रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९९ “यथा पुत्रवियुक्तोऽयं न किञ्चिद् दुःखमाप्नुयात् । इति तानन्वशाद्राजा नित्यमेव युधिष्ठिरः ॥ निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिष्ठति स मे सुहृद् । विपरीतश्च मे शत्रुः नियम्यश्च भवेन्नरः ॥” (म०भा०आदिपर्व २५।२,३) महाभारत में वासुदेव की महिमा और युधिष्ठिर की प्रशंसा के साथ धार्तराष्ट्रों की निन्दा भी है— “वासुदेवस्य माहात्म्यं पाण्डवानां च सत्यताम् । दुर्वृत्तं धार्तराष्ट्राणामुक्तवान् भगवानृषिः ॥” अतः धृतराष्ट्र के परमपदप्राप्ति के पश्चात् ही महाभारत का उल्लेख सङ्गत है, किन्तु गीता का प्रादुर्भाव तो युद्धारम्भ के प्रथम दिन ही हुआ था । महाभारत युद्धकाल पुराणों में कलियुग का आरम्भकाल, महाभारत-युद्धकाल और परीक्षित् का जन्मकाल एक ही माना गया है । महाभारत-युद्धकाल का पुष्ट प्रमाण निम्नोक्त है— “अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् । समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥” ( म० भा० आदिपर्व २।१३) कलियुग और द्वापर के मध्य में समन्तपञ्चक कुरुक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं का युद्ध हुआ था । कलिसंवत् एवं भारतयुद्धसंवत् के रूप में वही काल कहा जाता है । ज्योतिषग्रन्थों तथा पञ्चाङ्गों के अतिरिक्त कुछ शिलालेखों में भी इसका उल्लेख है । श्रीमद्भागवत से भी उक्त काल पुष्ट होता है— “तेनैव ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् । ते त्वदीये द्विजाः काले अधुना चाश्रिता मघाः ॥ यदा देवर्षयः सप्त मघासु विचरन्ति हि । तदा प्रवृत्तस्तु कलिर्द्वादशाब्दशतात्मकः ॥” प्रत्येक नक्षत्र पर सप्तर्षि १०० वर्ष रहते हैं। वे सप्तर्षि तुम्हारे जन्मकाल में मघा नक्षत्र पर थे और आज तुम्हारे अन्तकाल में भी मघा नक्षत्र पर ही हैं। और जब सप्तर्षि मघा पर आये हैं तभी से दिव्य (देवताओं के) १२०० वर्षों का ४ लाख बत्तीस हजार मानव वर्षोंवाला कलियुग प्रवृत्त हुआ है। इसका आरम्भ ईसवीय सन् के प्रारम्भ से ३१०२ वर्ष पूर्व फरवरी मास की ८वीं तारीख के प्रातःकाल से हुआ था । इस तरह महाभारत की प्राचीनता सिद्ध होने से पाश्चात्यों एवं बुल्के का मत सुतरां खण्डित हो जाता है। जब महाभारत पाँच हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है तब महाभारत में वर्णित रामायण की अत्यधिक प्राचीनता सुतरां सिद्ध होती है। पुराणवचनों के अनुसार भी २४वें त्रेता में वसिष्ठसहित राम का प्रादुर्भाव हुआ था। उसी समय महर्षि वाल्मीकि का भी आविर्भाव हुआ था। इस दृष्टि से २४वें त्रेता में द्वापर की सन्धि में अर्थात् इस वर्ष से एक करोड़ सतहत्तर लाख उनचास हजार तिहत्तर १७७४९०७३ वर्ष पूर्व श्रीराम के शासनकाल में रामायण का निर्माण हुआ था। इस तरह रामायण संसार का सर्वाधिक प्राचीन आर्ष इतिहासग्रन्थ है ।