भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 967

८९० रामायणमीमांसा द्वाविंश कृष्णद्वैपायन ने यह भारत पहले पुत्र शुक को पढ़ाया। उसके बाद समर्थ ऋषि ने अन्य योग्य शिष्यों को प्रदान किया। पश्चात् महर्षि व्यास ने साठ लाख श्लोकों की एक दूसरी भारतसंहिता रची उसमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में प्रतिष्ठित हैं। नारदजी ने देवलोक में उन्हें सुनाया। असित देवल ने पितरों को १५ लाख श्लोक सुनाये। शुकदेव ने उसमें से ही १४ लाख श्लोक गन्धर्वों और यक्षों को सुनाये। मनुष्यलोक में वैशम्पायन ने एक लाख श्लोक सुनाये। उसी वैशम्पायनोक्त लक्ष श्लोकों को मैं कहता हूँ। आप लोग उसे धारण करें। उपर्युक्त वाक्यों से स्पष्ट है कि श्रीव्यासजी ने केवल चौबीस हजार श्लोकों की भारतसंहिता ही नहीं बनायी, किन्तु एक लाख श्लोकों की, चौबीस हजार श्लोकों की, डेढ़ सौ श्लोकों की और साठ लाख श्लोकों की पृथक्- पृथक् चार संहिताएँ बनायीं। साठ लाख श्लोकोंवाली संहिता से ५९ लाख श्लोक देवादि लोकों में हैं। मर्त्यलोक में एक लाख श्लोकवाली संहिता ही है। पहले का एक लाख भी साठ लाख श्लोकों में ही अन्तर्निहित समझना चाहिये। अन्यथा एक लाख श्लोकोंवाली दो पृथक्-पृथक् भारतसंहिताएँ मिलनी चाहिये, परन्तु ऐसी कोई भिन्न संहिता मिलती नहीं। २४ हजार श्लोकोंवाली भारतसंहिता भी कहीं नहीं मिलती है। अतः यही समझना चाहिये कि जैसे बड़ा मकान बनाने या उपन्यास लिखने के पहले उसकी सामान्य रूप- रेखा बनानी पड़ती है उसी तरह व्यास ने पहले उपाख्यान से रहित केवल भारतवंशीय लोगों के इतिहास के रूप में ग्रन्थ तैयार किया था। पश्चात् उसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से सम्बन्धित उपाख्यान आदि को जोड़कर एक लाख श्लोकों का महाभारत तैयार किया और उसी में चौबीस हजार श्लोकों का अन्तर्भाव हो गया। डेढ़ सौ श्लोकों की अनुक्रमणिका भी अनुक्रमणिकाध्याय के रूप में इसमें सम्मिलित है। वर्तमान काल में उपलभ्यमान लक्षश्लोकात्मक ग्रन्थ ही महाभारत है। वही भारत या महाभारत एवं वही जय नाम का इतिहास भी है। जैसे रामायण के सीताचरित एवं पौलस्त्यवध भी नाम हैं— “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्। पौलस्त्यवध इत्येव चकार चरितव्रतः॥” (वा० रा० १।४।७) “तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् महाभारतमुच्यते। महत्त्वे च गुरुत्वे च ध्रियमाणं यतोऽधिकम् ॥” (म० भा० १।१।२७३) सत्य की तराजू पर तौलने से यह ग्रन्थ महत्त्व और गुरुत्व में वेदों से भी अधिक हुआ। इसी लिए यह महाभारत कहा जाता है। व्यास ने ही लक्षश्लोकात्मक भारत बनाया, यह अन्य वचनों से भी स्पष्ट है— “इदं शतसहस्रं तु श्लोकानां पुण्यकर्मणाम्। सत्यवत्यात्मजेनेह व्याख्यातममितौजसा॥” (म० भा० १।६२।१४) “मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा। जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा॥” (म० भा० १।६२।२०) भरतों का महान् जन्मवृत्तान्त-वर्णन के कारण भी इसे महाभारत कहा है— “भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते।” (म० भा० १।६२।३९) आगम-प्रामाण्य भारतीय संस्कृति में प्रत्यक्ष, अनुमान से अतिरिक्त एक स्वतन्त्र आगम प्रमाण भी मान्य है। आगम में वेद अपौरुषेय एवं आर्ष इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्र पौरुषेय माने जाते हैं।