भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 965

८८८ रामायणमीमांसा द्वाविंश अतएव भारतभावदीपकार ने उस वाक्य का अर्थ किया है कि भारत की मूलभूत संहिताएँ मन्त्रब्राह्मणरूप वेद ही हैं। उन्हें सुमन्तु आदि ने प्रकाशित किया है। भारत के इस अंश का मूल यह मन्त्र या ब्राह्मण है, यह स्पष्टी- करण किया था। इससे यह दिखाया गया कि भारत प्रत्यक्ष मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदमूलक ही है। यही श्रीभागवत में कहा गया है— “भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।” भारत के व्याज से भगवान् व्यास ने वेदार्थ ही प्रकाशित किया है। आश्वलायनसूत्र से भारत और महा- भारतग्रन्थ का भेद वर्णन नहीं है, किन्तु आश्वलायनशाखियों के ब्रह्मयज्ञ में आचार्यतर्पण के प्रसङ्ग में वह सूत्र है। 'सुमन्तु-जैमिनि-वैशम्पायन-पैल-सूत्र-भाष्य-भारत-महाभारतधर्माचार्याः' इसके द्वारा भारत के अनेक कर्त्ता सिद्ध नहीं होते, क्योंकि उक्त सूत्रधर्माचार्यों को ही बतलाता है । सुमन्तु सूत्राचार्य, जैमिनि भाष्याचार्य, वैशम्पायन भारताचार्य और पैल महाभारताचार्य इस तरह क्रमिक अन्वय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आधुनिकों के मत में महाभारत के कर्तारूप से सौति की प्रसिद्धि है। पैल की नहीं। इसके अतिरिक्त पूर्व में सुमन्तु आदि को महाभारत सहित वेदों का अध्यापन कराना कहा गया है, फिर सूत्र में केवल वैशम्पायन को भारताचार्य और पैल को महाभारताचार्य क्यों कहा गया है ? इसका भी कोई समाधान नहीं है। वस्तुतः उक्त सूत्र के अनुसार सुमन्तु आदि के समान ही सूत्र, भाष्य, भारत और महाभारत भी धर्माचार्य ही हैं। देवीभागवत में स्पष्टरूप से उपर्युक्त अर्थ का ही समर्थन मिलता है— “सुमन्तुजैमिनी वैशम्पायनः पैलसूत्रयुक् । भाष्यभारतपूर्वेश्च महाभारत इत्यपि ॥ धर्माचार्या इमे सर्वे तृप्यन्त्विति च कीर्तयेत् ।” (देवीभाग० ११।२०) तथा च सूत्र में सुमन्तु से लेकर भारताचार्यान्त ग्रन्थ के नाम न होकर आचार्यों के नाम ही हैं। सुमन्त्वाचार्यः, जैमिन्याचार्यः, वैशम्पायनाचार्यः, सूत्राचार्य, भाष्याचार्यः, भारताचार्यः, महाभारताचार्य इतीमे आचार्याः तृप्यन्तु, ये सब आचार्य तृप्त हों। अतः उक्त सूत्र से भारत अनेक पुरुषों की कृति है यह नहीं सिद्ध होता । इसी तरह 'अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ।' इस वचन के आधार पर भी यह नहीं सिद्ध होता है कि महाभारत के कर्त्ता वैशम्पायन हैं, क्योंकि— “अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः । जन्मेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥ शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके । स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥” (अनुक्र० अ० ९७, ९८) इत्यादि अनुक्रमणिकाध्याय के वचनों से यही निश्चित होता है कि व्यास ने पहले महाभारत बनाकर मानुष लोक में प्रकट किया। सर्पसत्र में जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का आदेश दिया और वैशम्पायन ने व्यास के मुख से सुनी हुई कथा जनमेजय को सुनायी और उसी को सौति ने शौनक को सुनाया। यह सब बातें निम्नोक्त श्लोकों से स्पष्ट हैं— “कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः । कथिताश्चापि विधिवद् याश्च द्वैपायनेन वै ॥ श्रुत्वाहं ता. विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ।” (म० भा० १।१।११)