भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 973

८९६ रामायणमीमांसा द्वार्बिंश “जयो नामेतिहासोऽयम्” यह भी लक्षश्लोकात्मक महाभारत के लिए ही कहा गया है। विशेषरूप से उद्योगपर्व के अध्याय १३३ से १३६ तक कुन्ती द्वारा कथित विदुलोपाख्यान नाम से प्रसिद्ध इतिहास जय नाम से कहा गया है। “जयनामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा ।” (म० भा० ५।१३६।१८) इसी जयोपाख्यानरूप बीज का महान् वृक्षरूप महाभारत को मानकर उसका भी जयनाम लें तो उचित ही है। इतना ही क्यों, शब्दकल्पद्रुम में उद्धृत निम्नोक्त वचन के आधार पर अठारह पुराण, रामायण, कृष्ण- द्वैपायनोक्त पञ्चमवेद महाभारत, शाश्वत विष्णुधर्म एवं शिवधर्म इन सबका जय नाम है। इस तरह महाभारत का ही जय नाम है उसी का भारत तथा महाभारत नाम है— “अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा । काष्णं वेदं पञ्चमं च यन्महाभारतं विदुः ॥ तथैव विष्णुधर्माश्च शिवधर्माश्च शाश्वताः । जयेति नाम तेषाञ्च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥” इसी दृष्टि से आरम्भ में और अनेकों बार महाभारत में— “नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीञ्चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ कहा गया है। अर्थात् नारायण परमेश्वर कृष्ण और नर अर्जुन तथा नरोत्तम प्रत्यक्चैतन्याभिन्न शुद्ध ब्रह्म तथा ब्रह्मविद्यारूपिणी सरस्वती को नमस्कार करके ही जय का वर्णन करना चाहिये । पूर्वोक्त रीति से पुराणादि सभी का नाम जय है। तथापि विशेषरूप से १८ संख्यावाले महाभारत ग्रन्थ का जय यह संकेत है। वाल्मीकिरामायण के टीकाकार सर्ग के श्लोकों की संख्या अक्षरों के संकेत से करते हैं। यथा— “कादयोऽङ्गाष्टादयोऽङ्गा पाद्या पञ्च प्रकीर्तिताः । यादयोऽष्टौ ज्ञनो पूर्णे विजेयस्वरशास्त्रके ॥” क से झ तक के अक्षर क्रमशः एक से नौ तक के वाचक हैं। ट से ध तक के अक्षर भी एक से नौ तक के वाचक हैं। प से म तक एक से पाँच तक के वाचक हैं। य से ह तक के अक्षर एक से आठ तक के वाचक हैं। ज्ञ और न ये दो अक्षर पूर्ण संख्या के वाचक हैं । जैमिनिसूत्र तथा आर्षसिद्धान्त भी ऐसी संख्या का वर्णन करते हैं । उपर्युक्त रीति से ज ८ का वाचक है और य एक का वाचक है । ‘अङ्कानां वामतो गतिः’ के अनुसार जय शब्द १८ संख्या का बोधक है । महाभारत १८ पर्व का है, महाभारतयुद्ध भी अठारह दिन हुआ । दोनों दलों में सेना १८ अक्षौहिणी थी । गीता १८ अध्याय की है । इस तरह ग्रन्थ का नाम जय हुआ । कुछ लोग कहते हैं, भारत के पात्र युधिष्ठिर, अर्जुन आदि ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं, किन्तु धर्म, अधर्म, देव, असुर के तुल्य ही कौरव तथा पाण्डव कल्पनामात्र हैं, पर यह ठीक नहीं, क्योंकि महाभारत के पात्र यदि कल्पित होते, ऐतिहासिक न होते तो दूसरे ग्रन्थ अपने ग्रन्थों में उन्हें स्थान न देते, परन्तु महाभारत के युधिष्ठिर आदि

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