भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 957

“आचार्यविष्णुगुप्तेन मौर्यार्थे षड्भिः श्लोकसहस्रैः संक्षिप्ता।” वात्स्यायन न्यायभाष्य में अर्थशास्त्र का वचन उद्धृत करते हैं— “पदसमूहो वाक्यमर्थसमाप्तौ” (अ० शा० अध्या० २१) । न्यायभाष्य (२।१।५४) में लिखा है— “पदसमूहो वाक्यमर्थसमाप्ताविति ।” न्यायभाष्य १।१।१ में लिखा है— “प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तितः ॥” ठीक यही श्लोक अर्थशास्त्र के विद्यासमुद्देश प्रकरण में मिलता है । न्यायवार्तिक का काल वि० २य शती से पहले का है । न्यायभाष्य विक्रम १ श० पूर्व का है । अर्थशास्त्र वि० पू० ३ श० का है । क्षमाकल्याण के दीपमालाकल्प में निर्वाण संवत् ५०९ कल्कि का होना लिखा है । नेमिचन्द्र अपने तिलो- सार ग्रन्थ में निर्वाण संवत् १००० कल्कि को मानता है । इस भेद का कारण परम्पराविच्छेद ही है । महावीरजी का निर्वाण बहुत पुराने काल की बात है । जैन भिक्षु उस काल को भूल गये । विक्रम सं० ४७० यह विवरण नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग १० अंक ४ में मिलता है । यह विवरण मुनि कल्याणविजय का है । बौद्धपरम्परा ह्वेनसांग, जो नालन्दा विश्वविद्यालय में वर्षों पढ़ता था, जिसने अनेक बौद्ध आचार्यों का साक्षात्कार किया था, उसके काल से बौद्धनिर्वाणकाल १२००, १३००, १५०२ और ९०० से १००० वर्ष पूर्व तक का काल भिन्न-भिन्न विद्वान् मानते हैं । हिन्दी अनुवाद पृष्ट ३०४ तथा शमनह्वोली कृत ह्वेनसांग का जीवनचरित, एसवील का अंग्रेजी अनुवाद सन् १९१४ पृ० ९८ बुद्धनिर्वाण काल के विषय में सन् ४०१ से लेकर कई वर्ष तक भारत में भ्रमण करनेवाले फाह्यान कहता हैं मूर्ति की स्थापना बुद्धदेव के परिनिर्वाणकाल से ३०० वर्ष पीछे हुई है । उस समय देश में चाववंशी महाराजा पुङ्ग का राज्य था । (हिन्दी अनुवाद पृ० १६ अनुवादक की टिप्पणी यों है पुङ्ग का शासन काल ७५०-७१९ तक ई० पू० था ।) अर्थात् बुद्धनिर्वाण ई० पू० ११वीं श० अधिक से अधिक ई० से १०९० वर्ष पूर्व हुआ । सिंहल देश को उपलब्ध परम्परा के अनुसार बुद्धनिर्वाण की तिथि और ही है । तत्त्वसंग्रह की भूमिका में पाश्चात्य लेखकों ने सब मतों को छोड़कर उसे ही प्रधानता दी है । जब बौद्ध सम्प्रदाय में अपने धर्मप्रवर्तक के काल के विषय में इतने मत हैं, तब अन्य ऐतिहासिक विषयों में उनका प्रामाण्य कितना हो सकता है ? इसी लिए तो दशरथजातक में सीता को राम की भगिनी कहा है । धम्मपद की टीका में वासवदत्ता को चन्द्रमहासेन की भगिनी कहा है अर्थात् इन बौद्ध ग्रन्थों का सर्वथा प्रामाण्य कहना कठिन है । वेदों में रामायणसम्बन्धी व्यक्तियों का उल्लेख “चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः” ऋ० १।१२६।४ में दशरथ का उल्लेख है । अथर्ववेद १०।२।२८ “देवानां पूरयोध्या ।” में अयोध्या राजधानी का वर्णन है । “नीचीनवारं वरुणः कबन्धं प्र ससर्ज” ऋ० सं० ५।८५।३ में कबन्ध तथा “स इहासं तु वीरवं प्रतिदंनपषडक्षं त्रिशीर्षाणम् ॥” ऋ० १०।९९।६ में त्रिशिरा का वर्णन है ।