भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८९ "मन्वादि भारतं केचिदास्तीकादि तथापरे । तथोपरिचरादन्ये विप्राः सम्यगधीयते ॥" इस वचन से भी महाभारत के तीन संस्करण या तीन कर्ता नहीं सिद्ध होते । इससे तो पाठारम्भ का सम्प्रदायभेद वर्णन है । महाभारत का ही कोई (नारायणं नमस्कृत्य) से पाठारम्भ करके ग्रन्थ समाप्त करते हैं, कोई जरत्कारु पुत्र आस्तीक की कथा से प्रारम्भ करते हैं और कोई उपरिचरबसु की कथा से आरम्भ करके ग्रन्थ पूरा करते हैं । नीलकण्ठ के अनुसार वर्णानुपूर्वी का भेद रहने पर भी प्रतिकल्प नाम, रूप और कर्मों की समानता रहती है, अतः कल्पभेद से भारतारम्भ में भेद कहा गया है । मनु शब्द का अर्थ (नारायणं नमस्कृत्य) यह मन्त्र है । किसी की दृष्टि में प्रणवपूर्वक "नमो भगवते वासुदेवाय" यह मन्त्र ही मनु है । आस्तिकों की दृष्टि में । "धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ॥" (म० भा० १।६२।५२) जो महाभारत में है वही अन्यत्र है जो महाभारत में नहीं, वह कहीं भी नहीं है । परन्तु दुरभिसन्धि-वशात् या अज्ञानवशात् पाश्चात्योँ ने उसमें अनेक दुःशङ्काएँ उठायी हैं । मूलग्रन्थ का सम्यग् विचार करने से उक्त शङ्काएँ निर्मूल सिद्ध होती हैं । निम्नोक्त वचनों पर विचार करना आवश्यक है । "इदं शतसहस्रं तु श्लोकानां पुण्यकर्मणाम् । उपाख्यानैः सह ज्ञेयमाद्यं भारतमुत्तमम् ॥ उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः । ततोऽध्यर्धशतं भूयः संक्षेपं कृतवानृषिः ॥ अनुक्रमणिकाध्यायं वृत्तान्तानां सपर्वणाम् । इदं द्वैपायनः पूर्वं पुत्रमध्यापयच्छुकम् ॥ ततोऽन्येभ्योऽनुरूपेभ्यः शिष्येभ्यः प्रददौ विभुः । षष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम् ॥ त्रिंशच्छतसाहस्रं देवलोके प्रतिष्ठितम् । पित्र्ये पञ्चदश प्रोक्तं गन्धर्वेषु चतुर्दश ॥ एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रतिष्ठितम् । नारदोऽश्रावयद् देवानसितो देवलः पितॄन् ॥ गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः । अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ॥ शिष्यो व्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविदां वरः । एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत ॥" (म० भा० १।१) सौति कहते हैं पुण्य कर्मवाले लोगों के उपाख्यानों के सहित एक लाख श्लोकों का आदि भारत है उपा- ख्यान से रहित वही भारत है । इसके बाद में पुनः संक्षेप करके डेढ़ सौ श्लोकों की पर्वों के साथ वृत्तान्तों की एक अनुक्रमणिका रची । ११२