भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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“शकुन्तलायां भरतनाम्ना तु भारतं कृते । षोडशतमे प्राप्ते प्रजानां भरणं कृतम् ॥” (वायु० पु० ) श्रीभागवत के पञ्चम स्कन्ध में कहा गया है कि अजनाभवर्ष नाम से प्रसिद्ध यह देश ऋषभपुत्र भरत के नाम से भारत हुआ था । कल्पभेद से दोनों व्यवस्थाएँ प्रामाणिक समझनी चाहिये । एक अन्य दृष्टि से मनु का नाम भी भरत है । उनके नाम से भी इस देश का भारतवर्ष नाम है— “भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते । निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम् ॥” (वायुपु० उपो० १०।४५।७६) पुराणों में तारकामय संग्राम का वर्णन है । उसका समय विक्रम शती से १२ करोड़ वर्ष पूर्व है, क्योंकि वृत्रवध के बाद कृतयुग में तारकामय संग्राम हुआ, यह हरिवंश में वर्णित है— “वृत्ते वृत्रवधे तावद् वर्तमाने कृते युगे । आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः ॥” ( १।४२।१० ) उस संग्राम में आङ्गिरस बृहस्पति देवताओं के सहायक थे, अतः बृहस्पति को ई० शती २-४ के मध्य में मानना अत्यन्त असंगत है । भाषाविज्ञान के अनुसार आयुर्वेद को ब्राह्मणकाल से अर्वाचीन मानना भी प्रामाणिक नहीं है । संस्कृत प्रकृति, प्रत्यय, समास, तद्धित आदि अनादि ही हैं । मन्वन्तरसम्बन्धी विचारों के अनुसार मन्वन्तरों में इन्द्र होते हैं । उनके गुरु बृहस्पति भी होते हैं । इसी प्रकार न्यायसूत्रकार गौतम एवं न्यायभाष्यकार वात्स्यायन भी अर्वाचीन नहीं हैं । तभी आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व महाभारत शान्तिपर्व में गौतम का वर्णन है— “न्यायतन्त्रं हि कात्स्न्र्येन गौतमो वेत्ति तत्त्वतः ।” ( म० भा० शान्ति० २१२।३४ ) । वैवस्वत मन्वन्तर की सन्धि में उत्पन्न बौधायन, आपस्तम्ब आदि भी प्राचीन ही हैं । दैत्यराज विरोचन की कन्या वृत्रज्वाला कुम्भकर्ण की पत्नी थी ( वा० रा० ) । उसका भ्राता बलि वैवस्वत मन्वन्तर के द्वितीय त्रेता में हुआ था । भृगु, पुलस्त्य, अङ्गिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ ये सप्तर्षि एवं स्वायम्भुव मनु आदि त्रेतायुग में उत्पन्न हुए थे । बुद्धि एवं प्रयत्न के बिना ही उन लोगों को नक्षत्रों के तुल्य वेदमन्त्रों का दर्शन हुआ था । यह वायुपुराण के उपोद्घात से सिद्ध है— “सप्तर्षीणां मनोश्चैव आद्ये त्रेतायुगस्य तु । अबुद्धिपूर्वकं तेषामक्रियापूर्वमेव च ॥ अभिव्यक्तास्तु ते मन्त्राः तारकाद्यैर्निदर्शनैः । ते मन्त्रा वै पुनस्तेषां प्रतिभासमुत्थिताः ॥” ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्रांश्चाथर्वणानि च ।” ( वा० पु० उ० ४३–४५ ) ब्रह्मा की प्रेरणा से मन्वादि ने उसी समय श्रौतस्मार्त धर्म का उपदेश किया । “आद्ये त्रेतायुगे पूर्वमासन् स्वायम्भुवोऽन्तरे ।” ( ब्रह्माण्ड पु० २।३६।९ ) “तत्र त्रेतायुगस्यादौ मनुः सप्तर्षयश्च ते । श्रौतस्मार्तंञ्च धर्मञ्च ब्रह्मणा च प्रचोदितम् ॥” ( प्राहुः ) “दाराग्निहोत्रसंयोगमृग्यजुःसामसंश्रितम्……। परम्परागतं धर्मं स्मार्तंञ्चाचारलक्षणम् ॥ वर्णाश्रमाचारयुतं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥” ( वायु० पु० १।४०, ४१ )