भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 977

३ पृष्ठ खाली प रि शि ष्ट ( १ ) रामोपासना अथ भूशुद्ध्यादि—“देवो भूत्वा यजेद् देवान् नादेवो देवमर्चयेत्” (आह्निककारिका) के अनुसार सभी प्रकार की उपासनाओं में भूशुद्ध्यादि अपेक्षित होते हैं । स्नान, सन्ध्यादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर प्रातःकाल पवित्र आसन पर बैठकर 'केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः तीन बार आचमन कर प्राणायाम करना चाहिये । रां बीज से प्राणायाम करते हुए मूलाधार में ज्योतिर्मयलिङ्ग को साढ़े तीन वलय से वेष्टित करके स्थित कुण्डलिनी का ध्यान करना चाहिये । ह्रीँ बीज से कुण्डलिनी को जागरित कर हृदयप्रदेश में अवस्थित प्रकाशपुञ्जमय जीव को मुख में रखकर ब्रह्मरन्ध्र में ले जाकर हंसः सोहम् इस मन्त्र से ब्रह्म के साथ जीव की एकरूपता के साथ मिलाप की भावना करनी चाहिये । दक्षिण कुक्षि में अवस्थित अधोमुख पापपुरुष का ध्यान करते हुए पूरक में यं बीज का १६ बार उच्चारण करते हुए पापपुरुष का शोषण कर कुम्भक में रं बीज का ६४ बार उच्चारण कर पाप- पुरुष को भस्म कर देना चाहिये । पुनः रेचक में ३२ बार यं बीज का उच्चारण कर पापपुरुष का भस्म बाहर निकाल देना चाहिये । ब्रह्मरन्ध्रगत चन्द्रमण्डल में अवस्थित होकर अमृतवर्षा करनेवाली अमृतेश्वरी देवी का ध्यान कर उनके शरीर से झरनेवाली अमृत-वर्षा से अपने को आप्लावित होने की भावना करनी चाहिए इसका नाम भूशुद्धि है । “ब्रह्मरन्ध्रगते चन्द्रमण्डलेऽमृतवर्षिणीम् । भवानीं भूमिशुद्धयर्थं भावयेदमृतेश्वरीम् ॥ ततस्तन्मौलिनिष्यन्दसुधाकल्लोलवृष्टिभिः । चिन्तयेन्मनसात्मानं भूमिशुद्धिरियं भवेत् ॥” अथ भूतशुद्धिः—प्राणायाम करके कुम्भक में लं वं रं यं हं इन पाँच महाभूतों के बीजों की एक आवृत्ति करके अपवादप्रक्रिया द्वारा समस्त पार्थिव प्रपञ्च पृथिवी में, पृथिवी जल में, जल तेज में, तेज वायु में, वायु आकाश में, आकाश अहंतत्त्व में, अहंतत्त्व महत्तत्त्व में, महत्तत्त्व अव्यक्त तत्त्व में एवं अव्यक्त तत्त्व परम सत्तत्त्व में में लीन हो गया ऐसी भावना करनी चाहिए । वं बीज से प्राणायाम करते हुए कुम्भक में अध्यारोपप्रक्रिया द्वारा पर- ब्रह्म से महदादिक्रमेण आकाश, आकाश से वायु, वायुसे तेज, तेज से जल, जल से पृथिवी और पृथिवी से सद्वासनात्मक दिव्य तेजोमय उपासनायोग्य अपना शरीर उत्पन्न कर सोहं इस मन्त्र से परब्रह्म में मिली हुई कुण्डलिनी का अवहार कर उसके मुख में स्थित जीव को हृदयदेश में रखकर मूलाधार में ज्योतिर्लिङ्ग को साढ़े तीन घेरों से वेष्टित कर अवस्थित हुई कुण्डलिनी की भावना करनी चाहिये । इसके पश्चात् आं ह्रीं क्रों तीन बीजों का उच्चारण कर 'मम प्राणा इह प्राणाः, मम जीव इह स्थितः, मम सर्वेन्द्रियाणि इह स्थितानि, मम श्रोत्रत्वक्चक्षूरसन- घ्राणवाक्पादपाणिपायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा' यह मन्त्र पढ़कर हृदय प्रदेश में अङ्गुष्ठ- स्थापित कर अमुनी ते० और मनो जूति० दोनों मन्त्र पढ़ने चाहिये यह प्राणप्रतिष्ठा है ।