहिताओं के प्रकाशक ही माने जा सकते हैं, प्रणेता नहीं । जो उक्त जय, भारत और महाभारत का भेद मानते हैं उन्हें यह भी बताना चाहिये कि उस स्थिति में तो यही कहना चाहिये था कि व्यास ने सुमन्तु आदि को जयग्रन्थ पढ़ाया था, महाभारत नहीं । तथा च— ‘‘वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् ।’’ इस उक्ति का क्या अर्थ होगा ? इससे तो महाभारत को ही पञ्चम वेद और उसी का पढ़ाना कहा गया है । व्यास से जिस महाभारत का सुमन्तु आदि ने अध्ययन किया वह व्यासनिर्मित है या अन्यनिर्मित ? सौतिनिर्मित महाभारत को पञ्चम वेद मानकर व्यास ने पढ़ाया यह कहना निराधार है और उपहासास्पद भी है । भारतसंहिता का क्या अर्थ है ? यदि सुमन्तु आदि ने भारतसम्बन्धिनी संहिताओं का प्रकाशन किया तो इससे यही निश्चित होता है कि भारत नहीं, किन्तु भारत से भिन्न संहिताओं का ही उन्होंने प्रकाशन किया । यहाँ यह भी प्रश्न होगा कि संहितासम्बन्धी भारत कौन है ? जिसे उन्होंने व्यास से पढ़ा था, वही था या स्वविरचित भारत नाम का कोई और ही ग्रन्थ था ? यदि प्रथम पक्ष मान्य है । तब तो यह नहीं सिद्ध होता है कि महाभारत अनेक कवियों की कृति है । पक्षान्तर भी असंगत है, क्योंकि स्वनिर्मित ग्रन्थान्तर के व्यास से अध्ययन का कोई प्रयोजन नहीं सिद्ध होता । यदि भारतस्य संहिता इस वाक्य में अभेद अर्थ में ही षष्ठी मानें तब भी मूल भारत ग्रन्थ ही संहिता है या व्याख्यानरूपा संहिता है ? प्रथम पक्ष के अनुसार यह अर्थ होगा कि व्यासकृत मूल भारत ग्रन्थ का अध्ययन करके उनके शिष्यों ने मूल ग्रन्थ का निर्माण किया, जो कि उपहासास्पद है । यदि व्याख्याग्रन्थरूप संहिता है तो इससे मूलभारत ग्रन्थ अनेक कवियों की कृति है, यह नहीं सिद्ध होता । इस दृष्टि से तो व्यास ने सुमन्तु आदि को भारत पढ़ाया और उन्होंने तत्सम्बन्धी व्याख्याभूत संहिताएँ बनायीं । यह भी प्रश्न है कि ‘‘वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्’’ यह क्यों कहा गया है ? यदि कहा जाय कि उनके द्वारा अधीत सब ग्रन्थों का निर्देश करना उद्देश्य है तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि अष्टादशपुराण और ब्रह्म- सूत्रादि भी अधीत ग्रन्थ हैं ही । फिर उनका निर्देश न होने से न्यूनता दोष होगा । अतः वेदों के साथ पञ्चम वेद महाभारत का अध्ययन किया और संहिताएँ प्रकाशित कीं । इस तरह अध्ययन और संहिताप्रकाशन में हेतु-हेतुमद्भाव करना चाहिये, पर वह भी संगत नहीं है ।

८८८ रामायणमीमांसा द्वाविंश अतएव भारतभावदीपकार ने उस वाक्य का अर्थ किया है कि भारत की मूलभूत संहिताएँ मन्त्रब्राह्मणरूप वेद ही हैं। उन्हें सुमन्तु आदि ने प्रकाशित किया है। भारत के इस अंश का मूल यह मन्त्र या ब्राह्मण है, यह स्पष्टी- करण किया था। इससे यह दिखाया गया कि भारत प्रत्यक्ष मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदमूलक ही है। यही श्रीभागवत में कहा गया है— “भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।” भारत के व्याज से भगवान् व्यास ने वेदार्थ ही प्रकाशित किया है। आश्वलायनसूत्र से भारत और महा- भारतग्रन्थ का भेद वर्णन नहीं है, किन्तु आश्वलायनशाखियों के ब्रह्मयज्ञ में आचार्यतर्पण के प्रसङ्ग में वह सूत्र है। 'सुमन्तु-जैमिनि-वैशम्पायन-पैल-सूत्र-भाष्य-भारत-महाभारतधर्माचार्याः' इसके द्वारा भारत के अनेक कर्त्ता सिद्ध नहीं होते, क्योंकि उक्त सूत्रधर्माचार्यों को ही बतलाता है । सुमन्तु सूत्राचार्य, जैमिनि भाष्याचार्य, वैशम्पायन भारताचार्य और पैल महाभारताचार्य इस तरह क्रमिक अन्वय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आधुनिकों के मत में महाभारत के कर्तारूप से सौति की प्रसिद्धि है। पैल की नहीं। इसके अतिरिक्त पूर्व में सुमन्तु आदि को महाभारत सहित वेदों का अध्यापन कराना कहा गया है, फिर सूत्र में केवल वैशम्पायन को भारताचार्य और पैल को महाभारताचार्य क्यों कहा गया है ? इसका भी कोई समाधान नहीं है। वस्तुतः उक्त सूत्र के अनुसार सुमन्तु आदि के समान ही सूत्र, भाष्य, भारत और महाभारत भी धर्माचार्य ही हैं। देवीभागवत में स्पष्टरूप से उपर्युक्त अर्थ का ही समर्थन मिलता है— “सुमन्तुजैमिनी वैशम्पायनः पैलसूत्रयुक् । भाष्यभारतपूर्वेश्च महाभारत इत्यपि ॥ धर्माचार्या इमे सर्वे तृप्यन्त्विति च कीर्तयेत् ।” (देवीभाग० ११।२०) तथा च सूत्र में सुमन्तु से लेकर भारताचार्यान्त ग्रन्थ के नाम न होकर आचार्यों के नाम ही हैं। सुमन्त्वाचार्यः, जैमिन्याचार्यः, वैशम्पायनाचार्यः, सूत्राचार्य, भाष्याचार्यः, भारताचार्यः, महाभारताचार्य इतीमे आचार्याः तृप्यन्तु, ये सब आचार्य तृप्त हों। अतः उक्त सूत्र से भारत अनेक पुरुषों की कृति है यह नहीं सिद्ध होता । इसी तरह 'अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ।' इस वचन के आधार पर भी यह नहीं सिद्ध होता है कि महाभारत के कर्त्ता वैशम्पायन हैं, क्योंकि— “अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः । जन्मेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥ शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके । स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥” (अनुक्र० अ० ९७, ९८) इत्यादि अनुक्रमणिकाध्याय के वचनों से यही निश्चित होता है कि व्यास ने पहले महाभारत बनाकर मानुष लोक में प्रकट किया। सर्पसत्र में जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का आदेश दिया और वैशम्पायन ने व्यास के मुख से सुनी हुई कथा जनमेजय को सुनायी और उसी को सौति ने शौनक को सुनाया। यह सब बातें निम्नोक्त श्लोकों से स्पष्ट हैं— “कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः । कथिताश्चापि विधिवद् याश्च द्वैपायनेन वै ॥ श्रुत्वाहं ता. विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ।” (म० भा० १।१।११)