भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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ब्राह्म वर्ष = ८६४,००००००० X ३६० = ३११०४,०००००००० वर्ष ( ३१ खरब, १० अरब, ४० करोड़ वर्ष ) ब्रह्मा का प्रथम परार्ध = ६११०४,०००००००० x ५० = १५५५२०००००००००० वर्ष ( १५ नील, ५५ खरब, २० अरब वर्ष ) ∵ १४ मनु = ४३२,००००००० ∴ १ ,, = $\frac{४३२०००००००}{१४}$ ३० करोड़, ८५ लाख, ७१ हजार, ४२८ वर्ष, २०५ दिन, २१ मुहूर्त, १२ कला, २५ काष्ठा, १२ ६/७ निमेष । ब्रह्मा का इस संवत् २०२९ विक्रम तक का काल = १५ नील, ५५ खरब, २० अरब, १२ करोड़, ५ लाख, तेंतीस हजार ७३ वर्ष ब्रह्मायु का काल विष्णु का एक घड़ी काल होता है। १२ लाख विष्णु का काल रुद्र का कलार्ध होता है। अर्बुदरुद्रों का अक्षर ब्रह्म होता है— “चतुर्युगसहस्रेण ब्रह्मणो दिनमुच्यते । पितामहसहस्रेण विष्णोश्च घटिका स्मृता ॥ विष्णोर्द्वादशलक्षाणि कलार्धं रौद्रमुच्यते । रुद्रस्यार्बुदसंख्यानां ततो ब्रह्माक्षरं भवेद् ॥” विश्वामित्र ने समुद्र-मन्थन का वर्णन किया है। वह वाल्मीकिरामायण के अनुसार ११ करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था, क्योंकि क्षीरसमुद्र का मन्थन वैवस्वतमन्वन्तर के द्वितीय कृत युग के अन्त में हुआ था— “प्रह्लादो निजितो युद्धे इन्द्रेणामृतमन्थने ।” ( मत्स्यपु० ४७।४५ ) । वेद में भी इसकी चर्चा है। देवता और असुर लोगों ने जलों के रस क्षीरसमुद्र का मन्थन किया था— देवाश्चासुराश्चापां रसममन्थत । तस्मान्मध्यमानादमृतमुदतिष्ठत । ततः सर्वतो रसमस्रवत् । स सोमः तत्सोमस्य सोमत्वम् ।” ( तै० सं० ), काठकब्राह्मण और वायुपुराण के अनुसार वर्तमान वैवस्वतमन्वन्तर के १६वें कृत युग में शाकुन्तल भरत थे । उन्हीं के नाम से भारत देश प्रख्यात हुआ है । उन्होंने प्रजा का विशेषरूप से भरण किया था । “षोडशतमे हि राजा दुष्यन्तश्च कृते युगे । शकुन्तलायां भरतस्तन्नाम्ना तु भारतम् ॥” ( वायु० पु० ९९।५५ ) “विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम् ।” ( ऋ० सं० ३।५३।१२ ) इस मन्त्र में भारतसम्बन्धी जन की रक्षा की बात कही गयी है । कुरु, पाञ्चाल आदि देश भारत नाम से विख्यात थे ।