भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥ अस्याः सङ्कल्पमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते ॥६३॥” प्रत्येक प्राणी के श्वास लेने पर स एवं श्वास निकालने पर ह का स्वाभाविक रूप से उच्चारण होता है। हंकार उच्चारण करता हुआ श्वास बाहर जाता है एवं सकार उच्चारण करता हुआ भीतर वापस लौटता है। इसी प्रकार रा एवं म इन दोनों अक्षरों की भावना की जा सकती है। राममन्त्र के समान ही हंसमन्त्र परमेश्वर का मन्त्र है। अद्वैतसिद्धान्त के अनुसार हंसः सोहं इस प्रकार अनुलोम विलोम में मैं (जीव) सः वह (परमात्मा) है और वह (परमात्मा) मैं त्वंपदलक्ष्यार्थ साक्षी रूप हूँ इत्यादि अर्थ होता है। स्वभाव से इस मन्त्र का अहोरात्र में २१ हजार ६ सौ जप हो जाता है। प्रातः नियमित समय में पूर्वोक्त विधि से भावनापूर्वक तत्तत् चक्रस्थ देवताओं को समर्पणमात्र से महान् फल होता है। उसका संक्षिप्त सङ्कल्प निम्नोक्त है—“षट्शताधिकैकविंशतिसाहस्रिकां निःश्वासोच्छ्वासरूपां अजपागायत्रीं मूलाधारादिब्रह्मरन्ध्रान्तसप्तचक्रनिवासिनीभ्यो देवताभ्यो निवेदयामि। पृथक् पृथक् सङ्कल्प निम्नोक्त है—मूलाधारे रक्तवर्णे वं शं षं सं चतुरक्षरे चतुर्दलपद्मे ऐरावतवाहनस्थिते चतुष्कोणयन्त्रे लं बीजे स्थिताय कुङ्कुमवर्णाय सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये षट्शतपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। स्वाधिष्ठाने सिन्दूरवर्णे बं भं मं यं रं लं षडक्षरे षड्दलपद्मे मकरवाहनस्थिते अर्धचन्द्रयन्त्रे वं बीजे स्थिताय महासरस्वतीसहिताय ब्रह्मणे षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। मणिपूरे नीलवर्णे डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं दशाक्षरे दशदलपद्मे मेषवाहनस्थिते त्रिकोणयन्त्रे रं बीजे स्थिताय महालक्ष्मीसहिताय विष्णवे षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। अनाहतचक्रे अरुणवर्णे कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं द्वादशाक्षरे द्वादशदलपद्मे हरिणवाहनस्थिते षट्कोणयन्त्रे यं बीजे स्थिताय पार्वतीसहिताय परमशिवाय षट्सहस्रपरिमितमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। विशुद्धौ धूम्रवर्णे अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः षोडशाक्षरे षोडशदलपद्मे हस्ति- वाहनस्थिते शून्ययन्त्रे हं बीजे स्थिताय प्राणशक्तिसहिताय जीवाय सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं निवेदयामि। आज्ञाचक्रे श्वेतवर्णे हं क्षं द्व्यक्षरे द्विदलयद्मे नादवाहनस्थिते ॐकारान्तर्गते लिङ्गमन्त्रे स्थिताय ज्ञानशक्ति- सहिताय गुरवे सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। ब्रह्मरन्ध्रे चित्रवर्णे सहस्रदलपद्मे पञ्चाशद्भि,मातृकाभिर्विंशतिकृत्वोऽ- धिष्ठिते बिन्दुवाहनस्थिते विसर्गयन्त्रे पूर्णचन्द्रमण्डले आनन्दमहासमुद्रमध्ये चिन्मयमणिद्वीपे चित्सारचिन्तामणिमन्दिरे कल्पवृक्षाधस्तले अव्यक्तब्रह्ममर्हासिंहासने स्थिताय चिच्छक्तिसहिताय परमात्मने सहस्रमेकमजपागायत्रीजपं समर्पयामि। जपप्रकारो यथा—अस्य श्रीरामषडक्षरमहामन्त्रराजस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः श्रीरामचन्द्रपरमात्मा देवता रां बीजं नमः शक्ती रामायेति कीलकम् चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपे विनियोगः। अथ ऋष्यादिन्यासः—ब्रह्मणे ऋषये नमः शिरसि। गायत्रीछन्दसे नमो मुखे। रामचन्द्रपरमात्मदेवतायै नमो हृदये। रां बीजाय नमो गुह्ये। नमः शक्तये नमः पादयोः। रामायेति कीलकाय नमो नाभौ। विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे। कुछ क्षण हंसः सोहं इस प्रकार श्वासोच्छ्वास में भावना करनी चाहिये। फिर मन्त्रजप करना चाहिये। अथ करन्यासः—रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। रीं तर्जनीभ्यां नमः। रूं मध्यमाभ्यां नमः। रैं अनामिकाभ्यां नमः। रौ कनिष्ठिकाभ्यां नमः। रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।