रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८७४ रामायणमीमांसा द्वाविंश ८८७ प्रचलित शकाब्द के भट्टोत्पल ने वराहमिहिर के ग्रन्थों पर विवृत्ति लिखी है। उसमें उन्होंने किसी यवनेश्वर का मत लिखा है। “यवनेश्वरेण स्फुजिध्वजेनान्यच्छास्त्रं कृतम्। तथा च स्फुजिध्वजः गतेन साम्यर्धशतेन युक्ता- प्यङ्केन वेषां न गताब्दसंख्याकालः शकानां १०४४ संविशोध्य तस्मादतीतवर्षाद् युगवर्ष जातम्। एवं स्फुजिध्वजकृतं शककालस्यार्वाग् ज्ञायते।।” इससे यह स्पष्ट विदित होता है कि स्फुजिध्वज का समय उन्होंने नहीं लिखा तथापि भट्टोत्पल से अति प्राचीन स्फुजिध्वज थे। उनके समय में किसी शक के १०४४ शकाब्द व्यतीत हुए थे। अतः ईसा के पूर्व कई शकाब्द थे। उनमें से ही एक वराहमिहिर द्वारा निर्दिष्ट काल है। जिसके अनुसार वराहमिहिर ने युधिष्ठिर की स्थिति बतायी है। श्रीशङ्करबालकृष्ण दीक्षित ने रघुनाथ टेंभुकर द्वारा परम्पराप्राप्त एक श्लोक अपने ( भारतीय ज्योतिष ) ग्रन्थ पृष्ठ २९४ में उद्धृत किया है— “स्वस्तिश्रीनृपसूर्यसूनुजशके याते द्विवेदाम्बर- त्रेमानाब्दमिते त्वनेहसि जये वर्षे वसन्तादिके। चैत्रे श्वेतदले शुभे वसुतिथावादित्यदासाद्भूद् वेदाङ्गे निपुणो वराहमिहिरो विप्रो रवेराशिषा॥” अर्थात् सूर्यपुत्र धर्म उनके पुत्र राजा युधिष्ठिर संवत् ३०४२ वर्ष बीतने पर जय नाम संवत् के चैत्र शुक्ल ८मी को सूर्य के आशीर्वाद से आदित्यदास नामक विप्र से वेदवेदाङ्गनिपुण वराहमिहिर उत्पन्न हुए। वराहमिहिर दीर्घायु थे अतएव ईस्वी सन् प्रारम्भ से १४८ वर्ष पूर्व उन्होंने पञ्चसिद्धान्तिका लिखी। बीच में अन्य अनेक ग्रन्थ लिखे। वे ई० ५७ पूर्व विक्रमादित्य सिंहासनारोहण के पश्चात् उनकी सभा के रत्नरूप में थे। आज भी रूस आदि देशों में १५०, २०० वर्ष की आयुवाले लोग मिलते हैं। वराहमिहिर की स्थिति दीर्घकाल तक रही हो, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। पुष्यमित्र के पुरोहित पतञ्जलि महाभाष्य में किसी प्राचीन नाटक का श्लोक उद्धृत करते हैं— “यस्मिन् दशसहस्राणि पुत्रे जाते गवां ददौ। ब्राह्मणेभ्यः प्रियाख्येभ्यः सोऽयमुञ्छेन जीवति॥” यह श्लोक “यस्मिञ्जाते ददौ द्रोणो गवां दशशतं धनम्। ब्राह्मणेभ्यो महार्हेभ्यः सोऽश्वत्थामैष गर्जति॥” द्रोणपर्व १९६।२९ वें श्लोक से मिलता है। ३।३।१६७ पा० सू० में 'कालः पचति भूतानि' श्लोक उद्धृत है, जो महाभारत आदि पर्व १।२४८ में है- “कालः पचति भूतानि कालः संहरति प्रजाः।” चरक संहिता का तीसरा अध्याय दृढ़बल से पूर्व का है। यह पतञ्जलि से भी पहले का है, इसमें विष्णु- सहस्रनाम के पाठ का विधान है। “विष्णुं सहस्रमूर्धानं चराचरपति विभुम्। स्तुवन्नामसहस्रेण ज्वरान् सर्वान् व्यपोहति॥४।२॥