रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 962, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८५ अतः वर्तमान मनुस्मृति सर्वप्राचीन संविधान है । ब्रह्मर्षियों की सभा में सर्वसंमति से भृगु ने उसे लिखा था । आधुनिक दृष्टि से भी विक्रमशती से ४०० वर्ष पूर्व यूनान में हेरोडोट्स् हुआ है । उसके एमिसिस ग्रन्थ के अनुसार १७ सहस्रवर्ष पूर्व ८ या १२ देव हुए हैं। उनमें विष्णु एक थे । डायोनिसियस दानवों के और विष्णु के नेता थे । भारतीय दृष्टि के अनुसार कश्यपपत्नी दाक्षायणी अदिति के इन्द्र आदि बारह पुत्र प्रसिद्ध हैं । उनमें एक विष्णु हैं— सेवेन्टीन थाउजेन्ड इयर्स बिफोर दी रिजिन आफ अमेसिस दी ट्वेल्व गाड्स् वेयर दे ए फेर्म प्रोड्यूस्ड फ्रॉम दि एट ऑपरीजवेल्व हिक्यूलिस इज वन बुक ११ चेप्टर ४३ ईरानी और फारसी भाषा में विवस्वत् के लिए विवहन्त का प्रयोग किया गया है । उसके चार मनु, श्राद्धदेव यम और अश्विद्वय हुए थे । प्रायः पुराणों के पुरुषों की संख्या के अनुसार कालनिर्धारण की गलती आधुनिक लोग करते हैं । परन्तु यह वेद प्रमाण से सिद्ध है कि कई लोगों की आयु सामान्य मनुष्यों से बड़ी होती थी । जैसे दीर्घतमा महर्षि की आयु दस पुरुषायु के बराबर थी— “त उ दीर्घतमा दशपुरुषायुषाणि जिजीव ।” ( शाङ्ख्यायनारण्यक २।१७ ) । ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार “मामतेयो भरतं दौष्यन्तिमाभिषिषेच” ( ८।२३ ) । कक्षीवान् वैवस्वत मन्वन्तर के तृतीय द्वापर में हुए थे जो कि विक्रम सं० से १२ करोड़ वर्ष पूर्व का काल होता है । दीर्घतमा १६ वें कृत युग के थे । दौष्यन्ति भरत के सम- कालिक थे । वह विक्रम से ५ करोड़ १८ लाख ८६ हजार १ सो ४४ वर्ष पूर्व का काल है । प्रथम त्रेता के अत्रिपुत्र सोम हुए । उनके पुत्र बुध हुए । बुध के पुत्र पुरुरवा हुए । “पुरुरवस एवासीत् त्रयी त्रेतामुखे नृप ।” ( भाग० ९।१४।४९ ) त्रेता में परशुराम का आविर्भाव हुआ था— “एकोनविंश्यां त्रेतायां सर्वक्षत्रान्तकोऽभवत् । जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः ॥” ( वायुपु० १८।९१ ) त्रेताद्वापरयोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतांवरः । असकृत् पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ॥” ( म० भा० ३।२।३ ) इसी प्रकार २४ वें त्रेता में वसिष्ठ पुरोधा के साथ दशरथपुत्र राम रावण के वधार्थ विष्णु का अवतार होगा । ( विष्णुवचन है ) त्रेता द्वापर की सन्धि में २४ वें त्रेता में मैं विश्वामित्र पुरस्सर दाशरथि राम राजा हूँगा । “चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा । सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः ॥” ( वायुपु० १८।७२ ) “सन्ध्यंशे समनुप्राप्ते त्रेतायां द्वापरस्य च । अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः ॥” ( म० भा० १२।३३९ ) 'चतुर्विंशयुगे चापि विश्वामित्रपुरःसरः । रामो दशरथस्याथ पुत्रः पद्मायतेक्षणः ॥” ( हरिवंश ४।४१, ब्रह्माण्डपुराण १०४।११ ) “अष्टाविंशतिमे तद्वत् द्वापरस्यांशसंक्षये । नष्टे धर्मे तदा जज्ञे विष्णुर्वृष्णिकुले प्रभुः ॥” ( वायुपु० ९८।९७ )