रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 955, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें८७८ रामायणमीमांसा द्वाविंश चालुक्यवंशीय महाराज पुलकेशिन द्वितीय के बीजापुर एहोल नामक पर्वतीय क्षेत्र में स्थित जैनमन्दिर में उत्कीर्ण शिलालेख से भी महाभारत-संग्राम का यही समय सिद्ध होता है। शिलालेख के श्लोक निम्नोक्त हैं— “त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः । सप्ताब्दशतयुक्तेषु गतेष्वब्देषु पञ्चसु ॥ पञ्चाशत्सु कलौ काले षट्सु पञ्चशतीषु च । समासु समतीतासु शकानामपि भूभुजाम् ॥” अर्थात् महाभारत युद्ध से ३७३५ वर्ष बीतने पर तथा कलि में शक राजाओं-के ५५६ वर्ष बीतने पर यह शिलालेख उत्कीर्ण हुआ है। जो आज से १३५८ वर्ष पूर्वका हैं। ३७३५ में १३३८ मिला लेने पर ५०७३ वर्ष पूर्व भारत-युद्ध का होना सिद्ध होता है। आश्चर्य है कि इस प्रकार समस्त प्राचीन भारतीय साहित्यकार, रामायण तथा महाभारत को वाल्मीकि और व्यासकृत मानते हैं किन्तु कुछ पाश्चात्य तथा उनके अनुयायी अपना हठ नहीं छोड़ते । पुराणों की मान्यता नवीं शताब्दी में मेधातिथि लिखते हैं 'पुराणानि व्यासादिप्रणीतानि' (३।२२२) । ६८७ के ऋग्भाष्यकार स्कन्दस्वामी पुराणों का उद्धरण करते हैं—१।२०।७ पुराणेषु प्रसिद्धम्, (१।२५।१३), पौराणिकाः कक्षीवन्तमङ्गिरसं स्मरन्ति (१।११६।७) । सांख्यकारिका २२ के भाष्य में गौडपादाचार्य पुराणों का उल्लेख करते हैं। दुर्गाचार्य वसिष्ठोत्पत्ति की कथा देकर कहते हैं—इति पुराणे श्रूयते (निरुक्त ५।१४) । यह कथा मत्स्यपुराण (२०।२३-२९) में मिलती है । विक्रम १ श० वररुचि 'निरुक्तसमुच्चय' में कहते हैं—'तथा चाहुः पौराणिकाः ।' न्यायभाष्यकार वात्स्यायन पुरातन ब्राह्मण ग्रन्थ का वाक्य लिखते हैं और कहते हैं कि प्रमाणभूत ब्राह्मण से इतिहास और पुराण का प्रामाण्य सिद्ध होता है। जो ऋषि मन्त्र तथा ब्राह्मणों के द्रष्टा और प्रवक्ता हैं वे ही इतिहास-पुराण तथा धर्मशास्त्र के कर्त्ता हैं— “प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते । ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एनदितिहासपुराणमभ्यवदन् 'इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः' इति । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति ।” पतञ्जलि पुरातन वाङ्मय का परिगणन करते हुए पुराण और इतिहास की भी चर्चा करते हैं:— “वाकोवाक्यमितिहासः पुराणं वैद्यकमिति ।” कौटिल्य भी इन पुराणों का उल्लेख करते हैं 'इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रवित् ।' अ० ९६ । वह पौराणिक सूत और सारथि सूत में भेद भी करते हैं 'ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सूतः पौराणिकस्त्वन्यः सूतो मागधश्च ब्रह्मक्षत्राद्विशेषतः ।' पौराणिक सूत अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने से विशिष्ट है (अध्याय ६४) । याज्ञवल्क्य उनसे भी प्राचीन हैं। वे भी पुराणों को जानते हैं— “पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानाम् ।”( १।३ ) गौतमधर्मसूत्रभाष्यकार मस्करी सूत्र १।३९ में कण्वधर्मसूत्र का एक वचन देता है 'अथर्ववेदेतिहास- पुराणानि ध्यायन्' इससे प्रतीत होता है—कण्वसूत्रकार को पुराण विदित थे । गौतमध० सू० ८।६ और ११।२१ में पुराणशब्द मिलता है ।