भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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९०४ रामायणमीमांसा परिशिष्ट "रक्ताम्भोधिस्यपोतोल्लसदरुणसरोजारूढा कराब्जैः पाशं कोदण्डमिक्षूद्भवमथगुणमप्यङ्कुशं पञ्चबाणान्॥ बिभ्राणासृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढ्या देवी बालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः॥ इस मन्त्र का उच्चारण करे। इष्टमन्त्र से पाँच प्राणायाम कर के— "अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः। ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया॥" इस मन्त्र का उच्चारण कर एक साथ वामपाद की एड़ी से भूतल का तीन बार ताड़न, तीन बार कर का आस्फोटन और क्रूर दृष्ट्यवलोकन एवं तालत्रय से भौम, आन्तरिक्ष तथा दिव्य सभी विघ्नों का उत्सारण करना चाहिए। पश्चात् आत्मा में देवत्व-भावना करते हुए देह में न्यास आदि करने चाहिये। अथ मातृकान्यासः— अस्य मातृकान्यासमहामन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः मातृका सरस्वती देवता हलो बीजानि स्वराः शक्तयः बिन्दवः कीलकानि न्यासे विनियोगः। ब्रह्मणे ऋषये नमः शिरसि। गायत्रीच्छन्दसे नमो मुखे। मातृकासरस्वतीदेवतायै नमो हृदये। हल्भ्यो बीजेभ्यो नमो गुह्ये। स्वरेभ्यः शक्तिभ्यो नमः पादयोः। बिन्दुभ्यः कीलकेभ्यो नमो नाभौ। विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे। करसम्पुट में (अर्थात् अञ्जलि बाँधकर) सभी मातृकाओं की भावना करके तीन बार अपने सर्वाङ्ग में व्यापक न्यास करना चाहिये। हृदयादिन्यास और करादिन्यास में उपनीत त्रैवर्णिक प्रणव का प्रयोग कर सकते हैं। अन्य लोगों को ऐं ह्रीं श्रीं अथवा रां बीज का प्रयोग करना चाहिये। रां अं कं खं गं घं ङं आं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। रां इं चं छं जं झं ञं ईं तर्जनीभ्यां नमः। रां उं टं ठं डं ढं णं ऊं मध्यमाभ्यां नमः। रां एं तं थं दं धं नं ऐं अनामिकाभ्यां नमः। रां ओं पं फं बं भं मं औं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। रां अं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं अः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। रां अं कं खं गं घं ङं आं हृदयाय नमः। रां इं चं छं जं झं ञं ईं शिरसे स्वाहा। रां उं टं ठं डं ढं णं ऊं शिखायै वषट्। रां तं थं दं धं नं ऐं कवचाय हुम्। रां ओं पं फं बं भं मं औं नेत्रत्राय वौषट्। रां अं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं अः अस्त्राय फट्। ये दोनों करादिन्यास और हृदयादिन्यास करने चाहिये। इसी प्रकार "पञ्चाशद्वर्णभेदैर्विहितवदनदोःपाद्युक्कुक्षिवक्षो- देशां भास्वत्कपर्दाकलितशशिकलामिन्दुकुन्दावदाताम्। अक्षस्रक्कुम्भचिन्तालिखितवरकरां त्रीक्षणामब्जसंस्था- मच्छायकल्पामतुच्छस्तनजघनभरां भारतीं तां नमामः॥" इस मन्त्र से मातृका सरस्वती का ध्यान करके निम्नोक्त रीति से एक-एक वर्ण का अङ्गों में न्यास करना चाहिये।