भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 974

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८९७ पाण्डवों का उल्लेख पुराणों, ज्योतिषशास्त्रों “शासति पृथिवीं युधिष्ठिरे नृपतौ ।” बृहत्संहिता ज्योतिषशास्त्र तथा पाणिनिसूत्र ‘वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्’ ४।३।९८ में उल्लेख आता है । मनु के आख्यानानीतिहासांश्च ३।२३२ की टीका मेधातिथि एवं कुल्लूक ने ‘इतिहासा भारतादयः’ कहा है । भारतीय इतिहास का निम्नोक्त लक्षण है— “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् । पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥” गड़े मुर्दों के उखाड़ने जैसी पुरानी बातों को बार-बार दोहराना ही इतिहास नहीं है, किन्तु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेश के साथ वृत्तान्तों का वर्णन ही इतिहास है । भले ही कहीं कहीं महाभारत को पुराण कहा है— “द्वैपायनेन यत्प्रोक्तं पुराणं परमर्षिणा । इतिहासमिमं विप्राः पुराणं परिचक्षते ॥” ( १।२।१७ ) तथापि महाभारत में इसे इतिहास और महाभारतकाव्य ही कहा गया है— “कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम् ।” ( १।१।९१ ) “तपसा ब्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम् । इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुतः ॥” ( म० भा० आ० प० १।५४ ) कविता के भेद से कर्ता के भेद की कल्पना भी निःसार है, क्योंकि स्वयं व्यास ने ही स्वीकार किया है कि आठ हजार आठ सौ श्लोक बड़े ही कठिन हैं उन्हें कोई नहीं जान सकता है और उनका निर्माण गणेश भगवान् की लेखनी के किञ्चित् अवरोध के लिए ही किया गया है — “ग्रन्थग्रन्थिं तदा चक्रे मुनिर्गूढं कुतूहलात् । यस्मिन् प्रतिज्ञया प्राह मुनिर्द्वैपायनस्त्विदम् ॥ अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च । अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा ॥” ( म० भा० १।१।८०, ८१ ) और यह अन्य कवियों में भी देखा ही जाता है । विषयभेद से, परिस्थितिभेद से एवं मानस के उल्लास और अनुल्लास आदि के भेद से भी काव्यभेद होता ही है । इसी तरह समास-व्यास-भेद से पुनरुक्तियों का भी समाधान किया जा सकता है । “विस्तीर्यैतन्महज्ज्ञानमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥” ( म० भा० १।१।५१ ) महाभारत का काल-निर्णय महाभारत में ही महाभारत के निर्माण का काल निर्दिष्ट है— “त्रीनग्नीनिव कौरव्यान् जनयामास वीर्यवान् । उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डुं विदुरमेव च ॥ जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति । तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ॥ ११३