रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८९ "मन्वादि भारतं केचिदास्तीकादि तथापरे । तथोपरिचरादन्ये विप्राः सम्यगधीयते ॥" इस वचन से भी महाभारत के तीन संस्करण या तीन कर्ता नहीं सिद्ध होते । इससे तो पाठारम्भ का सम्प्रदायभेद वर्णन है । महाभारत का ही कोई (नारायणं नमस्कृत्य) से पाठारम्भ करके ग्रन्थ समाप्त करते हैं, कोई जरत्कारु पुत्र आस्तीक की कथा से प्रारम्भ करते हैं और कोई उपरिचरबसु की कथा से आरम्भ करके ग्रन्थ पूरा करते हैं । नीलकण्ठ के अनुसार वर्णानुपूर्वी का भेद रहने पर भी प्रतिकल्प नाम, रूप और कर्मों की समानता रहती है, अतः कल्पभेद से भारतारम्भ में भेद कहा गया है । मनु शब्द का अर्थ (नारायणं नमस्कृत्य) यह मन्त्र है । किसी की दृष्टि में प्रणवपूर्वक "नमो भगवते वासुदेवाय" यह मन्त्र ही मनु है । आस्तिकों की दृष्टि में । "धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ॥" (म० भा० १।६२।५२) जो महाभारत में है वही अन्यत्र है जो महाभारत में नहीं, वह कहीं भी नहीं है । परन्तु दुरभिसन्धि-वशात् या अज्ञानवशात् पाश्चात्योँ ने उसमें अनेक दुःशङ्काएँ उठायी हैं । मूलग्रन्थ का सम्यग् विचार करने से उक्त शङ्काएँ निर्मूल सिद्ध होती हैं । निम्नोक्त वचनों पर विचार करना आवश्यक है । "इदं शतसहस्रं तु श्लोकानां पुण्यकर्मणाम् । उपाख्यानैः सह ज्ञेयमाद्यं भारतमुत्तमम् ॥ उपाख्यानैर्विना तावद् भारतं प्रोच्यते बुधैः । ततोऽध्यर्धशतं भूयः संक्षेपं कृतवानृषिः ॥ अनुक्रमणिकाध्यायं वृत्तान्तानां सपर्वणाम् । इदं द्वैपायनः पूर्वं पुत्रमध्यापयच्छुकम् ॥ ततोऽन्येभ्योऽनुरूपेभ्यः शिष्येभ्यः प्रददौ विभुः । षष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम् ॥ त्रिंशच्छतसाहस्रं देवलोके प्रतिष्ठितम् । पित्र्ये पञ्चदश प्रोक्तं गन्धर्वेषु चतुर्दश ॥ एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रतिष्ठितम् । नारदोऽश्रावयद् देवानसितो देवलः पितॄन् ॥ गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः । अस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ॥ शिष्यो व्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविदां वरः । एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै निबोधत ॥" (म० भा० १।१) सौति कहते हैं पुण्य कर्मवाले लोगों के उपाख्यानों के सहित एक लाख श्लोकों का आदि भारत है उपा- ख्यान से रहित वही भारत है । इसके बाद में पुनः संक्षेप करके डेढ़ सौ श्लोकों की पर्वों के साथ वृत्तान्तों की एक अनुक्रमणिका रची । ११२
८९० रामायणमीमांसा द्वाविंश कृष्णद्वैपायन ने यह भारत पहले पुत्र शुक को पढ़ाया। उसके बाद समर्थ ऋषि ने अन्य योग्य शिष्यों को प्रदान किया। पश्चात् महर्षि व्यास ने साठ लाख श्लोकों की एक दूसरी भारतसंहिता रची उसमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में प्रतिष्ठित हैं। नारदजी ने देवलोक में उन्हें सुनाया। असित देवल ने पितरों को १५ लाख श्लोक सुनाये। शुकदेव ने उसमें से ही १४ लाख श्लोक गन्धर्वों और यक्षों को सुनाये। मनुष्यलोक में वैशम्पायन ने एक लाख श्लोक सुनाये। उसी वैशम्पायनोक्त लक्ष श्लोकों को मैं कहता हूँ। आप लोग उसे धारण करें। उपर्युक्त वाक्यों से स्पष्ट है कि श्रीव्यासजी ने केवल चौबीस हजार श्लोकों की भारतसंहिता ही नहीं बनायी, किन्तु एक लाख श्लोकों की, चौबीस हजार श्लोकों की, डेढ़ सौ श्लोकों की और साठ लाख श्लोकों की पृथक्- पृथक् चार संहिताएँ बनायीं। साठ लाख श्लोकोंवाली संहिता से ५९ लाख श्लोक देवादि लोकों में हैं। मर्त्यलोक में एक लाख श्लोकवाली संहिता ही है। पहले का एक लाख भी साठ लाख श्लोकों में ही अन्तर्निहित समझना चाहिये। अन्यथा एक लाख श्लोकोंवाली दो पृथक्-पृथक् भारतसंहिताएँ मिलनी चाहिये, परन्तु ऐसी कोई भिन्न संहिता मिलती नहीं। २४ हजार श्लोकोंवाली भारतसंहिता भी कहीं नहीं मिलती है। अतः यही समझना चाहिये कि जैसे बड़ा मकान बनाने या उपन्यास लिखने के पहले उसकी सामान्य रूप- रेखा बनानी पड़ती है उसी तरह व्यास ने पहले उपाख्यान से रहित केवल भारतवंशीय लोगों के इतिहास के रूप में ग्रन्थ तैयार किया था। पश्चात् उसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से सम्बन्धित उपाख्यान आदि को जोड़कर एक लाख श्लोकों का महाभारत तैयार किया और उसी में चौबीस हजार श्लोकों का अन्तर्भाव हो गया। डेढ़ सौ श्लोकों की अनुक्रमणिका भी अनुक्रमणिकाध्याय के रूप में इसमें सम्मिलित है। वर्तमान काल में उपलभ्यमान लक्षश्लोकात्मक ग्रन्थ ही महाभारत है। वही भारत या महाभारत एवं वही जय नाम का इतिहास भी है। जैसे रामायण के सीताचरित एवं पौलस्त्यवध भी नाम हैं— “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्। पौलस्त्यवध इत्येव चकार चरितव्रतः॥” (वा० रा० १।४।७) “तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् महाभारतमुच्यते। महत्त्वे च गुरुत्वे च ध्रियमाणं यतोऽधिकम् ॥” (म० भा० १।१।२७३) सत्य की तराजू पर तौलने से यह ग्रन्थ महत्त्व और गुरुत्व में वेदों से भी अधिक हुआ। इसी लिए यह महाभारत कहा जाता है। व्यास ने ही लक्षश्लोकात्मक भारत बनाया, यह अन्य वचनों से भी स्पष्ट है— “इदं शतसहस्रं तु श्लोकानां पुण्यकर्मणाम्। सत्यवत्यात्मजेनेह व्याख्यातममितौजसा॥” (म० भा० १।६२।१४) “मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा। जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा॥” (म० भा० १।६२।२०) भरतों का महान् जन्मवृत्तान्त-वर्णन के कारण भी इसे महाभारत कहा है— “भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते।” (म० भा० १।६२।३९) आगम-प्रामाण्य भारतीय संस्कृति में प्रत्यक्ष, अनुमान से अतिरिक्त एक स्वतन्त्र आगम प्रमाण भी मान्य है। आगम में वेद अपौरुषेय एवं आर्ष इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र पौरुषेय माने जाते हैं।
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९१ प्रत्यक्ष और अनुमान से अज्ञात धर्म, ब्रह्म आदि तत्त्वों का प्रतिपादन करनेवाला वेद अपौरुषेय आगम है। वेद एवं वेदाविरुद्ध प्रत्यक्षानुमान तथा आर्षज्ञान ऋतम्भरा-प्रज्ञा आदि के आधार पर रचे हुए आगम पौरुषेय आगम हैं। विशेष विवरण वेदप्रामाण्यप्रसङ्ग में देखें। महाभारत वेद के उपबृंहणार्थ आर्षविज्ञानसम्पन्न त्रिकालज्ञ परम वैदिक व्यास महर्षि के द्वारा महाभारत की रचना हुई है। महाभारत तथा अन्य पुराणादि प्रमाणों के द्वारा यह सिद्ध है कि वे भगवान् विष्णु के अवतार थे— “ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥” (भाग० १।४।१६) सत्रहवें अवतार में भगवान् विष्णु पराशर से सत्यवती में व्यासरूप में अवतीर्ण हुए और उन्होंने पुरुषों को अल्पबुद्धि जानकर वेदरूपी तरु को अनेक शाखाओं के रूप में विभक्त किया। महाभारत के अनुसार उत्पन्न होते ही इच्छानुसार उन्होंने देह बढ़ा ली। इतिहास सहित साङ्ग वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। पुनः वेदविदों में श्रेष्ठ, धर्म-ब्रह्मनिष्णात, सत्यव्रत, पवित्र एवं क्रान्तदर्शी ब्रह्मर्षि व्यास ने एक मिले-जुले वेद को हौत्र, आध्वर्यव, औद्गात्र, ब्राह्म आदि कर्मों की सुविधा के लिए ऋक्, यजु, साम और अथर्व भेद से चतुर्धा विभक्त किया— “जातमात्रश्च यः सद्यः इष्ट्या देहमवीवृधत् । वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् सेतिहासान् महायशाः ।। विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः । परावरज्ञो ब्रह्मर्षिः कविः सत्यव्रतः शुचिः ॥” (म० भा० १।५०।३,४) अतीत और अनागत का वर्णन सर्वज्ञकल्प भगवान् व्यास को वेद तथा आर्ष विज्ञान से भूत, भविष्य, वर्तमान, सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट, स्थूल एवं सूक्ष्म धर्म-ब्रह्म-सम्बन्धी सब वस्तुएँ विज्ञात थीं। उनके वर के प्रभाव से युद्धव्यस्त सञ्जय को भी भारत-संग्राम की सभी घटनाएँ हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष थीं। “व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम् ॥” (गीता १८।९५) श्रीव्यास के वरप्रसाद से मैंने साक्षात् योग-निरूपण करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से इस योग को सुना था। अतः सर्वज्ञकल्प व्यास को वैशम्पायन और जनमेजय सम्बन्धी प्रश्नोत्तर भी ज्ञात थे, अतः महाभारत के एक लाख श्लोकों में ही उन सब प्रश्नोत्तरों का सङ्कलन होना पूर्णरूप से सम्भव था। इसी लिए वनपर्व में अनेक भविष्य की बातों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बौद्धों के एडूक (गाडोवा) का भी उल्लेख किया है। महाभारत की रचना का समय तथा द्वैपायन व्यास की काव्यशक्ति तथा श्रीगणेश के द्वारा लिखा जाना भी यह सिद्ध करते हैं कि चतुर्विंशतिसाहस्री संहिता नहीं, किन्तु लक्षश्लोकात्मक ही भारत व्यासनिर्मित है— “त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनो मुनिः। भारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम् ॥” (म० भा० १।६२।५२)
८९२ रामायणमीमांसा द्वाविंश नित्य योगरत होकर कृष्णद्वैपायन मुनि ने तीन वर्षों में इस महाभारत आख्यान की रचना की । गणेशजी के द्वारा महाभारत का लिखा जाना भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत का व्यासकृतत्व सिद्ध करता है । तप से और ब्रह्मचर्य से वेदों का शाखाभेद से विस्तार करके सत्यवतीसुत व्यास ने महाभारत इतिहास की रचना की । महाभारत को रचकर वे विचारने लगे कि इसे किसे पढ़ाया जाय । इसी बीच वहाँ ब्रह्माजी आये । उनका स्वागत और पूजन करके उनके आज्ञानुसार उनके समीप ही व्यासजी बैठ गये और उन्होंने ब्रह्माजी को बताया कि वेदों का रहस्य, वेदाङ्ग, उपनिषद, वेदों का विस्तार तथा अन्य जो कुछ वेद में है वह सब पुनः इतिहास पुराणरूप में भूत, भविष्य और वर्तमान की स्थिति, जरा, मृत्यु, व्याधि के अस्तित्व तथा विनाश का निश्चय, धर्मों तथा आश्रमों के लक्षण, चारों वर्णों के धर्म, पुराणों का समग्र- तात्पर्य, तप, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा तथा युगों का प्रमाण, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान, अन्तर्यामी का माहात्म्य, कर्मानुरूप दिव्य तथा मानुष जन्म, पवित्र तीर्थ, देश, नदियाँ, पर्वत, वन, समुद्र, दिव्य नगर, नगरव्यूहरचना, विभिन्न कोटि के मनुष्यों की भाषणपद्धति, नीतिशास्त्र तथा सर्वव्यापक ब्रह्म का मैंने निरूपण किया है । परन्तु मुझको कोई लेखक नहीं मिलता । ब्रह्माजी बोले तुम रहस्यज्ञान के निधि हो, जन्म से लेकर तुम्हारी वेदवादिनी सत्यवादिनी वाणी को मैं जानता हूँ । तीनों आश्रम जैसे गृहस्थाश्रम से बढ़कर नहीं होते वैसे ही तुम्हारे काव्य से बढ़कर काव्य करने की सामर्थ्य कवियों में नहीं होगी । तुम अपना काव्य लिखने के लिए गणपति का स्मरण करो । "उवाच च महातेजा ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् । कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम् ॥ ब्रह्मन् वेदरहस्यं च यच्चान्यत् स्थापितं मया । साङ्गोपनिषदां चैव वेदानां विस्तरक्रिया ॥ इतिहासपुराणानामुन्मुखं निर्मितञ्च यत् । भूतं भव्यं भविष्यञ्च त्रिविधं कालसंज्ञितम् ॥ जरा-मृत्यु-भय-व्याधि-भावाभावविनिश्चयः । विविधस्य च धर्मस्य ह्याश्रमाणां च लक्षणम् ॥ चातुर्वर्ण्यविधानञ्च पुराणानां च कृत्स्नशः । तपसो ब्रह्मचर्यस्य पृथिव्याश्चन्द्रसूर्ययोः ॥ ग्रहनक्षत्राताराणां प्रमाणं च युगैः सह । न्यायशिक्षा चिकित्सा च दानं पाशुपतं तथा ॥ हेतुनैव समं जन्म दिव्यं मानुषसंज्ञितम् । तीर्थानाञ्चैव पुण्यानां देशानाञ्चैव कीर्तनम् ॥ नदीनां पर्वतानाञ्च वनानां सागरस्य च । पुराणाञ्चैव दिव्यानां कल्पानां युद्धकौशलम् ॥ वाक्यजातिविशेषाश्च लोकयात्राक्रमश्च यः । यच्चापि सर्वगं वस्तु तच्चापि प्रतिपादितम् ॥ परं न लेखकः कश्चिदेतस्य भुवि विद्यते ।" ( म० भा० १।१।६१-७० )
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९१ महाभारत में ही इन अनन्त ज्ञानों का भण्डार है। चतुर्विंशत्साहस्री संहिता में नहीं है। सौति ने कहा कि इस प्रकार आदेश देकर ब्रह्माजी अपने स्थान को चले गये। सत्यवतीपुत्र व्यास ने गणपति का स्मरण किया। भक्तमनोवाञ्छा पूर्ण करनेवाले गणपति वहाँ आ पहुँचे। व्यासजी ने उनकी विधिवत् पूजा करके कहा मैं मन में तैयार इस महाभारत को स्वयं बोलता हूँ आप लेखक बनें। गणपति ने कहा कि ठीक है, परन्तु लिखते लिखते मेरी लेखनी क्षण भर के लिए भी रुकनी नहीं चाहिये। इस तरह लिख सको तो बोलो, मैं लिखने को तैयार हूँ। व्यास ने कहा आप समझे बिना कदापि न लिखें। व्यास की बात स्वीकार करके गणपति भगवान् स्वयं लिखने लगे। व्यासजी कुतूहलपूर्वक गूढ़ रचना करने लगे, भारत के आठ हजार आठ सौ आठ श्लोक बड़े ही गूढ़ कहे जाते हैं। स्वयं व्यासजी की प्रतिज्ञा है कि उन्हें मैं स्वयं जानता हूँ एवं शुक जानते हैं, सञ्जय समझते हैं या नहीं, इसमें संशय है— “अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा ।” समर्थ गणपति भी इन श्लोकों का विचार करने के लिए क्षणभर रुक जाते थे। इस बीच व्यास बहुत से श्लोकों का निर्माण कर लेते थे। किसी छोटे लेख के लेखक के लिए गणपति को लेखक बनाने का प्रसङ्ग सङ्गत नहीं। इस दृष्टि से भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत व्यासदेव निर्मित और गणपति द्वारा लिखित है, यह मानना ही चाहिये। इस प्रकार महाभारत में ही स्पष्ट उल्लेख होने पर तद्विपरीत कल्पना सर्वथा निराधार ही है। चतुर्विंश- तिसाहस्री संहिता में आठ हजार आठ सौ आठ गूढ़ श्लोक नहीं हो सकते। उसके लिए तीन वर्ष का समय भी अनावश्यक नहीं है। “त्रिभिर्वर्षैरिदं पूर्णं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः। अखिलं भारतञ्चेदं चकार भगवान् मुनिः ।। आकर्ण्य सततं भक्त्या जयाख्यं भारतं महत् । श्रीश्च कीर्तिस्तथा विद्या भवन्ति सहिताः सदा ।।”(म०भा०स्वर्गारोहण५।४८।४९) “तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् । अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः ।। जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः । शशास शिष्यमासीनं श्रावयामास भारतम् ।। कर्मान्तरेषु यज्ञस्य चोद्यमानः पुनः पुनः ।” (म० भा० १।१।९७,९८) के अनुसार धृतराष्ट्र आदि के परम गति को प्राप्त होने के पश्चात् जनमेजय तथा सहस्रों ब्राह्मणों के प्रश्न करने पर महान् ऋषि भगवान् व्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को आदेश दिया और वैशम्पायन ने यज्ञकर्म के बीच बीच में बार बार प्रेरित होकर सदस्यों के साथ समासीन होकर भारत का श्रवण कराया। इससे भी स्पष्ट है कि पहले व्यास ने अपने शिष्यों को भारत सुनाया था। उसी को सर्पसत्र में वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनाया। वैशम्पायन ने यही कहा भी था— “शृणु राजन् पुरा सम्यग् मया द्वैपायनाच्छ्रुतम् ।”
इसी को सौति ने भी शौनक को सुनाया— “कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः । कथिताश्चापि विधिवद् या वैशम्पायनेन वै ॥ श्रुत्वाहं ता विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ।” (म० भा० १।१।११) कृष्णद्वैपायन व्यास के द्वारा कही हुई अतिशय पुण्यजनक जो कथाएँ वैशम्पायन ने कही थीं । महाभारत- संश्रित उन्हीं कथाओं को उनसे सुनकर मैं विविध तीर्थों और आयतनों में घूमता हुआ उस क्षेत्र में गया जहाँ युद्ध हुआ था। वहाँ से आप लोगों की दर्शनेच्छा से यहाँ आया हूँ । ये सबकी सब शङ्काएं मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों के सम्बन्ध में भी उठती हैं । “वाचाविरूपनित्यया”, “अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा ।” के अनुसार मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद नित्य हैं, उनका सम्प्रदाय-प्रवर्तन ही विभिन्न कल्पों में होता है, निर्माण नहीं। परन्तु यदि घटना के अनुसार ग्रन्थ का उल्लेख माना जाय तब तो उर्वशीपुरूरवा तथा यम-यमी या यज्ञवल्क्य- मैत्रेयी के अनन्तर ही तत्संवादरूप ग्रन्थ का निर्माण मानना होगा। परन्तु यह मानना पूर्वोक्त वचनों के विरुद्ध ही होगा। अतः वहाँ यही मानना पड़ता है कि वे आख्यायिकाएँ घटना पर निर्भर नहीं हैं। वे तो सुखावबोधनार्था आख्यायिकाएँ नित्य ही हैं। कभी उन्हीं के अनुसार घटनाएं भी घट जाती हैं। इसीलिए वेद में घटनापूर्विका आख्यायिका नहीं, किन्तु आख्यायिकापूर्विका घटनाएं होती हैं, यह सिद्धान्त देवताधिकरण में स्पष्टरूप से देखा जा सकता है। महाभारत व्यास द्वारा ही रचित है इस सम्बन्ध में बालव्यास पं० ब्रह्मश्री सुब्रह्मण्य शास्त्री ने विभिन्न पुराणों के भी प्रमाण दिये हैं । विष्णुपुराणे अ० ३ एवं पाद्मे सृष्टिखण्डं १ “कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् । को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षाद् महाभारतकृद् भवेत् ॥” मार्कण्डेयपुराणे अध्याय १ “तपःस्वाध्यायनिरतं मार्कण्डेयं महामुनिम् । व्यासशिष्यो महातेजा जैमिनिः पर्यपृच्छत ॥ भगवन् भारताख्यानं व्यासेनोक्तं महात्मना । पूर्णमस्तमलैः शुभ्रैः नानाशास्त्रसमुच्चयैः ॥ जातिशुद्धसमायुक्तं साधुशब्दोपशोभितम् । पूर्वपक्षोक्तिसिद्धान्तपरिनिष्ठासमन्वितम् ॥” ततः “त्रिदशानां यथा विष्णुः” इत्यादि = “आचारस्थितिसाधनम् । इत्यन्तं भारतस्य बहु प्रशंसां कृत्वा पुनः— “प्रोक्तमेतन्महाभाग वेदव्यासेन धीमता । तथा तात कृतं ह्येतद् व्यासेनोदारकर्मणा ॥ यथा व्यासं महाशास्त्रं विरोधैर्नाभिभूयते । व्यासवाक्यजलौघेन कृतकंतरुहारिणा ॥
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९५ वेदशैलावतीर्णेन नीरजस्का मही कृता । कलशब्दमहाहंसं महाख्यानपराम्वुजम् ॥ कथाविस्तीर्णसलिलं काष्णं वेदं महाह्रदम् । तदिदं भारताख्यानं बह्वर्थमिह विस्तरम् ॥ तत्त्वतो ज्ञातुकामोऽहं भगवंस्त्वामुपस्थितः ।" इति एतेन उपाख्यानसहितस्य महाभारतस्य वेदव्यासैककर्तृकत्वं सिद्धयति । किञ्च विरोधा- भावत्वं सकलशास्त्रसम्प्रदायसमन्वितत्वं च । सूतसंहितायां अ० १- “व्यस्तवेदतया व्यास इति लोके श्रुतो मुनिः । अयं साक्षान्महायोगी व्यासः सर्वज्ञ ईश्वरः ॥ महाभारतमाश्चर्यं निर्ममे भगवान् गुरुः ।” इति “कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् । को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षाद् महाभारतकृद् भवेत् ॥ देवीभागवते अ० १- “अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः । भारताख्यानमतुलं चक्रे तदुपबृंहितम् ॥” श्रीमद्भागवते स्कन्ध १ अ० ५- “स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥” मत्स्यपु० अ० ५५- “अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः । भारताख्यानमखिलं चक्रे तदुपबृंहितम् ॥” “प्रकाशो जनितो लोके महाभारतचन्द्रमाः ।” इति स्कन्दपु० प्रभासखण्ड अ० २ ‘सत्यवतीसुतः•••• •••• •••• •••• •••• •••• । भारताख्यानमकरोद् वेदार्थैरुपबृंहितम् ॥ लक्षेणैकेन तत् प्रोक्तं द्वापरान्ते महात्मना ।” शौनकोक्तचरणव्यूहपरिशि० ९ “लक्षं तु चतुरो वेदा लक्षं भारतमेव च ॥” गीताध्यायान्ते इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्याम् इत्यादि । आर्यासप्तशत्यां गोवर्द्धनाचार्यकृतायाम् (१०८०-११३० मध्ये) “व्यासगिरां निर्यासं सारं विश्वस्य भारतं वन्दे । भूषणतयेव संज्ञां तदेकतां भारती वहति ॥” एतानि सर्वाणि वचनानि महाभारतस्य लक्षग्रन्थात्मकतां व्यासैककर्तृकतां महाभारतभारत- नामभ्यामेक एव ग्रन्थः इत्यादिकं ऐककण्ठ्येन निःसंशयेन च उद्घोषयन्ति । उपर्युक्त विविध पुराणवचनों में कहा गया है कि लक्ष श्लोकों का महाभारत व्यासकृत है । व्यास सर्वज्ञ विष्णु के अवतार ही हैं । महाभारत सब वेदों का एवं शास्त्रों का समन्वित सार है ।
८९६ रामायणमीमांसा द्वार्बिंश “जयो नामेतिहासोऽयम्” यह भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत के लिए ही कहा गया है। विशेषरूप से उद्योगपर्व के अध्याय १३३ से १३६ तक कुन्ती द्वारा कथित विदुलोपाख्यान नाम से प्रसिद्ध इतिहास जय नाम से कहा गया है। “जयनामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा ।” (म० भा० ५।१३६।१८) इसी जयोपाख्यानरूप बीज का महान् वृक्षरूप महाभारत को मानकर उसका भी जयनाम लें तो उचित ही है। इतना ही क्यों, शब्दकल्पद्रुम में उद्धृत निम्नोक्त वचन के आधार पर अठारह पुराण, रामायण, कृष्ण- द्वैपायनोक्त पञ्चमवेद महाभारत, शाश्वत विष्णुधर्म एवं शिवधर्म इन सबका जय नाम है। इस तरह महाभारत का ही जय नाम है उसी का भारत तथा महाभारत नाम है— “अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा । काष्णं वेदं पञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः ॥ तथैव विष्णुधर्माश्च शिवधर्माश्च शाश्वताः । जयेति नाम तेषाञ्च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥” इसी दृष्टि से आरम्भ में और अनेकों बार महाभारत में— “नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीञ्चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ कहा गया है। अर्थात् नारायण परमेश्वर कृष्ण और नर अर्जुन तथा नरोत्तम प्रत्यक्चैतन्याभिन्न शुद्ध ब्रह्म तथा ब्रह्मविद्यारूपिणी सरस्वती को नमस्कार करके ही जय का वर्णन करना चाहिये । पूर्वोक्त रीति से पुराणादि सभी का नाम जय है। तथापि विशेषरूप से १८ संख्यावाले महाभारत ग्रन्थ का जय यह संकेत है। वाल्मीकिरामायण के टीकाकार सर्ग के श्लोकों की संख्या अक्षरों के संकेत से करते हैं। यथा— “कादयोऽङ्गाष्टादयोऽङ्गा पाद्या पञ्च प्रकीर्तिताः । यादयोऽष्टौ ज्ञनो पूर्णे विजेयस्वरशास्त्रके ॥” क से झ तक के अक्षर क्रमशः एक से नौ तक के वाचक हैं। ट से ध तक के अक्षर भी एक से नौ तक के वाचक हैं। प से म तक एक से पाँच तक के वाचक हैं। य से ह तक के अक्षर एक से आठ तक के वाचक हैं। ज्ञ और न ये दो अक्षर पूर्ण संख्या के वाचक हैं । जैमिनिसूत्र तथा आर्षसिद्धान्त भी ऐसी संख्या का वर्णन करते हैं । उपर्युक्त रीति से ज ८ का वाचक है और य एक का वाचक है । ‘अङ्कानां वामतो गतिः’ के अनुसार जय शब्द १८ संख्या का बोधक है । महाभारत १८ पर्व का है, महाभारतयुद्ध भी अठारह दिन हुआ । दोनों दलों में सेना १८ अक्षौहिणी थी । गीता १८ अध्याय की है । इस तरह ग्रन्थ का नाम जय हुआ । कुछ लोग कहते हैं, भारत के पात्र युधिष्ठिर, अर्जुन आदि ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं, किन्तु धर्म, अधर्म, देव, असुर के तुल्य ही कौरव तथा पाण्डव कल्पनामात्र हैं, पर यह ठीक नहीं, क्योंकि महाभारत के पात्र यदि कल्पित होते, ऐतिहासिक न होते तो दूसरे ग्रन्थ अपने ग्रन्थों में उन्हें स्थान न देते, परन्तु महाभारत के युधिष्ठिर आदि
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९७ पाण्डवों का उल्लेख पुराणों, ज्योतिषशास्त्रों “शासति पृथिवीं युधिष्ठिरे नृपतौ ।” बृहत्संहिता ज्योतिषशास्त्र तथा पाणिनिसूत्र ‘वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्’ ४।३।९८ में उल्लेख आता है । मनु के आख्यानानीतिहासांश्च ३।२३२ की टीका मेधातिथि एवं कुल्लूक ने ‘इतिहासा भारतादयः’ कहा है । भारतीय इतिहास का निम्नोक्त लक्षण है— “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् । पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥” गड़े मुर्दों के उखाड़ने जैसी पुरानी बातों को बार-बार दोहराना ही इतिहास नहीं है, किन्तु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेश के साथ वृत्तान्तों का वर्णन ही इतिहास है । भले ही कहीं कहीं महाभारत को पुराण कहा है— “द्वैपायनेन यत्प्रोक्तं पुराणं परमर्षिणा । इतिहासमिमं विप्राः पुराणं परिचक्षते ॥” ( १।२।१७ ) तथापि महाभारत में इसे इतिहास और महाभारतकाव्य ही कहा गया है— “कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम् ।” ( १।१।९१ ) “तपसा ब्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम् । इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुतः ॥” ( म० भा० आ० प० १।५४ ) कविता के भेद से कर्ता के भेद की कल्पना भी निःसार है, क्योंकि स्वयं व्यास ने ही स्वीकार किया है कि आठ हजार आठ सौ श्लोक बड़े ही कठिन हैं उन्हें कोई नहीं जान सकता है और उनका निर्माण गणेश भगवान् की लेखनी के किञ्चित् अवरोध के लिए ही किया गया है — “ग्रन्थग्रन्थिं तदा चक्रे मुनिर्गूढं कुतूहलात् । यस्मिन् प्रतिज्ञया प्राह मुनिर्द्वैपायनस्त्विदम् ॥ अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च । अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा ॥” ( म० भा० १।१।८०, ८१ ) और यह अन्य कवियों में भी देखा ही जाता है । विषयभेद से, परिस्थितिभेद से एवं मानस के उल्लास और अनुल्लास आदि के भेद से भी काव्यभेद होता ही है । इसी तरह समास-व्यास-भेद से पुनरुक्तियों का भी समाधान किया जा सकता है । “विस्तीर्यैतन्महज्ज्ञानमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥” ( म० भा० १।१।५१ ) महाभारत का काल-निर्णय महाभारत में ही महाभारत के निर्माण का काल निर्दिष्ट है— “त्रीनग्नीनिव कौरव्यान् जनयामास वीर्यवान् । उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च ॥ जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति । तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ॥ ११३
८९८ रामायणमीमांसा द्वाविंश अब्रवीत् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महर्षिः । जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥ शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके । स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥” अर्थात् महर्षि व्यास तीन अग्नियों के समान तेजस्वी कुरुवंशीय धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर को उत्पन्न करके तपस्या के लिए वन में अपने आश्रम में चले गये। जब तीनों ही पुत्र परमगति को प्राप्त हो गये तब महर्षि व्यास ने मनुष्य-लोक में महाभारत का निरूपण किया। हजारों ब्राह्मणों के साथ जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को आज्ञा दी कि तुम इन लोगों को महाभारत सुनाओ । वैशम्पायन ने यज्ञ के सदस्यों के साथ आसीन होकर यज्ञ के बीच बीच में बारम्बार उनसे प्रेरित होकर महाभारत सुनाया। इससे स्पष्ट है कि जनमेजय के सर्पसत्रयज्ञ से पूर्व और पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर के देहावसान के पश्चात् महाभारतसंहिता की रचना हुई। पाण्डु युद्ध के पहले ही देह त्याग चुके थे । महाभारतयुद्ध के २०वें वर्ष में धृतराष्ट्र को परम पद प्राप्त हुआ था । युद्ध के पश्चात् १५ वर्ष तक धृतराष्ट्र युधिष्ठिर के साथ रहे थे । सोलहवें वर्ष भीम के वाग्बाण से पीड़ित हो विरक्त होकर विदुर के साथ वन चले गये । “ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः । राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीडितः ॥” (आश्रमवासिक पर्व अध्याय ६।१५) वहाँ धर्माचरण करते हुए एक वर्ष बीतने पर देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर से कहा था कि धृतराष्ट्र के जीवन के अभी तीन वर्ष शेष हैं— “तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम् । वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोऽस्य परमायुषः ॥” ( आश्रमवासिक पर्व २।३२ ) मैंने इन्द्र के मुख से सुना है कि धृतराष्ट्र की परमायु अभी ३ वर्ष शेष है। तथा च भारत युद्ध के २० वर्ष बीतने पर महाभारत का निर्माण हुआ । भारत युद्ध के ३६ वर्ष बीतने पर परीक्षित् का राज्याभिषेक हुआ । परीक्षित् ने ६० वर्ष तक राज्य किया । “प्रजा इमास्तव पिता षष्टिवर्षाण्यपालयत् । ततो दिष्टान्तमापन्नः सर्वेषां दुःखमावहन् ॥” ( आदिपर्व ४९।७ ) मन्त्रियों ने जनमेजय से कहा था कि तुम्हारे पिता ६० वर्ष तक पृथिवी का पालन करके हम सबकी दुःखजनक मृत्यु को प्राप्त हुए । सौप्तिक पर्व में भी यही कहा है— “विदित्वा परमास्त्राणि क्षत्रधर्मव्रते रतः । षष्टिवर्षाणि धर्मात्मा वसुधां पालयिष्यति ॥” ( सौप्तिक पर्व १६।१४ ) महाभारत-युद्ध से ९६ वर्ष पर बाल्यदशा में ही जनमेजय का राज्याभिषेक हुआ । वयस्क होने पर विवाह हुआ और कुछ ही दिनों बाद उत्तङ्क की प्रेरणा से जनमेजय ने सर्पसत्रयज्ञ आरम्भ किया । उसी में वैशम्पायन ने महाभारत सुनाया । उसी महाभारत को महर्षि व्यास ने जयनामक महाकाव्य के रूप में विविध उपाख्यानों के सहित लिखा । वही भारतीय युद्ध का विशद इतिहास है। यह युधिष्ठिर के विजय के उपलक्ष्य में लिखा गया था। इसीलिए युद्ध के २० वर्ष बाद और युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण के १६ वर्ष पहले युधिष्ठिर के समय में ही लिखा गया था। यद्यपि ऐसे काव्य विजय के बाद शीघ्र ही लिखे जाते हैं तथापि धृतराष्ट्र के सामने उसका लिखा जाना उचित नहीं था, क्योंकि युधिष्ठिर बड़ी तत्परता से धृतराष्ट्र को प्रसन्न और तुष्ट रखने का प्रयत्न करते रहते थे ।
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९९ “यथा पुत्रवियुक्तोऽयं न किञ्चिद् दुःखमाप्नुयात् । इति तानन्वशाद्राजा नित्यमेव युधिष्ठिरः ॥ निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिष्ठति स मे सुहृद् । विपरीतश्च मे शत्रुः नियम्यश्च भवेन्नरः ॥” (म०भा०आदिपर्व २५।२,३) महाभारत में वासुदेव की महिमा और युधिष्ठिर की प्रशंसा के साथ धार्तराष्ट्रों की निन्दा भी है— “वासुदेवस्य माहात्म्यं पाण्डवानां च सत्यताम् । दुर्वृत्तं धार्तराष्ट्राणामुक्तवान् भगवानृषिः ॥” अतः धृतराष्ट्र के परमपदप्राप्ति के पश्चात् ही महाभारत का उल्लेख सङ्गत है, किन्तु गीता का प्रादुर्भाव तो युद्धारम्भ के प्रथम दिन ही हुआ था । महाभारत युद्धकाल पुराणों में कलियुग का आरम्भकाल, महाभारत-युद्धकाल और परीक्षित् का जन्मकाल एक ही माना गया है । महाभारत-युद्धकाल का पुष्ट प्रमाण निम्नोक्त है— “अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् । समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥” ( म० भा० आदिपर्व २।१३) कलियुग और द्वापर के मध्य में समन्तपञ्चक कुरुक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं का युद्ध हुआ था । कलिसंवत् एवं भारतयुद्धसंवत् के रूप में वही काल कहा जाता है । ज्योतिषग्रन्थों तथा पञ्चाङ्गों के अतिरिक्त कुछ शिलालेखों में भी इसका उल्लेख है । श्रीमद्भागवत से भी उक्त काल पुष्ट होता है— “तेनैव ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् । ते त्वदीये द्विजाः काले अधुना चाश्रिता मघाः ॥ यदा देवर्षयः सप्त मघासु विचरन्ति हि । तदा प्रवृत्तस्तु कलिर्द्वादशाब्दशतात्मकः ॥” प्रत्येक नक्षत्र पर सप्तर्षि १०० वर्ष रहते हैं। वे सप्तर्षि तुम्हारे जन्मकाल में मघा नक्षत्र पर थे और आज तुम्हारे अन्तकाल में भी मघा नक्षत्र पर ही हैं। और जब सप्तर्षि मघा पर आये हैं तभी से दिव्य (देवताओं के) १२०० वर्षों का ४ लाख बत्तीस हजार मानव वर्षोंवाला कलियुग प्रवृत्त हुआ है। इसका आरम्भ ईसवीय सन् के प्रारम्भ से ३१०२ वर्ष पूर्व फरवरी मास की ८वीं तारीख के प्रातःकाल से हुआ था । इस तरह महाभारत की प्राचीनता सिद्ध होने से पाश्चात्यों एवं बुल्के का मत सुतरां खण्डित हो जाता है। जब महाभारत पाँच हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है तब महाभारत में वर्णित रामायण की अत्यधिक प्राचीनता सुतरां सिद्ध होती है। पुराणवचनों के अनुसार भी २४वें त्रेता में वसिष्ठसहित राम का प्रादुर्भाव हुआ था। उसी समय महर्षि वाल्मीकि का भी आविर्भाव हुआ था। इस दृष्टि से २४वें त्रेता में द्वापर की सन्धि में अर्थात् इस वर्ष से एक करोड़ सतहत्तर लाख उनचास हजार तिहत्तर १७७४९०७३ वर्ष पूर्व श्रीराम के शासनकाल में रामायण का निर्माण हुआ था। इस तरह रामायण संसार का सर्वाधिक प्राचीन आर्ष इतिहासग्रन्थ है ।
३ पृष्ठ खाली प रि शि ष्ट ( १ ) रामोपासना अथ भूशुद्ध्यादि—“देवो भूत्वा यजेद् देवान् नादेवो देवमर्चयेत्” (आह्निककारिका) के अनुसार सभी प्रकार की उपासनाओं में भूशुद्ध्यादि अपेक्षित होते हैं । स्नान, सन्ध्यादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर प्रातःकाल पवित्र आसन पर बैठकर 'केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः तीन बार आचमन कर प्राणायाम करना चाहिये । रां बीज से प्राणायाम करते हुए मूलाधार में ज्योतिर्मयलिङ्ग को साढ़े तीन वलय से वेष्टित करके स्थित कुण्डलिनी का ध्यान करना चाहिये । ह्रीँ बीज से कुण्डलिनी को जागरित कर हृदयप्रदेश में अवस्थित प्रकाशपुञ्जमय जीव को मुख में रखकर ब्रह्मरन्ध्र में ले जाकर हंसः सोहम् इस मन्त्र से ब्रह्म के साथ जीव की एकरूपता के साथ मिलाप की भावना करनी चाहिये । दक्षिण कुक्षि में अवस्थित अधोमुख पापपुरुष का ध्यान करते हुए पूरक में यं बीज का १६ बार उच्चारण करते हुए पापपुरुष का शोषण कर कुम्भक में रं बीज का ६४ बार उच्चारण कर पाप- पुरुष को भस्म कर देना चाहिये । पुनः रेचक में ३२ बार यं बीज का उच्चारण कर पापपुरुष का भस्म बाहर निकाल देना चाहिये । ब्रह्मरन्ध्रगत चन्द्रमण्डल में अवस्थित होकर अमृतवर्षा करनेवाली अमृतेश्वरी देवी का ध्यान कर उनके शरीर से झरनेवाली अमृत-वर्षा से अपने को आप्लावित होने की भावना करनी चाहिए इसका नाम भूशुद्धि है । “ब्रह्मरन्ध्रगते चन्द्रमण्डलेऽमृतवर्षिणीम् । भवानीं भूमिशुद्धयर्थं भावयेदमृतेश्वरीम् ॥ ततस्तन्मौलिनिष्यन्दसुधाकल्लोलवृष्टिभिः । चिन्तयेन्मनसात्मानं भूमिशुद्धिरियं भवेत् ॥” अथ भूतशुद्धिः—प्राणायाम करके कुम्भक में लं वं रं यं हं इन पाँच महाभूतों के बीजों की एक आवृत्ति करके अपवादप्रक्रिया द्वारा समस्त पार्थिव प्रपञ्च पृथिवी में, पृथिवी जल में, जल तेज में, तेज वायु में, वायु आकाश में, आकाश अहंतत्त्व में, अहंतत्त्व महत्तत्त्व में, महत्तत्त्व अव्यक्त तत्त्व में एवं अव्यक्त तत्त्व परम सत्तत्त्व में में लीन हो गया ऐसी भावना करनी चाहिए । वं बीज से प्राणायाम करते हुए कुम्भक में अध्यारोपप्रक्रिया द्वारा पर- ब्रह्म से महदादिक्रमेण आकाश, आकाश से वायु, वायुसे तेज, तेज से जल, जल से पृथिवी और पृथिवी से सद्वासनात्मक दिव्य तेजोमय उपासनायोग्य अपना शरीर उत्पन्न कर सोहं इस मन्त्र से परब्रह्म में मिली हुई कुण्डलिनी का अवहार कर उसके मुख में स्थित जीव को हृदयदेश में रखकर मूलाधार में ज्योतिर्लिङ्ग को साढ़े तीन घेरों से वेष्टित कर अवस्थित हुई कुण्डलिनी की भावना करनी चाहिये । इसके पश्चात् आं ह्रीं क्रों तीन बीजों का उच्चारण कर 'मम प्राणा इह प्राणाः, मम जीव इह स्थितः, मम सर्वेन्द्रियाणि इह स्थितानि, मम श्रोत्रत्वक्चक्षूरसन- घ्राणवाक्पादपाणिपायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा' यह मन्त्र पढ़कर हृदय प्रदेश में अङ्गुष्ठ- स्थापित कर अमुनी ते० और मनो जूति० दोनों मन्त्र पढ़ने चाहिये यह प्राणप्रतिष्ठा है ।
९०४ रामायणमीमांसा परिशिष्ट "रक्ताम्भोधिस्यपोतोल्लसदरुणसरोजारूढा कराब्जैः पाशं कोदण्डमिक्षूद्भवमथगुणमप्यङ्कुशं पञ्चबाणान्॥ बिभ्राणासृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढ्या देवी बालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः॥ इस मन्त्र का उच्चारण करे। इष्टमन्त्र से पाँच प्राणायाम कर के— "अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः। ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया॥" इस मन्त्र का उच्चारण कर एक साथ वामपाद की एड़ी से भूतल का तीन बार ताड़न, तीन बार कर का आस्फोटन और क्रूर दृष्ट्यवलोकन एवं तालत्रय से भौम, आन्तरिक्ष तथा दिव्य सभी विघ्नों का उत्सारण करना चाहिए। पश्चात् आत्मा में देवत्व-भावना करते हुए देह में न्यास आदि करने चाहिये। अथ मातृकान्यासः— अस्य मातृकान्यासमहामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः मातृका सरस्वती देवता हलो बीजानि स्वराः शक्तयः बिन्दवः कीलकानि न्यासे विनियोगः। ब्रह्मणे ऋषये नमः शिरसि। गायत्रीच्छन्दसे नमो मुखे। मातृकासरस्वतीदेवतायै नमो हृदये। हल्भ्यो बीजेभ्यो नमो गुह्ये। स्वरेभ्यः शक्तिभ्यो नमः पादयोः। बिन्दुभ्यः कीलकेभ्यो नमो नाभौ। विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे। करसम्पुट में (अर्थात् अञ्जलि बाँधकर) सभी मातृकाओं की भावना करके तीन बार अपने सर्वाङ्ग में व्यापक न्यास करना चाहिये। हृदयादिन्यास और करादिन्यास में उपनीत त्रैवर्णिक प्रणव का प्रयोग कर सकते हैं। अन्य लोगों को ऐं ह्रीं श्रीं अथवा रां बीज का प्रयोग करना चाहिये। रां अं कं खं गं घं ङं आं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। रां इं चं छं जं झं ञं ईं तर्जनीभ्यां नमः। रां उं टं ठं डं ढं णं ऊं मध्यमाभ्यां नमः। रां एं तं थं दं धं नं ऐं अनामिकाभ्यां नमः। रां ओं पं फं बं भं मं औं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। रां अं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं अः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। रां अं कं खं गं घं ङं आं हृदयाय नमः। रां इं चं छं जं झं ञं ईं शिरसे स्वाहा। रां उं टं ठं डं ढं णं ऊं शिखायै वषट्। रां तं थं दं धं नं ऐं कवचाय हुम्। रां ओं पं फं बं भं मं औं नेत्रत्राय वौषट्। रां अं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं अः अस्त्राय फट्। ये दोनों करादिन्यास और हृदयादिन्यास करने चाहिये। इसी प्रकार "पञ्चाशद्वर्णभेदैर्विहितवदनदोःपाद्युक्कुक्षिवक्षो- देशां भास्वत्कपर्दाकलितशशिकलामिन्दुकुन्दावदाताम्। अक्षस्रक्कुम्भचिन्तालिखितवरकरां त्रीक्षणामब्जसंस्था- मच्छायकल्पामतुच्छस्तनजघनभरां भारतीं तां नमामः॥" इस मन्त्र से मातृका सरस्वती का ध्यान करके निम्नोक्त रीति से एक-एक वर्ण का अङ्गों में न्यास करना चाहिये।
संख्या १ रामोपासना ९०५
अं नमः शिरसि । आं नमो मुखे । इं नमो दक्षनेत्रे । ईं नमो वामनेत्रे । उं नमो दक्षकणे । ऊं नमो वामकर्णे । ऋं नमो दक्षनासायाम् । ॠं नमो वामनासायाम् । ऌं नमो दक्षगण्डे । ॡं नमो वामगण्डे । एं नम ऊर्ध्वोष्ठे । ऐं नमोऽधरोष्ठे । ओं नम ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ । औं नमोऽधोदन्तपङ्क्तौ । अं नमः शिरसि मुखान्ते जिह्वाग्रे । अः नमो मुखान्ते कण्ठे च । कं नमो दक्षबाहुमूले । खं नमो दक्षबाहुमध्यसन्धौ । गं नमो दक्षमणिबन्धे । घं नमो दक्षाङ्गुलिमूले । ङं नमो दक्षाङ्गुल्यग्रे । चं नमो वामबाहुमूले । छं नमो वामबाहुसन्धौ । जं नमो वाममणिबन्धे । झं नमो वामाङ्गुलिमूले । ञं नमो वामाङ्गुल्यग्रे । टं नमो दक्षोरूमूले । ठं नमो दक्षजानुनि । डं नमो दक्षजङ्घापाद- सन्धौ । ढं नमो दक्षपादाङ्गुलिमूले । णं नमो दक्षपादाङ्गुल्यग्रे । तं नमो वामोरूमूले । थं नमो वामजानुनि । दं नमो वामजङ्घापादसन्धौ । धं नमो वामपादाङ्गुलिमूले । नं नमो वामपादाङ्गुल्यग्रे । पं नमो दक्षपार्श्वे । फं नमो वामपार्श्वे । बं नमः पृष्ठे । भं नमो नाभौ । मं नमो जठरे । यं नमो हृदि । रं नमो दक्षस्कन्धे । लं नमो वामस्कन्धे गलपृष्ठे ककुदि । वं नमो वामस्कन्धे । शं नमो हृदयादिदक्षकराङ्गुल्यन्तम् । षं नमो हृदयादिवामकराङ्गुल्यन्तम् । सं नमो हृदयादिदक्षपादाङ्गुल्यन्तम् । हं नमो हृदयादिवामपादाङ्गुल्यन्तम् । लं नमो हृदयादिगुह्यान्तम् । क्षं नमो हृदयादिमूर्धान्तम् । अथान्तर्मातृकान्यासः— “आधारे लिङ्गनाभौ हृदयसरसिजे तालुमूले ललाटे द्वे पत्रे षोडशारे द्विदशदशदले द्वादशार्धे चतुष्के । वासान्ते भालमध्ये डफकठसहिते कण्ठदेशे स्वराणां हं क्षं तत्त्वार्थयुक्तं सकल दलगतं वर्णरूपं नमामि ॥ के अनुसार मूलाधार चतुर्दलकमल के चारों दलों पर वं शं षं सं इन चारों वर्णों का ध्यान करके सिद्धि- बुद्धिसहित महागणपति का स्मरण कर पञ्चोपचार मानस पूजन कर ६०० हंसः सोहम् इस अजपागायत्री मन्त्र का जप उन्हें समर्पण करना चाहिए । स्वाधिष्ठान के षट् दलों पर बं भं मं यं रं लं इन ६ बीजों का ध्यान कर उन बीजों पर अधिष्ठित महासरस्वती सहित ब्रह्मा का पञ्चोपचार मानस पूजन कर उन्हें छः हजार अजपागायत्री का जप समर्पण करना चाहिये । मणिपूर में दशदलों पर डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं इन दश बीजों का ध्यान कर उनपर अधिष्ठित महालक्ष्मीसहित विष्णु का पञ्चोपचार मानस पूजन कर उन्हें ६००० अजपागायत्री का जप समर्पण करना चाहिये । अनाहत के द्वादश दलों पर कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं इन बीजों का ध्यान कर उन बीजों पर अधिष्ठित पार्वतीसहित परमशिव का पञ्चोपचार मानस पूजन कर उन्हें छः हजार अजपागायत्री का जप समर्पण करना चाहिये । विशुद्ध के षोडश दलों पर अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः इन षोडश बीजों का ध्यान कर उनपर अधिष्ठित प्राणशक्तिसहित जीव का पञ्चोपचार मानस पूजन कर उसे एक हजार अजपागायत्री का जप समर्पण करना चाहिये । आज्ञाचक्र में द्विदलपद्म पर हं क्षं इन वर्णों का ध्यान कर वहाँ अधिष्ठित ज्ञानशक्ति सहित गुरु को एक सहस्र अजपागायत्री जप का समर्पण करना चाहिये । ब्रह्मरन्ध्र से सहस्र दलों पर उक्त सभी बीजों का विंशति आवर्तन करके उनपर स्थित इष्टदेवता के लिए एक सहस्र अजपाजप निवेदन करना चाहिये । अजपाजपस्वरूप— “हकारेण बहिर्याति सकारेणाविशेत् पुनः । हंस हंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ शतानि षट् दिवारात्रं सहस्राण्येकविंशतिः ॥६२॥ ११४
एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥ अस्याः सङ्कल्पमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते ॥६३॥” प्रत्येक प्राणी के श्वास लेने पर स एवं श्वास निकालने पर ह का स्वाभाविक रूप से उच्चारण होता है। हंकार उच्चारण करता हुआ श्वास बाहर जाता है एवं सकार उच्चारण करता हुआ भीतर वापस लौटता है। इसी प्रकार रा एवं म इन दोनों अक्षरों की भावना की जा सकती है। राममन्त्र के समान ही हंसमन्त्र परमेश्वर का मन्त्र है। अद्वैतसिद्धान्त के अनुसार हंसः सोहं इस प्रकार अनुलोम विलोम में मैं (जीव) सः वह (परमात्मा) है और वह (परमात्मा) मैं त्वंपदलक्ष्यार्थ साक्षी रूप हूँ इत्यादि अर्थ होता है। स्वभाव से इस मन्त्र का अहोरात्र में २१ हजार ६ सौ जप हो जाता है। प्रातः नियमित समय में पूर्वोक्त विधि से भावनापूर्वक तत्तत् चक्रस्थ देवताओं को समर्पणमात्र से महान् फल होता है। उसका संक्षिप्त सङ्कल्प निम्नोक्त है—“षट्शताधिकैकविंशतिसाहस्रिकां निःश्वासोच्छ्वासरूपां अजपागायत्रीं मूलाधारादिब्रह्मरन्ध्रान्तसप्तचक्रनिवासिनीभ्यो देवताभ्यो निवेदयामि। पृथक् पृथक् सङ्कल्प निम्नोक्त है—मूलाधारे रक्तवर्णे वं शं षं सं चतुरक्षरे चतुर्दलपद्मे ऐरावतवाहनस्थिते चतुष्कोणयन्त्रे लं बीजे स्थिताय कुङ्कुमवर्णाय सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये षट्शतपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। स्वाधिष्ठाने सिन्दूरवर्णे बं भं मं यं रं लं षडक्षरे षड्दलपद्मे मकरवाहनस्थिते अर्धचन्द्रयन्त्रे वं बीजे स्थिताय महासरस्वतीसहिताय ब्रह्मणे षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। मणिपूरे नीलवर्णे डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं दशाक्षरे दशदलपद्मे मेषवाहनस्थिते त्रिकोणयन्त्रे रं बीजे स्थिताय महालक्ष्मीसहिताय विष्णवे षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। अनाहतचक्रे अरुणवर्णे कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं द्वादशाक्षरे द्वादशदलपद्मे हरिणवाहनस्थिते षट्कोणयन्त्रे यं बीजे स्थिताय पार्वतीसहिताय परमशिवाय षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। विशुद्धौ धूम्रवर्णे अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः षोडशाक्षरे षोडशदलपद्मे हस्ति- वाहनस्थिते शून्ययन्त्रे हं बीजे स्थिताय प्राणशक्तिसहिताय जीवाय सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं निवेदयामि। आज्ञाचक्रे श्वेतवर्णे हं क्षं द्व्यक्षरे द्विदलयद्मे नादवाहनस्थिते ॐकारान्तर्गते लिङ्गमन्त्रे स्थिताय ज्ञानशक्ति- सहिताय गुरवे सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। ब्रह्मरन्ध्रे चित्रवर्णे सहस्रदलपद्मे पञ्चाशद्भि,मातृकाभिर्विंशतिकृत्वोऽ- धिष्ठिते बिन्दुवाहनस्थिते विसर्गयन्त्रे पूर्णचन्द्रमण्डले आनन्दमहासमुद्रमध्ये चिन्मयमणिद्वीपे चित्सारचिन्तामणिमन्दिरे कल्पवृक्षाधस्तले अव्यक्तब्रह्ममर्हासिंहासने स्थिताय चिच्छक्तिसहिताय परमात्मने सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। जपप्रकारो यथा—अस्य श्रीरामषडक्षरमहामन्त्रराजस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः श्रीरामचन्द्रपरमात्मा देवता रां बीजं नमः शक्ती रामायेति कीलकम् चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपे विनियोगः। अथ ऋष्यादिन्यासः—ब्रह्मणे ऋषये नमः शिरसि। गायत्रीछन्दसे नमो मुखे। रामचन्द्रपरमात्मदेवतायै नमो हृदये। रां बीजाय नमो गुह्ये। नमः शक्तये नमः पादयोः। रामायेति कीलकाय नमो नाभौ। विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे। कुछ क्षण हंसः सोहं इस प्रकार श्वासोच्छ्वास में भावना करनी चाहिये। फिर मन्त्रजप करना चाहिये। अथ करन्यासः—रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। रीं तर्जनीभ्यां नमः। रूं मध्यमाभ्यां नमः। रैं अनामिकाभ्यां नमः। रौ कनिष्ठिकाभ्यां नमः। रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
संख्या १ रामोपासना ९७७ अथ हृदयादिषडङ्गन्यासः—रां हृदयाय नमः । रीं शिरसे स्वाहा । रूं शिखायै वषट् । रैं कवचाय हुम् । रौं नेत्राभ्यां वौषट् । रः अस्त्राय फट् । उपनीत द्विजाति को ही स्वाहा का उच्चारण करना चाहिये । अन्य लोगों को नमः का उच्चारण करना चाहिये । अथ अङ्गन्यासः—रां नमो ब्रह्मरन्ध्रे । रां नमो भ्रुवोर्मध्ये । मां नमो हृदि । यं नमो नाभौ । नं नमो लिङ्गे (उदकस्पर्शः) । मं नमः पादयोः । अथ ध्यानम्— “कालाम्भोधरकान्तिकान्तमनिशं वीरासनाध्यासितं मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपरं हस्ताम्बुजं जानुनि । सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां विद्युन्निभां राघवं पश्यन्तीं मुकुटाङ्गदादिविविधाकल्पोज्ज्वलाङ्गं भजे ॥” आनन्दसमुद्र के मध्य में चिन्मयमणिद्वीप में चित्सारचिन्तामणिमन्दिर में कल्पवृक्ष के मूल में अव्याकृत ब्रह्ममय दिव्य सिंहासन पर श्रीरामचन्द्र प्रभु विराजमान हैं। बायें करकमल को घुटने पर रखकर दाहिने से ज्ञानमयी मुद्रा धारण किये हुए अविरत वीरासन से स्थित नीलनीरद नीलकमल नीलमणि के तुल्य मञ्जुल कान्तिवाले, मुकुट, अङ्गद आदि विविध भूषणालङ्कारों से अलंकृत, दिव्य अङ्गवाले श्रीराम और उनके पार्श्व में विराजमान निर्निमेष नयनों से श्रीराम की ओर निहारती हुई करकमलधारिणी विद्युद्वर्णा भगवती सीता का हम भजन करते हैं। इस प्रकार ध्यान करके सर्वतोभद्रमण्डल में श्रीराम की अर्चा की जाती है । सर्वप्रथम सर्वतोभद्रमण्डल में मं मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठदेवताभ्यो नमः इस मन्त्र से पीठदेवताओं की गन्धपुष्पसमर्पण द्वारा पूजा करनी चाहिए । सर्वतोभद्रपीठ में पूर्वादि प्रदक्षिणक्रम से विमला आदि आठ शक्तियों का और मध्य में एक शक्ति का ध्यान करते हुए नमः मन्त्र से पूजन करना चाहिये । पीठे पूर्वादिक्रमेण—(१) विमलायै नमः (२) उत्कर्षिण्यै नमः (३) ज्ञानायै नमः (४) क्रियायै नमः (५) योगायै नमः (६) प्रह्वयै नमः (७) सत्यायै नमः (८) ईशानायै नमः मध्ये (९) अनुग्रहायै नमः, नमो भगवते रामाय सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगपद्मपीठात्मने नमः, इति पुष्पासनं दत्त्वा (इस मन्त्र से पुष्प का आसन समर्पण कर ) पीठमध्ये स्वेष्टदेवं संस्थाप्य (पीठ के मध्य में भगवान् श्रीराम की मूर्ति या यन्त्र की स्थापना करके प्राणप्रतिष्ठा करके ध्यानपूर्वक पुष्पान्त पूजा करके ) प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा पुष्पैर्ध्यात्वा पुष्पान्तैरुपचारैः सम्पूज्य, देवाज्ञां गृहीत्वा आवरणपूजां कुर्यात् । इष्टदेव की आज्ञा लेकर आवरणपूजा करनी चाहिये । अञ्जलि में पुष्प लेकर— “संविन्मयः परो देवः परामृतरसप्रिय । अनुज्ञां देहि मे राम परिवारार्चनाय ते ॥” इस मन्त्र से पुष्पाञ्जलि अर्पण करके आवरणपूजा करनी चाहिये । (१) देववामपार्श्वे सीतायै नमः सीताश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (२) अग्निकोणे शां शार्ङ्गाय नमः शार्ङ्गश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (३) दक्षिणे शं शराय नमः शरश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) वामे चां चापाय नमः चापश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलि दत्त्वा “अभीष्टसिद्धि मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥” पुनः पुष्पाञ्जलि दत्त्वा प्रथमावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।”
९०८ रामायणमीमांसा परिशिष्ट
केसरेषु षट्कोणे अग्निकोणं प्रारभ्य--- (१) रां हृदयाय नमः हृदयशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) नैर्ऋते रीं शिरसे स्वाहा शिरः- शक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) पश्चिमायां रूं शिखायै वषट् शिखाशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (४) वायव्ये रैं कवचाय हुम् कवचशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) ऐशान्यां रौं नेत्रत्रयाय वौषट् नेत्रत्रयशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (६) पूर्वस्यां रः अस्त्राय फट् अस्त्रशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा द्वितीयावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” षट्कोणाद् बहिरष्टदलेषु पूर्वादिप्रादक्षिण्यक्रमणेन--- (१) हं हनुमते नमः हनुमच्छ्रीपादुकां पूजयायि तर्पयामि नमः । (२) सुं सुग्रीवाय नमः सुग्रीवश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) भं भरताय नमः भरतश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) विं विभीषणाय नमः विभीषणश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) लं लक्ष्मणाय नमः लक्ष्मण श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (६) अं अङ्गदाय नमः अङ्गदश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) शं शत्रु- घ्नाय नमः शत्रुघ्नश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) जां जाम्बवते नमः जाम्बवच्छ्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा--- तृतीयावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” अष्टदलाग्रेषु तेनैव क्रमेण---(१) धृं धृष्टये नमः धृष्टिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) जं जयन्ताय नमः जयन्तश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) विं विजयाय नमः विजयश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) सुं सुराष्ट्राय नमः सुराष्ट्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (५) रां राष्ट्रवर्धनाय नमः राष्ट्रवर्धनश्रीपादुकां पूजयामि तर्प- यामि नमः । (६) अं अकोपाय नमः अकोपनश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) धं धर्मपालाय नमः धर्मपाल- श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) सुं सुमन्ताय नमः सुमन्तश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— चतुर्थाविरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” भूपुरे प्रवेशद्वारेषु सूर्योदयाप्रागादिषु प्रादक्षिण्यक्रमणेन—(१) लं इन्द्राय नमः इन्द्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) रं अग्नये नमः अग्निश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (३) मं यमाय नमः यमश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) क्षं निर्ऋतये नमः निर्ऋतिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) वं वरुणाय नमः वरुणश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (६) यं वायवे नमः वायुश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) कुं कुबेराय नमः कुबेरश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) हं ईशानाय नमः ईशानश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (९) ईशानीप्रागन्तराले आं ब्रह्मणे नमः ब्रह्मश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (१०) निर्ऋतिवरुणान्तराले ह्रीं शेषाय नमः शेषश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं पञ्चमावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— पञ्चमावरदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।”
संख्या १ रामोपासना ९०९ भूपुरप्रवेशद्वाराद् बहिः पूर्वादिक्रमेण—(१) वं वज्राय नमः वज्रश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (२) शं शक्त्यै नमः शक्तिश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ! (३) दं दण्डाय नमः दण्डश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) खं खड्गाय नमः खड्गश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (५) पां पाशाय नमः पाशश्रीपादुकां पूजयामि तर्प- यामि नमः । (६) अं अङ्कुशाय नमः अङ्कुशश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (७) गं गदायै नमः गदाश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (८) त्रिं त्रिशूलाय नमः त्रिशूलश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (९) पं पद्माय नमः पद्मश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— “अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं षष्ठाख्यावरणार्चनम् ॥ पुनः पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा— षष्ठावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।” इत्यावरपूजां कृत्वा धूपादि नमस्कारान्तं सम्पूज्य नमस्कुर्यात् । अथ प्रार्थना— “रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥ श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम । श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥ श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥” “वर्णलक्षं जपेन्मन्त्री तद्दशांशं सरोरुहैः । जुहुयादर्चिते वह्नौ ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः ॥” श्रीसुतीक्ष्ण के प्रश्न पर अगस्त्य ने कहा था— “रामं पद्मपलाशाक्षं कालाम्बुदसमप्रभम् । स्मितवक्त्रं सुखासीनं चिन्तयेत् चिन्तिताप्तये ॥” पद्मपलाश के तुल्य नेत्रवाले नीलाम्बुदश्यामल स्मितमुख सुखासीन श्रीराम का अभीष्टसिद्धि के लिए ध्यान करना चाहिये— “रागादिक्लुषं चित्तं वैराग्येण सुनिर्मलम् । कृत्वा ध्यायेत् सदा रामं भवबन्धविमुक्तये ॥” रागादिदूषित चित्त को वैराग्य से निर्मल करके भवबन्ध विमुक्ति के लिए श्रीराम का ध्यान करना चाहिये । प्रातः शुद्ध होकर विविक्त देश में ध्यान, पूजादि करने चाहिये । नाभिकन्द में उद्भूत कदलीपुष्प के तुल्य स्निग्ध वर्ण- वाले अष्टदल हृदयकमल का ध्यान करना चाहिये । श्रीराम-नाम से ही उस पङ्कज को प्रफुल्लित करके उसके पत्रों पर क्रमेण सोम, सूर्य तथा अग्निमण्डल का चिन्तन करना चाहिये । उसके ऊपर दिव्य रत्नमय उज्ज्वलपीठ या सिंहा- सन स्थापित करके उसपर कोटि-कोटिसूर्यसमप्रभ श्रीराम का ध्यान करना चाहिए । “नाभिकन्दसमुद्भूतं कदलीकुसुमोपमम् । अष्टपत्रं स्निग्धवर्णं ध्यायेद्धृदयपङ्कजम् ॥ तत्पत्रं रामनाम्नैव फुल्लं कृत्वास्य मध्यमे । भावयेत् सोमसूर्याग्निमण्डलान्यत्तरोत्तरम् ॥
९१० रामायणमीमांसा परिशिष्ट तस्योपरिन्यसेद्दिव्यं पीठं रत्नमयोज्ज्वलम् । तन्मध्ये राघवं ध्यायेत् सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥” नीलकमल के तुल्य विशाल नेत्र और विशाल वक्षःस्थलवाले उदीयमान भास्कर के तुल्य कुण्डलों से शोभित सुन्दर वस्त्र एवं सुन्दर किरीट से युक्त, शुभ्रकपोल तथा शुचिस्मित ज्ञानमुद्रायुक्त दो भुजाओं से शोभित कम्बुग्रीव सुन्दर स्निग्ध सुचिकृष्ण श्यामल अलकावलियों से युक्त श्रीराम का ध्यान करना चाहिये । नाना रत्नों से युक्त दिव्यहारों से भूषित अव्यय विद्युत्पुञ्ज के समान देदीप्यमान पीतवस्त्र और उत्तरीयवस्त्र धारण किये हुए सन्तानतरूमूल में वे दिव्य सिंहासन पर स्थित हैं। दिव्य गन्ध, अङ्गविलेपन तथा वनमाला से सुशोभित श्रीराम के वामपार्श्व में तप्तस्वर्ण- वर्ण्य लीलापङ्कजधारिणी चारुहासिनी शुभानना भूषणों से अलंकृत स्निग्ध दृष्टि से श्रीराम को निहारती हुई श्रीसीता विराजमान हैं। छत्र-चामर हाथ में लेकर श्रीलक्ष्मण उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। हनुमान्, सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गद आदि वानरों से सेवित, सनन्दनादि तथा अन्य योगिवृन्दों से संस्तुत, सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ तथा योगसिद्धिप्रद श्रीराम का सदैव हृदय में ध्यान करना चाहिये । १. आवाहन— “आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं विभुम् । कौशल्यातनयं विष्णुं श्रीरामं प्रकृतेः परम् ॥” हम उन विश्व के स्वामी जानकीवल्लभ विभु कौशल्यानन्दवर्धन प्रकृति से पर विष्णुस्वरूप श्रीराम का आवाहन करते हैं । उक्त मन्त्र से आवाहनीमुद्रा में श्रीराम का आवाहन करना चाहिये । २. आसनम्— “राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते । रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥” हे राजाधिराज, हे राजेन्द्र, हे रामचन्द्र, हे महीपते, आपके लिए रत्नमय दिव्य सिंहासन अर्पित करता हूँ, इसे स्वीकार कीजिये । ३. सन्निधापन— “श्रीरामागच्छ भगवन् रघुवीर नृपोत्तम । जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव सर्वदा ॥ रामचन्द्र महेश्वास रावणान्तक राघव । यावत्पूजां समाप्येऽहं तावत् सन्निहितो भव ॥” हे श्रीराम, हे भगवन्, हे रघुवीर नृपोत्तम, हे राजेन्द्र, जानकी के साथ आइये और हे महेश्वास सुस्थिर होकर, हे रामचन्द्र, हे रावणान्तक जब तक मैं पूजा करूँ तब तक आप सन्निहित रहिये । उक्त मन्त्र से सन्निधापनी मुद्रा से सन्निधापन करना चाहिये । ४. सम्मुखीकरण— “रघुनन्दन राजर्षे राम राजीवलोचन । रघुनन्दन मे देव श्रीरामाभिमुखो भव ॥” हे रघुनन्दन, हे राजर्षे, हे राजीवलोचन, हे देवेश पूजा के लिए मेरे अभिमुख हों उक्त मन्त्र से सम्मुखी- करण करना चाहिये । ५. प्रार्थना— “शरणं मे जगन्नाथः शरणं भक्तवत्सलः । वरदो भव मे राजन् शरणं मे रघूत्तम ॥” जगन्नाथ भक्तवत्सल श्रीराम ही मेरे शरण हैं, आश्रय हैं । राजन्, श्रीराम आप ही मेरे लिए वरद हैं और आप ही मेरे रक्षक हैं उक्त मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिये ।
संख्या १ रामोपासना १११ ६. पाद्य— "त्रैलोक्यपावनानन्त नमस्ते रघुनायक। पाद्यं गृहाण राजर्षे नमो राजीवलोचन ॥" हे त्रैलोक्यपावन, हे अनन्त, हे रघुनायक, हे राजीवलोचन राजर्षे, आप पाद्य ( पाद प्रक्षालनार्थ जल ) ग्रहण करें । उक्त मन्त्र से दूर्वा, कमल, विष्णुक्रान्ता तथा विविध पुष्पों से युक्त जल श्रीराम के चरण में अर्पित करना चाहिये । ७, अर्घ्य— "परिपूर्णपरानन्द नमो रामाय वेधसे । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं कृष्ण विष्णो जनार्दन ॥" हे परिपूर्णपरानन्द, सर्वोत्पादक श्रीरामरूप में आपको नमस्कार है । हे कृष्ण, हे विष्णो, आप मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्य ग्रहण करें । उक्त मन्त्र से गन्ध, पुष्प, यव, सर्षप, दूर्वा, तिल, कुश, अक्षत के साथ रत्नमय स्वर्णपात्र में गङ्गादि का जल डालकर भगवान् के हस्तारविन्द में अर्घ्य प्रदान करना चाहिये । ८. आचमन— "राजराजेन्द्र देवेश शरणागतवत्सल । गृहाणाचमनं देव नित्यशुद्ध परात्पर ॥" हे देवेश, हे शरणागतवत्सल, हे नित्यशुद्ध आप आचमन स्वीकार करें । इस मन्त्र से जातीफल, कङ्कोल, लवङ्ग और गन्ध से युक्त अमृततुल्यजल जाचमन के लिए प्रदान करना चाहिये । ९. मधुपर्क "ॐ (श्री) नमो वासुदेवाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे । मधुपर्कं गृहाणेमं राजराजाय ते नमः ॥" सत्यज्ञानस्वरूप हे राजन्, आप मधुपर्क ग्रहण करें, इस मन्त्र से रत्नपात्र में दधि, मधु और घृत रखकर रत्नमय पात्रान्तर से ढँककर मधुपर्क समर्पण करना चाहिये । फिर भगवान् से निम्नलिखित मन्त्र से प्रसन्न होने की प्रार्थना करनी चाहिये— "प्रसीद जानकीनाथ सुप्रसीद सुरेश्वर । प्रसन्नो भव मे राजन् प्रसन्नो मधुसूदन ॥" १०. मधुपर्काङ्ग आचमन— "नमः सत्याय शुद्धाय तत्त्वज्ञानस्वरूपिणे । गृहाणाचमनं नाथ सर्वलोकैकनायक ॥" सत्य, शुद्ध और तत्त्वज्ञान स्वरूप भगवान् श्रीराम को नमस्कार है, हे त्रैलोक्यनायक आप आचमन स्वीकार करें । इस मन्त्र से शुद्ध जल आचमन के लिए प्रदान करे । ११. स्नान— "ब्रह्माण्डोदरमध्यस्थैस्तीर्थैश्च रघुनन्दन । स्नपयिष्याम्यहं भक्त्या सङ्गृह्णाण जनार्दन ॥" इस मन्त्र से विविध तीर्थोदकों तथा गङ्गोदक से भगवान् श्रीराम को स्नान कराना चाहिये । १२. पञ्चामृतस्नान— "पञ्चामृतं समानीतं पयो दधि घृतं मधु । सशर्करं मया दत्तं श्रीराम प्रतिगृह्यताम् ॥" इस मन्त्र से भगवान् श्रीराम का दूध, दही, घी, मधु और शर्करा से पृथक् पृथक् स्नान कराकर इन पाँचों को सम्मिलित कर पञ्चामृत स्नान कराना चाहिये । उसके पश्चात् उष्णोदक से स्नान कराना चाहिये ।