भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 970, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 970

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९१ महाभारत में ही इन अनन्त ज्ञानों का भण्डार है। चतुर्विंशत्साहस्री संहिता में नहीं है। सौति ने कहा कि इस प्रकार आदेश देकर ब्रह्माजी अपने स्थान को चले गये। सत्यवतीपुत्र व्यास ने गणपति का स्मरण किया। भक्तमनोवाञ्छा पूर्ण करनेवाले गणपति वहाँ आ पहुँचे। व्यासजी ने उनकी विधिवत् पूजा करके कहा मैं मन में तैयार इस महाभारत को स्वयं बोलता हूँ आप लेखक बनें। गणपति ने कहा कि ठीक है, परन्तु लिखते लिखते मेरी लेखनी क्षण भर के लिए भी रुकनी नहीं चाहिये। इस तरह लिख सको तो बोलो, मैं लिखने को तैयार हूँ। व्यास ने कहा आप समझे बिना कदापि न लिखें। व्यास की बात स्वीकार करके गणपति भगवान् स्वयं लिखने लगे। व्यासजी कुतूहलपूर्वक गूढ़ रचना करने लगे, भारत के आठ हजार आठ सौ आठ श्लोक बड़े ही गूढ़ कहे जाते हैं। स्वयं व्यासजी की प्रतिज्ञा है कि उन्हें मैं स्वयं जानता हूँ एवं शुक जानते हैं, सञ्जय समझते हैं या नहीं, इसमें संशय है— “अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा ।” समर्थ गणपति भी इन श्लोकों का विचार करने के लिए क्षणभर रुक जाते थे। इस बीच व्यास बहुत से श्लोकों का निर्माण कर लेते थे। किसी छोटे लेख के लेखक के लिए गणपति को लेखक बनाने का प्रसङ्ग सङ्गत नहीं। इस दृष्टि से भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत व्यासदेव निर्मित और गणपति द्वारा लिखित है, यह मानना ही चाहिये। इस प्रकार महाभारत में ही स्पष्ट उल्लेख होने पर तद्विपरीत कल्पना सर्वथा निराधार ही है। चतुर्विंश- तिसाहस्री संहिता में आठ हजार आठ सौ आठ गूढ़ श्लोक नहीं हो सकते। उसके लिए तीन वर्ष का समय भी अनावश्यक नहीं है। “त्रिभिर्वर्षैरिदं पूर्णं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः। अखिलं भारतञ्चेदं चकार भगवान् मुनिः ।। आकर्ण्य सततं भक्त्या जयाख्यं भारतं महत् । श्रीश्च कीर्तिस्तथा विद्या भवन्ति सहिताः सदा ।।”(म०भा०स्वर्गारोहण५।४८।४९) “तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् । अब्रवीद् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः ।। जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः । शशास शिष्यमासीनं श्रावयामास भारतम् ।। कर्मान्तरेषु यज्ञस्य चोद्यमानः पुनः पुनः ।” (म० भा० १।१।९७,९८) के अनुसार धृतराष्ट्र आदि के परम गति को प्राप्त होने के पश्चात् जनमेजय तथा सहस्रों ब्राह्मणों के प्रश्न करने पर महान् ऋषि भगवान् व्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को आदेश दिया और वैशम्पायन ने यज्ञकर्म के बीच बीच में बार बार प्रेरित होकर सदस्यों के साथ समासीन होकर भारत का श्रवण कराया। इससे भी स्पष्ट है कि पहले व्यास ने अपने शिष्यों को भारत सुनाया था। उसी को सर्पसत्र में वैशम्पायन ने जनमेजय को सुनाया। वैशम्पायन ने यही कहा भी था— “शृणु राजन् पुरा सम्यग् मया द्वैपायनाच्छ्रुतम् ।”

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