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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८७२ रामायणमीमांसा द्वाविंश उसी ग्रन्थ में विक्रमसभा के नवरत्नों की भी गणना है— “धन्वन्तरिक्षपणकामरसिंहशङ्कुवेतालभट्टघटखर्परकालिदासाः । ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥” उपर्युक्त वचनों में धन्वन्तरि १, क्षपणक २, अमरसिंह ३, शङ्कु ४, वेतालभट्ट ५, घटखर्पर ६, कालिदास ७, वराहमिहिर ८ वररुचि ९ ये विक्रमादित्य की सभा के नौ रत्न हैं। पहले श्लोक में मणि, अङ्गदत्त, विष्णु, त्रिलोचन और हरि अन्य विद्वानों के नाम हैं। ११७३ के महाराज लक्ष्मणसेन के सभापण्डित कवि धोयी ने जिनकी चर्चा जयदेव ने धोयीकविक्ष्मापतिः कहकर की है, अपने को वररुचि के तुल्य प्रशंसित बतलाते हुए वररुचि की चर्चा की है— “ख्यातो यश्च श्रुतधरतया विक्रमादित्यगोष्ठी- विद्याभर्तुः खलु वररुचेराससाद प्रतिष्ठाम् ॥” कथासरित्सागर में वररुचि को सकृच्छ्रुतधर कहा गया है। जिनप्रभसूरि विरचित विविधतीर्थकल्प ग्रन्थ की अनुश्रुति के अनुसार सिद्धसेन दिवाकर के आज्ञानुसार वररुचि ने विक्रमादित्य की शासनपट्टिका (जिसमें विक्रमादित्य के शासन सिद्धान्त का निर्देश है) विक्रम प्रथम संवत् के चैत्रशुक्ल प्रतिपदा तिथि में लिखी है। जिनप्रभ ने स्वयं उसे देखा था। कात्यायन ही वररुचि हैं। वे स्वयं पत्रकौमुदी ग्रन्थ में लिखते हैं— “विक्रमादित्यभूपस्य कीर्तिसिद्धेर्निदेशतः । श्रीमान् वररुचिर्धीमान् तनोति पत्रकौमुदीम् ॥” विक्रमसभा के नवरत्नों में ८वें वराहमिहिर हैं। प्रसिद्ध पञ्चतन्त्र नीति ग्रन्थ का पारसी भाषा में अनुवाद ईसा की पाँचवीं शती में हुआ है, यह निर्विवाद है। उस पञ्चतन्त्र में मित्रभेद-प्रसङ्ग में वराहमिहिर का नाम ग्रहणपूर्वक उनके चार श्लोक उद्धृत हैं। “रोहिणीशकटमर्कनन्दनश्चेद् भिनत्ति रुधिरोऽथवा शशी । किं वदामि तदनिष्टसागरे सर्वलोक उपयाति संक्षयम् ॥” इत्यादि । ग्रन्थ खण्डखाद्य की आमराजकृत टीका में लिखा है— “नवाधिकपञ्चशतसंख्याके शके वराहमिहिरो दिवं गतः ।” अर्थात् ५०९ शक संवत्सर में वराहमिहिर स्वर्ग चले गये। यदि इस वाक्य के शक का अर्थ प्रचलित शक संवत्सर गृहीत है तब तो ५८७ ईसवीय वर्ष में उनकी मृत्यु मानना होगा। ऐसी स्थिति में ईसा की पाँचवी शती में पारसी भाषा में अनूदित पञ्चतन्त्र में वराहमिहिर का नाम कैसे आ सकता था। मूल पञ्चतन्त्र जिसका पाँचवीं ईसवी में पारसी भाषा में अनुवाद हुआ था और भी प्राचीन सिद्ध होता है। फिर उसमें ईसा की छठी शती में मृत वराह- मिहिर का नाम कैसे आ सकता है ? अतः यही विदित होता है कि वर्तमान शक संवत्सर से भिन्न कोई शक संवत्सर ईसा से पूर्व ही प्रचलित था । शक शब्द से संवत्सर ही गृहीत है । शकविशेष नहीं। उसी का उल्लेख खण्डखाद्य की टीका में किया गया है। वराहमिहिर ने भी अपने बृहत्संहिता ग्रन्थ में उसका उल्लेख किया है । “आसन् मघासु मुनयः शासति पृथिवीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्ञश्च ॥” (बृ० सं० १३।३) अर्थात् प्रस्तुत महाराज युधिष्ठिर का समय क्या है ? इस जिज्ञासा का उत्तर देते हुए वराहमिहिर ने कहा था कि शककाल में २५२६ संख्या जोड़ देने से युधिष्ठिर का काल निकल आता है। २०२९ विक्रम संवत्सर बीतने