भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८९८ रामायणमीमांसा द्वाविंश अब्रवीत् भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महर्षिः । जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥ शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके । स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥” अर्थात् महर्षि व्यास तीन अग्नियों के समान तेजस्वी कुरुवंशीय धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर को उत्पन्न करके तपस्या के लिए वन में अपने आश्रम में चले गये। जब तीनों ही पुत्र परमगति को प्राप्त हो गये तब महर्षि व्यास ने मनुष्य-लोक में महाभारत का निरूपण किया। हजारों ब्राह्मणों के साथ जनमेजय के प्रश्न करने पर अपने शिष्य वैशम्पायन को आज्ञा दी कि तुम इन लोगों को महाभारत सुनाओ । वैशम्पायन ने यज्ञ के सदस्यों के साथ आसीन होकर यज्ञ के बीच बीच में बारम्बार उनसे प्रेरित होकर महाभारत सुनाया। इससे स्पष्ट है कि जनमेजय के सर्पसत्रयज्ञ से पूर्व और पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर के देहावसान के पश्चात् महाभारतसंहिता की रचना हुई। पाण्डु युद्ध के पहले ही देह त्याग चुके थे । महाभारतयुद्ध के २०वें वर्ष में धृतराष्ट्र को परम पद प्राप्त हुआ था । युद्ध के पश्चात् १५ वर्ष तक धृतराष्ट्र युधिष्ठिर के साथ रहे थे । सोलहवें वर्ष भीम के वाग्बाण से पीड़ित हो विरक्त होकर विदुर के साथ वन चले गये । “ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः । राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीडितः ॥” (आश्रमवासिक पर्व अध्याय ६।१५) वहाँ धर्माचरण करते हुए एक वर्ष बीतने पर देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर से कहा था कि धृतराष्ट्र के जीवन के अभी तीन वर्ष शेष हैं— “तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम् । वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोऽस्य परमायुषः ॥” ( आश्रमवासिक पर्व २।३२ ) मैंने इन्द्र के मुख से सुना है कि धृतराष्ट्र की परमायु अभी ३ वर्ष शेष है। तथा च भारत युद्ध के २० वर्ष बीतने पर महाभारत का निर्माण हुआ । भारत युद्ध के ३६ वर्ष बीतने पर परीक्षित् का राज्याभिषेक हुआ । परीक्षित् ने ६० वर्ष तक राज्य किया । “प्रजा इमास्तव पिता षष्टिवर्षाण्यपालयत् । ततो दिष्टान्तमापन्नः सर्वेषां दुःखमावहन् ॥” ( आदिपर्व ४९।७ ) मन्त्रियों ने जनमेजय से कहा था कि तुम्हारे पिता ६० वर्ष तक पृथिवी का पालन करके हम सबकी दुःखजनक मृत्यु को प्राप्त हुए । सौप्तिक पर्व में भी यही कहा है— “विदित्वा परमास्त्राणि क्षत्रधर्मव्रते रतः । षष्टिवर्षाणि धर्मात्मा वसुधां पालयिष्यति ॥” ( सौप्तिक पर्व १६।१४ ) महाभारत-युद्ध से ९६ वर्ष पर बाल्यदशा में ही जनमेजय का राज्याभिषेक हुआ । वयस्क होने पर विवाह हुआ और कुछ ही दिनों बाद उत्तङ्क की प्रेरणा से जनमेजय ने सर्पसत्रयज्ञ आरम्भ किया । उसी में वैशम्पायन ने महाभारत सुनाया । उसी महाभारत को महर्षि व्यास ने जयनामक महाकाव्य के रूप में विविध उपाख्यानों के सहित लिखा । वही भारतीय युद्ध का विशद इतिहास है। यह युधिष्ठिर के विजय के उपलक्ष्य में लिखा गया था। इसीलिए युद्ध के २० वर्ष बाद और युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण के १६ वर्ष पहले युधिष्ठिर के समय में ही लिखा गया था। यद्यपि ऐसे काव्य विजय के बाद शीघ्र ही लिखे जाते हैं तथापि धृतराष्ट्र के सामने उसका लिखा जाना उचित नहीं था, क्योंकि युधिष्ठिर बड़ी तत्परता से धृतराष्ट्र को प्रसन्न और तुष्ट रखने का प्रयत्न करते रहते थे ।