भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 956

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७९ आपस्तम्बधर्मसूत्र १।६।१९।१३।१४ पुराण के दो श्लोक उद्धृत हैं । यह कहा ही गया है कि सर्वप्राचीन मनु ने भी इतिहास-पुराण को श्राद्ध में श्रवण करना कहा है । चरकसंहिता के शारीरस्थान ४।४४ में 'श्लोका- ख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलम्' उल्लेख है। यह बुद्ध से बहुत पहले का है। आरण्यकों और ब्राह्मणों में भी पुराण शब्द है । 'ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् नाराशंसीः' (तै० आ० २।९) । "तानुपदिशति पुराणं वेदः सोऽयमिति सोऽयमिति किञ्चित् पुराणमाचक्षीत ।” ( श० ब्रा० ११।४।३।१३ ) । पराशरज्योतिषसंहिता में "वेदवेदाङ्गेतिहासपुराणशास्त्रावदातम् ।” पुराण इतिहास की चर्चा है । वा० रा० बालकाण्ड अ० २ "नरेन्द्र श्रूयतां तावत् पुराणे यन्मया श्रुतम्” ।।५।। अथर्ववेद ( १५।३०१) में अनेक विद्याओं के साथ पुराणों का भी वर्णन है । तमितिहासं पुराणं च ऋचः सामानिच्छन्दांसि । पुराणं यजुषा सह उच्छिष्टाज्जज्ञिरे तस्माद्दिवि देवाः ।। प्रसिद्ध ऐतिहासिक अलवेरूनी सं० १०८७, १८ पुराणों की स्वल्पभेदवाली दो सूचियाँ देता है। राजशेखर ९९७ काव्यमीमांसा अ० २ में कहता है 'तत्र वेदार्थानोपनिबन्धनप्रायं पुराण- मष्टादशधा ।' बालभारत में “राजशेखर अष्टादशपुराणसारसंग्रहकारिन् ।” (पृ० ४) गौतमधर्मसूत्रमस्करीभाष्य ( ८।६) 'पुराणं ब्रह्माण्डादि' । वाचस्पतिमिश्र ८०८ योगभाष्य टीका में विष्णुपुराण २।३२—५२।५४ में और १।१९-२५, ४।१ में वायुपुराण की चर्चा करते हैं । आद्यशङ्कराचार्य विष्णुसहस्रनामभाष्य में भविष्योत्तरपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण तथा पद्मपुराण की चर्चा करते हैं । ६३७ संवत् के बाणभट्ट ने हर्षचरित में लिखा है 'पवनप्रोक्तं पुराणं पपाठ । महाभारत के वनपर्व ( १९४।१९ ) में वायुप्रोक्त पुराण का उल्लेख है । महाभारत दा० पा० में पुराणविदों की दाशरथिरामविषयक गाथाएँ उद्धृत हैं । ये गाथाएँ वायुपुराण ( ८८।१९६ ) में हैं । कुमारिल ने तन्त्रवार्तिक १।३ में पुराणप्रामाण्य कहा हैं । सांख्यकारिका माठरवृत्ति ( १२।० ) में पुराण- वर्णित भविष्य, कलिक का उल्लेख है । योगभाष्य ( ३।२३ ) का एक वचन न्यायवार्तिक एवं न्यायभाष्य ( १।६ ) में मिलता है— “यस्मिन् परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम् ।” महाभाष्यकार ने भी लिखा है-- “तदपि नित्यं यस्मिन् तत्त्वं न विहन्यते ।” “स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात् स्वाध्यायमासते । स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥” यहाँ वाचस्पतिमिश्र कहते हैं 'वैयासिकीं गाथामुदाहरति' यह वचन विष्णुपुराण ( ६।६।२) में मिलता है । बाण हर्षचरित में पुरूरवा के मरने की एक कथा लिखते हैं । सुबन्धु की वासवदत्ता, अश्वघोष का बुद्धचरित तथा कौटिल्य भी इसका संकेत करते हैं । यह कथा वायुपुराण में मिलती है । “पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया विननाश ।” ( वायु० पु० ३।२०-२३ ) पाश्चात्यों ने अर्थशास्त्र को ई० ३री शती का माना है । वस्तुतः वे मौर्य सम्राट् चन्द्रगुप्त के महामात्य थे । ई० सन् पूर्व के थे । दण्डी ने दशकुमारचरित में कहा है विष्णुगुप्त ने ६००० श्लोकों के परिमाण में अर्थशास्त्र रचा—