रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 950, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंपर युधिष्ठिर शक या कलिगत संवत् ५०७३ होता है। इस समय से २५४७ वर्ष पूर्व विक्रम संवत्सर आरम्भ से ५१८ वर्ष पूर्व ईसवीय सन् से ५७५ वर्ष पूर्व किसी शक संवत्सर की प्रवृत्ति वराहमिहिराचार्य को मान्य है। इस दृष्टि से स्पष्ट हो जाता है कि वराहमिहिर की स्थिति का काल ईसा की पांचवीं या छठी शती नहीं है। किन्तु ईसा के जन्म से पूर्व विक्रम एवं कालिदास की स्थिति का काल ही उनकी स्थिति का काल है। उसी काल का संकेत खाद्यखण्ड टीका में है। उस शक संवत्सर के अनुसार ४०९ में वराहमिहिर स्वर्गवासी हुए थे। युधिष्ठिरशासन के समय सप्तर्षि मघा पर थे। इसका समर्थक वृद्धगर्ग का भी वचन है, जिसका उद्धरण भट्टोत्पल ने बृहत्संहिता की टीका में किया है— “कलिद्वापरसन्धौ तु स्थितास्ते पितृदैवतम्। मुनयो धर्मनिरताः प्रजानां पालने रताः॥ एकैकस्मिन्नृक्षे शतं शतं ते चरन्ति वर्षाणाम्।” बृहत्संहिता १३।४) इस वचन से एक-एक नक्षत्र पर सप्तर्षियों की स्थिति सौ-सौ वर्ष रहती है। श्रीमद्भागवत में भी इसी का समर्थन है— “ते त्वदीये द्विजाः काले अधुना चाश्रिता मघाः ।” (भाग० १२।२।२८) हे राजन् परीक्षित्, तुम्हारे जन्म के समय और अब मृत्यु के समय भी सप्तर्षि मघा पर ही हैं। राजा सुधन्वा के दानपत्र से (संस्कृतचन्द्रिका खण्ड १-३) तथा राजा सर्वजित् वर्मा के दानपत्र से (संस्कृतचन्द्रिका खण्ड १४ संख्या २-२) और पञ्चाङ्गों की प्रचलित अविच्छिन्न परम्परा के अनुसार भी युधिष्ठिर संवत् और कलि संवत् का ऐक्य ही सिद्ध होता है। पीछे कहा गया है कि ईसवी सन् से ५७५ वर्ष पूर्व कोई शक संवत्सर आरम्भ हुआ था उसमें २५२६ जोड़ने से ३१०१ होता है। वराहमिहिर और आमराज ने उसी संवत् की चर्चा की है। इस शक शब्द से बहुतों को प्रचलित शक संवत्सर का ही भ्रम हुआ है। कल्हण को भी उसी से भ्रम हुआ है। इस लिए उन्होंने ६५३ वर्ष काल घटाकर पाण्डवकाल घोषित किया था। पञ्चसिद्धान्तिका में वराहमिहिर ने उसका निर्माण-काल निम्नोक्त कहा है— “सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ । अर्धास्तमिते भानौ यवनपुरे सौम्यदिवसाद्यः ॥” अर्थात् शक काल में ४२७ घटाने पर चैत्र शुक्ल १ प्रतिपदा को बुधवासर था, भानु का अर्ध अस्तंगमन हो रहा था, भारत में अर्धोदय हो रहा था इस समय इसका निर्माण प्रारम्भ हुआ है। पं० सुधाकर द्विवेदी ने शक शब्द से शालिवाहन शक ग्रहण कर के देखा तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को बुधवार नहीं मिला तब उन्होंने सौम्य का अर्थ सोमवार ग्रहण किया है। इस तरह वराहमिहिर के शब्द का उन्हें परिवर्तन करना पड़ा। परन्तु मद्रास के प्रसिद्ध गणितवेत्ता श्रीवेङ्कटाचार्य ने अपने ‘दी एण्टी क्यूटी ऑफ हिन्दू एस्ट्रोनोमी एण्ड दी तामिल’ ग्रन्थ में ईसवी सन् पूर्वभावी शक को ही शक शब्द से लेकर गणना करके यह घोषित किया है कि ४२७ वर्ष व्यवकलन करने (घटाने) पर अर्थात् ईसा सन् के प्रारम्भ से १२४ वर्ष पूर्व ३ मार्च बुधवार को शुक्लप्रतिपदा थी और उस समय यवनपुर में सूर्य का अर्धास्तगमन भी होता था। अलबरूनी ने भी ३२७ शक काल में पञ्चसिद्धान्तिका का निर्माण माना है। परन्तु यह शक विक्रम संवत् के पूर्व का है। जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। ११०