भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८७६ रामायणमीमांसा द्वाविंश षडेतान् पुरुषो जह्याद् भिन्नां नावमिवार्णवे । अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥४४॥ अरक्षितारं राजानं भार्या चाप्रियवादिनीम् । ग्रामकामञ्च गोपालं वनकामञ्च नापितम् ॥४५॥ (शा० ५७) “सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव तत्।।” (शा० १४३।६७, ६८) इस तरह महाभारत में प्राचीन विशिष्ट पुरुषों का वर्णन है। आधुनिक व्यक्तियों का उल्लेख नहीं है। अतः महाभारत की प्राचीनता सिद्ध है। भास कवि के बालचरित नाटक में कृष्ण की बालकीड़ाओं का वर्णन है। गोपियों का भी उल्लेख है। इससे निःसन्देह सिद्ध होता है कि भास से पहले ही महाभारत एवं हरिवंश की कथाएँ खूब प्रचलित थीं। भास के नाटकों के प्रकाशक गणपति शास्त्री ने स्वप्नवासवदत्त नाटक की भूमिका में लिखा है कि भास के नाटक का एक श्लोक कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उद्धृत है। इससे भास चाणक्य से भी प्राचीन सिद्ध होते हैं। कुछ जैनों के अनुसार महावीर स्वामी विक्रम संवत् से ४०७ वर्ष पूर्व के हैं। महावीर स्वामी ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र को मिथ्या शास्त्र कहा है। इससे कौटिल्य उनसे भी पूर्व के सिद्ध होते हैं। प्रो० वेबर ने सन् १८६० में जर्मनी देश में अश्वघोष-व्याख्या सहित वज्रसूचिकोपनिषद् प्रकाशित किया था। उस व्याख्या में ‘सप्त व्याधा दशार्णेषु’ श्लोक उद्धृत है। जो कि हरिवंश २४।२०,२१ शान्ति पर्व का है। अतः अश्वघोष के समय महाभारत एवं हरिवंश प्रख्यात थे। बौधायनगृह्यसूत्र में विष्णुसहस्रनामस्तव का उल्लेख है तथा गीता के ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयम्’ इस श्लोक का उद्धरण है। इससे ईस्वीय सन् से अति प्राचीन बौधायन से भी प्राचीन महाभारत सिद्ध होता है। इस तरह अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग सभी परीक्षाओं से लक्षश्लोकात्मक महाभारत पाँच हजार वर्ष प्राचीन सिद्ध होता है। ५०७३ वर्ष पूर्व कृष्ण का लीलासंवरण हुआ। वर्तमान कल्पारम्भ से अब तक १९७२९४९०७३ एवं सृष्ट्यारम्भ से अब तक १९५५८८५०७३ वर्ष व्यतीत हुए हैं। इतने समय में ६ मनु बीत गये। सप्तम वैवस्वत मनु के २७ महायुग व्यतीत हो गये। २८ वें महायुग के तीन युग बीत गये। चतुर्थ युग कलि के ५०७३ वर्ष बीत गये। यही युधिष्ठिर का संवत्सर है। विक्रमी प्रारम्भ से २०२९ तथा शकारम्भ से १८९४ वर्ष व्यतीत हुए हैं। “सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः ।” (पातञ्जल सू० २।४२) के व्यासभाष्य में एक वचन उद्धृत है— “यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥” यह श्लोक महाभारत शा० प० १०४।१४६; १७७।५२ में मिलता है। धर्मराज युधिष्ठिर के प्रपौत्र महा- राज जनमेजय का ताम्र शासनपत्र सबसे बड़ा प्रमाण है। उसकी प्रतिलिपि सन् १८७५ नवम्बर में मुद्रित इण्डियन एण्टिक्वेरी पुस्तक में निम्नरूप में है— श्रीगणाधिपतये नमः । “पान्तु नो जलदश्यामाः शार्ङ्गं ज्याघातकर्कशाः । त्रैलोक्यमण्डपस्तम्भाश्चत्वारो हरिबाहवः ॥”