भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 969

८९२ रामायणमीमांसा द्वाविंश नित्य योगरत होकर कृष्णद्वैपायन मुनि ने तीन वर्षों में इस महाभारत आख्यान की रचना की । गणेशजी के द्वारा महाभारत का लिखा जाना भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत का व्यासकृतत्व सिद्ध करता है । तप से और ब्रह्मचर्य से वेदों का शाखाभेद से विस्तार करके सत्यवतीसुत व्यास ने महाभारत इतिहास की रचना की । महाभारत को रचकर वे विचारने लगे कि इसे किसे पढ़ाया जाय । इसी बीच वहाँ ब्रह्माजी आये । उनका स्वागत और पूजन करके उनके आज्ञानुसार उनके समीप ही व्यासजी बैठ गये और उन्होंने ब्रह्माजी को बताया कि वेदों का रहस्य, वेदाङ्ग, उपनिषद, वेदों का विस्तार तथा अन्य जो कुछ वेद में है वह सब पुनः इतिहास पुराणरूप में भूत, भविष्य और वर्तमान की स्थिति, जरा, मृत्यु, व्याधि के अस्तित्व तथा विनाश का निश्चय, धर्मों तथा आश्रमों के लक्षण, चारों वर्णों के धर्म, पुराणों का समग्र- तात्पर्य, तप, ब्रह्मचर्य, पृथ्वी, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा तथा युगों का प्रमाण, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान, अन्तर्यामी का माहात्म्य, कर्मानुरूप दिव्य तथा मानुष जन्म, पवित्र तीर्थ, देश, नदियाँ, पर्वत, वन, समुद्र, दिव्य नगर, नगरव्यूहरचना, विभिन्न कोटि के मनुष्यों की भाषणपद्धति, नीतिशास्त्र तथा सर्वव्यापक ब्रह्म का मैंने निरूपण किया है । परन्तु मुझको कोई लेखक नहीं मिलता । ब्रह्माजी बोले तुम रहस्यज्ञान के निधि हो, जन्म से लेकर तुम्हारी वेदवादिनी सत्यवादिनी वाणी को मैं जानता हूँ । तीनों आश्रम जैसे गृहस्थाश्रम से बढ़कर नहीं होते वैसे ही तुम्हारे काव्य से बढ़कर काव्य करने की सामर्थ्य कवियों में नहीं होगी । तुम अपना काव्य लिखने के लिए गणपति का स्मरण करो । "उवाच च महातेजा ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् । कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम् ॥ ब्रह्मन् वेदरहस्यं च यच्चान्यत् स्थापितं मया । साङ्गोपनिषदां चैव वेदानां विस्तरक्रिया ॥ इतिहासपुराणानामुन्मुखं निर्मितञ्च यत् । भूतं भव्यं भविष्यञ्च त्रिविधं कालसंज्ञितम् ॥ जरा-मृत्यु-भय-व्याधि-भावाभावविनिश्चयः । विविधस्य च धर्मस्य ह्याश्रमाणां च लक्षणम् ॥ चातुर्वर्ण्यविधानञ्च पुराणानां च कृत्स्नशः । तपसो ब्रह्मचर्यस्य पृथिव्याश्चन्द्रसूर्ययोः ॥ ग्रहनक्षत्राताराणां प्रमाणं च युगैः सह । न्यायशिक्षा चिकित्सा च दानं पाशुपतं तथा ॥ हेतुनैव समं जन्म दिव्यं मानुषसंज्ञितम् । तीर्थानाञ्चैव पुण्यानां देशानाञ्चैव कीर्तनम् ॥ नदीनां पर्वतानाञ्च वनानां सागरस्य च । पुराणाञ्चैव दिव्यानां कल्पानां युद्धकौशलम् ॥ वाक्यजातिविशेषाश्च लोकयात्राक्रमश्च यः । यच्चापि सर्वगं वस्तु तच्चापि प्रतिपादितम् ॥ परं न लेखकः कश्चिदेतस्य भुवि विद्यते ।" ( म० भा० १।१।६१-७० )