रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 968, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९१ प्रत्यक्ष और अनुमान से अज्ञात धर्म, ब्रह्म आदि तत्त्वों का प्रतिपादन करनेवाला वेद अपौरुषेय आगम है। वेद एवं वेदाविरुद्ध प्रत्यक्षानुमान तथा आर्षज्ञान ऋतम्भरा-प्रज्ञा आदि के आधार पर रचे हुए आगम पौरुषेय आगम हैं। विशेष विवरण वेदप्रामाण्यप्रसङ्ग में देखें। महाभारत वेद के उपबृंहणार्थ आर्षविज्ञानसम्पन्न त्रिकालज्ञ परम वैदिक व्यास महर्षि के द्वारा महाभारत की रचना हुई है। महाभारत तथा अन्य पुराणादि प्रमाणों के द्वारा यह सिद्ध है कि वे भगवान् विष्णु के अवतार थे— “ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥” (भाग० १।४।१६) सत्रहवें अवतार में भगवान् विष्णु पराशर से सत्यवती में व्यासरूप में अवतीर्ण हुए और उन्होंने पुरुषों को अल्पबुद्धि जानकर वेदरूपी तरु को अनेक शाखाओं के रूप में विभक्त किया। महाभारत के अनुसार उत्पन्न होते ही इच्छानुसार उन्होंने देह बढ़ा ली। इतिहास सहित साङ्ग वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। पुनः वेदविदों में श्रेष्ठ, धर्म-ब्रह्मनिष्णात, सत्यव्रत, पवित्र एवं क्रान्तदर्शी ब्रह्मर्षि व्यास ने एक मिले-जुले वेद को हौत्र, आध्वर्यव, औद्गात्र, ब्राह्म आदि कर्मों की सुविधा के लिए ऋक्, यजु, साम और अथर्व भेद से चतुर्धा विभक्त किया— “जातमात्रश्च यः सद्यः इष्ट्या देहमवीवृधत् । वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् सेतिहासान् महायशाः ।। विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः । परावरज्ञो ब्रह्मर्षिः कविः सत्यव्रतः शुचिः ॥” (म० भा० १।५०।३,४) अतीत और अनागत का वर्णन सर्वज्ञकल्प भगवान् व्यास को वेद तथा आर्ष विज्ञान से भूत, भविष्य, वर्तमान, सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट, स्थूल एवं सूक्ष्म धर्म-ब्रह्म-सम्बन्धी सब वस्तुएँ विज्ञात थीं। उनके वर के प्रभाव से युद्धव्यस्त सञ्जय को भी भारत-संग्राम की सभी घटनाएँ हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष थीं। “व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम् ॥” (गीता १८।९५) श्रीव्यास के वरप्रसाद से मैंने साक्षात् योग-निरूपण करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से इस योग को सुना था। अतः सर्वज्ञकल्प व्यास को वैशम्पायन और जनमेजय सम्बन्धी प्रश्नोत्तर भी ज्ञात थे, अतः महाभारत के एक लाख श्लोकों में ही उन सब प्रश्नोत्तरों का सङ्कलन होना पूर्णरूप से सम्भव था। इसी लिए वनपर्व में अनेक भविष्य की बातों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बौद्धों के एडूक (गाडोवा) का भी उल्लेख किया है। महाभारत की रचना का समय तथा द्वैपायन व्यास की काव्यशक्ति तथा श्रीगणेश के द्वारा लिखा जाना भी यह सिद्ध करते हैं कि चतुर्विंशतिसाहस्री संहिता नहीं, किन्तु लक्षश्लोकात्मक ही भारत व्यासनिर्मित है— “त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनो मुनिः। भारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम् ॥” (म० भा० १।६२।५२)