भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८८६ रामायणमीमांसा द्वाविंश वैवस्वत मन्वन्तर के २८ वें द्वापर के अन्त में धर्म एवं यज्ञ के नष्टप्राय होने पर विष्णु वृष्णिकुल में कृष्णरूप से उत्पन्न होंगे । गाधिकन्या सत्यवती में महर्षि ऋचीक से ज्येष्ठ पुत्र जमदग्नि हुए थे । अग्निवेश, वल्मीक आदि ९९ पुत्र अन्य भी हुए थे । उन्हीं वल्मीक के पुत्र वाल्मीकि हुए थे । वे अग्नि वाल्मीकि भी कहे जाते थे । उन्होंने रामायण का निर्माण किया था । उनके पुत्र अग्निवेश हुए थे जो कि आयुर्वेद और धनुर्वेद के आद्याचार्य थे । उन्होंने भरद्वाज से आग्नेय अस्त्र आदि प्राप्त किये थे— “अग्निवेशं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान् । प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रं वेदविदांवरः ॥” ( म० भा० आदि पर्व २२१।१५ ) दीर्घजीवी अग्निवेश से द्रोण ने तथा द्रोण से अर्जुन ने आग्नेय आदि अस्त्र प्राप्त किये थे— “अग्निवेश इति ख्यातस्तस्य शिष्योऽस्ति भारत । तपसा यन्मया प्राप्तममोघमशनिप्रभम् ॥ अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम यद् दहेत् पृथिवीमपि । त्वया प्राप्तमिदं वीर दिव्यं नान्योज्हैति त्विदम् ॥” (म० भा० आदि पर्व १४१) वाल्मीकिरामायण के अनुसार भी वाल्मीकि राम के समकालिक थे । उन्होंने राम के पुत्रों का संस्कार कर उन्हें वेदादि शास्त्र पढ़ा कर वेद के उपबृंहणार्थ उन्हें रामायण महाकाव्य पढ़ाया था ( वा० रा० उ० ) इससे सुतरां रामायण की अतिप्राचीनता सिद्ध होती है । पूर्वोक्त पुराणवचन के अनुसार राम २४ वें त्रेता में प्रकट हुए थे । उसी समय रामायण का निर्माण हुआ । पाश्चात्यों एवं तदनुयायी भारतीयों की दृष्टि में भारत के तीन संस्करण हुए हैं—पहला संस्करण व्यास- कृत चौबीस हजार श्लोकों की चतुर्विंशतिसाहस्री भारतसंहिता, दूसरा संस्करण वैशम्पायन-जनमेजय-संवादरूप और तीसरा संस्करण सौति-शौनकसंवादरूप । वही महाभारत है । अन्तिम दोनों व्यास की कृति नहीं हैं । इस तरह कुछ लोगों के अनुसार व्यास, वैशम्पायन एवं सौति इन तीनों कवियों ने महाभारत की रचना की है। व्यासकृत ग्रन्थ का नाम जय था, वैशम्पायन विरचित भारत ग्रन्थ था एवं सौतिकृत ग्रन्थ महाभारत है । उसी में जय एवं भारत दोनों ग्रन्थ लीन हो गये । प्रमाण में कहा जा सकता है— “वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् । सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ॥ प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव च । संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ॥ (म० भा० १।१६३,८९,९०) इससे मालूम होता है कि सुमन्तु आदि ने पृथक्-पृथक् भारतीय संहिताएँ प्रकाशित की हैं। इससे भी भारत की कई संहिताएँ प्रतीत होती हैं । सुमन्तु-जैमिनि-वैशम्पायन-पैल-सूत्रभाष्य-भारत-महाभारतधर्माचार्याः इस आश्वलायनसूत्र के अनुसार भारत और महाभारत का पृथक्-पृथक् उल्लेख है— “अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् । एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत ॥”