भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 964

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८७ अनुक्रमणिका अध्याय में— ‘‘इदं शतसहस्राख्यं लोकानां पुण्यकर्मणाम् । उपाख्यानैः सह ज्ञेयं श्राव्यं भारतमुत्तमम् ॥ चतुर्विंशतिसाहस्रं चक्रे भारतसंहिताम् । उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः ॥ मन्वादि भारतं केचिद् आस्तीकादि तथापरे । तथोपरिचरादन्ये विप्रा सम्यगधीयते ॥’’ (म० भा० १।१।५२) कोई प्रथम मन्त्र से, कोई आस्तीक की कथा से और कोई उपरिचर वसु की कथा से भारत कहते हैं । परन्तु उपर्युक्त वचनों पर भी विचार करने से महाभारत अनेक कवियों की कृति है, यह नहीं सिद्ध होता, क्योंकि— ‘‘संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ।’’ इस वचन से भारत की संहिताओं का प्रकाशन ही कहा गया है, निर्माण नहीं; अतः सुमन्तु आदि भारत की पृथक्-पृथक् संहिताओं के प्रकाशक ही माने जा सकते हैं, प्रणेता नहीं । जो उक्त जय, भारत और महाभारत का भेद मानते हैं उन्हें यह भी बताना चाहिये कि उस स्थिति में तो यही कहना चाहिये था कि व्यास ने सुमन्तु आदि को जयग्रन्थ पढ़ाया था, महाभारत नहीं । तथा च— ‘‘वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् ।’’ इस उक्ति का क्या अर्थ होगा ? इससे तो महाभारत को ही पञ्चम वेद और उसी का पढ़ाना कहा गया है । व्यास से जिस महाभारत का सुमन्तु आदि ने अध्ययन किया वह व्यासनिर्मित है या अन्यनिर्मित ? सौतिनिर्मित महाभारत को पञ्चम वेद मानकर व्यास ने पढ़ाया यह कहना निराधार है और उपहासास्पद भी है । भारतसंहिता का क्या अर्थ है ? यदि सुमन्तु आदि ने भारतसम्बन्धिनी संहिताओं का प्रकाशन किया तो इससे यही निश्चित होता है कि भारत नहीं, किन्तु भारत से भिन्न संहिताओं का ही उन्होंने प्रकाशन किया । यहाँ यह भी प्रश्न होगा कि संहितासम्बन्धी भारत कौन है ? जिसे उन्होंने व्यास से पढ़ा था, वही था या स्वविरचित भारत नाम का कोई और ही ग्रन्थ था ? यदि प्रथम पक्ष मान्य है । तब तो यह नहीं सिद्ध होता है कि महाभारत अनेक कवियों की कृति है । पक्षान्तर भी असंगत है, क्योंकि स्वनिर्मित ग्रन्थान्तर के व्यास से अध्ययन का कोई प्रयोजन नहीं सिद्ध होता । यदि भारतस्य संहिता इस वाक्य में अभेद अर्थ में ही षष्ठी मानें तब भी मूल भारत ग्रन्थ ही संहिता है या व्याख्यानरूपा संहिता है ? प्रथम पक्ष के अनुसार यह अर्थ होगा कि व्यासकृत मूल भारत ग्रन्थ का अध्ययन करके उनके शिष्यों ने मूल ग्रन्थ का निर्माण किया, जो कि उपहासास्पद है । यदि व्याख्याग्रन्थरूप संहिता है तो इससे मूलभारत ग्रन्थ अनेक कवियों की कृति है, यह नहीं सिद्ध होता । इस दृष्टि से तो व्यास ने सुमन्तु आदि को भारत पढ़ाया और उन्होंने तत्सम्बन्धी व्याख्याभूत संहिताएँ बनायीं । यह भी प्रश्न है कि ‘‘वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्’’ यह क्यों कहा गया है ? यदि कहा जाय कि उनके द्वारा अधीत सब ग्रन्थों का निर्देश करना उद्देश्य है तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि अष्टादशपुराण और ब्रह्म- सूत्रादि भी अधीत ग्रन्थ हैं ही । फिर उनका निर्देश न होने से न्यूनता दोष होगा । अतः वेदों के साथ पञ्चम वेद महाभारत का अध्ययन किया और संहिताएँ प्रकाशित कीं । इस तरह अध्ययन और संहिताप्रकाशन में हेतु-हेतुमद्भाव करना चाहिये, पर वह भी संगत नहीं है ।