भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 954

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७७ स्वस्ति श्रीजयाभ्युदये युधिष्ठिरशके प्लवङ्गाख्ये एकोननवतित्संवत्सरे सहस्य (पौष) मासे अमावश्यायां सोम्यवासरे श्रीमन्महाराजाधिराजपरमेश्वरो वीरप्रतापशाली कुरुकुलोद्भवो वैयाघ्रपाद- गोत्रजः श्रीजनमेजयभूपः किष्किन्धानगर्यां सिंहासनस्थः सकलवर्णाश्रमधर्मप्रतिपालकः पश्चिमदेशस्थ- सीतापुरकेदारक्षेत्रे तत्रत्यमुनिवृन्दमठस्य गरुड़वाहनतीर्थश्रीमद्शिष्यकैकयनाथैराराधितसीतारामस्य पूजार्थं कृतभूदानसाधनमस्मत्प्रपितामहयुधिष्ठिराधिष्ठितमुनिवृन्दक्षेत्रेऽस्मिन् चतुःसीमापरमितिक्रमः पूर्वभागे उत्तरवाहिन्याः तुङ्गभद्रायाः पश्चिमे दक्षिणभागे अगस्त्याश्रमसंगमादुत्तरे पश्चिमे पाषाणनद्याः पूर्वे उत्तरभागे भिन्ननद्या दक्षिणे एतन्मध्यस्थमुनिवृन्दक्षेत्रे भवच्छिष्यपरम्परया आचन्द्रार्कपर्यन्तं निधिनिक्षेप-जल-पाषाण-अक्षिणी आगामिसिद्धसाध्यतेजःस्वाम्यसहितं स्वबुद्ध्यनुकूलेन अस्मन्मातापित्रोः विष्णुलोकप्राप्त्यर्थं हरिहरसन्निधौ उपरागसमये सहिरण्येन तुङ्गभद्राजलधारापूर्वकं क्षेत्रं यतिहस्ते दत्तवानस्मि। एतद्धर्मसाधनस्य साक्षिणः आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ।। दानपालनयोर्मध्ये दानाच्छ्रेयोऽनुपालनम् । दानात्स्वर्गमवाप्नोति पालनादच्युतं पदम् । स्वदत्ताद् द्विगुणं पुण्यं परदत्तानुपालनम् । परदत्तापहारेण स्वदत्तं निष्फलं भवेत् । स्वदत्ता पुत्रिका ज्ञेया पितृदत्ता सहोदरा । अन्यदत्ता तु जननी दत्तभूमि परित्यजेत् । अन्येस्तु छर्दितं शूद्रैः श्वभिश्च छर्दितं ननु । ततः कष्टस्ततो नीचः स्वयं दत्तापहारकः । स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्ति हरेच्च यः । षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ।। इति ।। उक्त ताम्रपत्र जनमेजय राजा का है। उसमें कृष्ण की वन्दना करके युधिष्ठिर शक प्लवङ्गम संवत् में नवासी वर्ष में सहस्य मास (पौष मास) अमावस्या सौम्य वासर के दिन वैयाघ्रपादगोत्रज कुरुकुलोद्भव राजा जनमेजय ने किष्किन्धा नगरी में सिंहासनस्थ होकर तुङ्गभद्रा अगस्त्याश्रम आदि अमुक अमुक तीर्थ सीमायुक्त हिरण्यसहित भूक्षेत्र का दान किया आदि आदि । इसमें जनमेजय द्वारा सीताराम की पूजा के लिए भूक्षेत्र का दान कहा गया है। सुतरां सीताराम-पूजा ईसा से हजारों वर्ष पूर्व से प्रचलित सिद्ध होती है, अतः बुल्के का यह कहना निराधार ही है कि ई० पू० पहली या दूसरी शती में राम की पूजा होने लगी थी। कुछ लोग कहते हैं प्लवङ्गम संवत्सर सहित उक्त योग अब से पहले तेरहवीं शती में आया था, अतः वही महाभारत का समय है। परन्तु वाराणसेय राजकीय संस्कृत महाविद्यालयीय गणिताध्यापक बापूदेव शास्त्री ने उस मत का निराकरण कर के ताम्रशासन का काल ही निर्धारित किया है। उपर्युक्त अनेक उद्धरणों, शिलालेखों एवं ताम्रलेखों से २०२९ वर्तमान विक्रमीय संवत्सर से ३०४४ वर्ष पूर्व ५०७३ कलि संवत्सर युधिष्ठिर संवत् सिद्ध है। धृतराष्ट्र के मरणोपरान्त युधिष्ठिर के राज्यकाल में महाभारत का निर्माण हो चुका था। गीता तो इससे भी पहले युद्धारम्भ के दिन ही प्रकट हुई थी। महाभारत तथा गीता में चर्चित राम एवं उनके समय का ही रामायणग्रन्थ अति प्राचीन सिद्ध होते हैं। तथा च पाश्चात्यों की यह कल्पना अत्यन्त असंगत है कि बुद्ध के पश्चात् ईसा से पूर्व तीसरी शती में रामायण का निर्माण हुआ है। पुराणों के आधार पर भी रामायण एवं राम की अतिप्राचीनता सिद्ध होती है— "द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके । प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मथुरायां भविष्यति ।। (म० भा० शा० ३२९।८९) द्वापर और कलि की सन्धि में कंसवधार्थ मथुरा में कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है। इस वचन से कृष्ण का भी आविर्भाव काल वही सिद्ध होता है।