रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 952, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७५ चक्रपाणि आदि टीकाकारों ने लिखा है यह सहस्रनाम भारत में है । विष्णुसहस्रनाम में 'रामो विरामो विरतः' राम का नाम आता है । फलतः राम और रामायण आदि प्राचीन हैं । विष्णुगुप्त (कौटिल्य) के अर्थशास्त्र में महाभारत की छायावाले श्लोक हैं— “एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्को धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्रं सराजकम् ॥” ( उद्योग पर्व ३३।४२ ) “एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुः क्षिप्तो धनुष्मता । प्राज्ञेन तु मतिः क्षिप्ता हन्याद् गर्भगतानपि ॥३२४॥” ( अर्थशास्त्र १०।६ ) पाणिनि इनसे पूर्व के हैं । वे सूत्र ६।२।३८ में महाभारत शब्दसिद्धि लिखते हैं । 'महान्व्रीहि-अपराह्न- गृष्टि-इष्वास····भार-भारत····रौरव प्रवृद्धेषु' सूत्र में महाभारत के महान् शब्द में प्रकृतिस्वर का विधान किया गया है । उसमें 'विष्वक्सेनार्जुनौ' २।२।३१, 'सात्यकि' २।४।५९, 'भीमभीष्म' ३।४।७४, 'जरत्कारु' ४।१।११२, 'गाण्डीव' २।४।३१, 'श्वाफल्कि' २।४।६२, 'रुक्मिणी' ४।१।१२३ आदि शब्दों की सिद्धि पाणिनि ने की है। इन सबका महाभारत से विशेष सम्बन्ध है । आश्वलायनगृह्यसूत्र में भारत तथा महाभारत दो नाम मिलते हैं ३।३।५ । ये शौनक शिष्य थे । शौनक महाभारतयुद्ध से ३०० वर्ष पश्चात् दीर्घ सत्र कर रहे थे । कौषीतकि गृ० सूत्र २।५।३ में महाभारत नाम पठित है । इससे निश्चित होता है कि कौरव और पाण्डवों के युद्ध के पश्चात् ३०० वर्ष के भीतर महाभारत नाम प्रख्यात था । आन्ध्र और गुप्त काल के शिलालेखों में महाभारत काल के अनेक व्यक्तियों का स्मरण किया गया है । इससे स्पष्ट है कि उस समय के पण्डित महाभारत के इतिहास में विश्वस्त थे । वेबर आदि महाभारत में यवन शब्द का प्रयोग देखकर सिकन्दर के आगमन के बाद का महाभारत समझते हैं । पर यह भ्रान्ति है । क्योंकि यवन शब्द यूनानियों के अर्थ में प्रयुक्त नहीं, किन्तु मनु १०।४३,४४ से मालूम पड़ता है वे कभी आर्य ही थे । कालान्तर में यवन आदि बन गये । अतएव देवकीपुत्र कृष्ण में कारुमान् यवन को मारा था । अतएव यवन शब्द के आधार पर अष्टाध्यायी और मनुस्मृति का कालनिर्णय करना सर्वथा असंगत है । महाभारत में अर्थशास्त्र या राजशास्त्र के अनेक आचार्यों की चर्चा है । “बृहस्पतिर्हि भगवान् न्याय्यं धर्मं प्रशंसति । विशालाक्षश्च भगवान् काव्यश्चैव महातपाः ॥ सहस्राक्षो महेन्द्रश्च तथा प्राचेतसो मनुः । भरद्वाजश्च भगवान् तथा गौरशिरा मुनिः ॥ राजशास्त्रप्रणेतारो ब्रह्मण्या ब्रह्मवादिनः ।” ( म० भा० शा० ५८ ) इसी प्रकार महाभारत में वाल्मीकि के श्लोकों का भी उद्धरण है— “श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना । आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत ॥ राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ॥” ४१ ( शा० ५७ ) “प्राचेतसेन मुनिना श्लोको चेमावुदाहृतौ । राजधर्मेषु राजेन्द्र तदिहैकमनाः शृणु ॥४३॥