भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 981, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 981

संख्या १ रामोपासना ९७७ अथ हृदयादिषडङ्गन्यासः—रां हृदयाय नमः । रीं शिरसे स्वाहा । रूं शिखायै वषट् । रैं कवचाय हुम् । रौं नेत्राभ्यां वौषट् । रः अस्त्राय फट् । उपनीत द्विजाति को ही स्वाहा का उच्चारण करना चाहिये । अन्य लोगों को नमः का उच्चारण करना चाहिये । अथ अङ्गन्यासः—रां नमो ब्रह्मरन्ध्रे । रां नमो भ्रुवोर्मध्ये । मां नमो हृदि । यं नमो नाभौ । नं नमो लिङ्गे (उदकस्पर्शः) । मं नमः पादयोः । अथ ध्यानम्— “कालाम्भोधरकान्तिकान्तमनिशं वीरासनाध्यासितं मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपरं हस्ताम्बुजं जानुनि । सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां विद्युन्निभां राघवं पश्यन्तीं मुकुटाङ्गदादिविविधाकल्पोज्ज्वलाङ्गं भजे ॥” आनन्दसमुद्र के मध्य में चिन्मयमणिद्वीप में चित्सारचिन्तामणिमन्दिर में कल्पवृक्ष के मूल में अव्याकृत ब्रह्ममय दिव्य सिंहासन पर श्रीरामचन्द्र प्रभु विराजमान हैं। बायें करकमल को घुटने पर रखकर दाहिने से ज्ञानमयी मुद्रा धारण किये हुए अविरत वीरासन से स्थित नीलनीरद नीलकमल नीलमणि के तुल्य मञ्जुल कान्तिवाले, मुकुट, अङ्गद आदि विविध भूषणालङ्कारों से अलंकृत, दिव्य अङ्गवाले श्रीराम और उनके पार्श्व में विराजमान निर्निमेष नयनों से श्रीराम की ओर निहारती हुई करकमलधारिणी विद्युद्वर्णा भगवती सीता का हम भजन करते हैं। इस प्रकार ध्यान करके सर्वतोभद्रमण्डल में श्रीराम की अर्चा की जाती है । सर्वप्रथम सर्वतोभद्रमण्डल में मं मण्डूकादि परतत्त्वान्त पीठदेवताभ्यो नमः इस मन्त्र से पीठदेवताओं की गन्धपुष्पसमर्पण द्वारा पूजा करनी चाहिए । सर्वतोभद्रपीठ में पूर्वादि प्रदक्षिणक्रम से विमला आदि आठ शक्तियों का और मध्य में एक शक्ति का ध्यान करते हुए नमः मन्त्र से पूजन करना चाहिये । पीठे पूर्वादिक्रमेण—(१) विमलायै नमः (२) उत्कर्षिण्यै नमः (३) ज्ञानायै नमः (४) क्रियायै नमः (५) योगायै नमः (६) प्रह्वयै नमः (७) सत्यायै नमः (८) ईशानायै नमः मध्ये (९) अनुग्रहायै नमः, नमो भगवते रामाय सर्वभूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगपद्मपीठात्मने नमः, इति पुष्पासनं दत्त्वा (इस मन्त्र से पुष्प का आसन समर्पण कर ) पीठमध्ये स्वेष्टदेवं संस्थाप्य (पीठ के मध्य में भगवान् श्रीराम की मूर्ति या यन्त्र की स्थापना करके प्राणप्रतिष्ठा करके ध्यानपूर्वक पुष्पान्त पूजा करके ) प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा पुष्पैर्ध्यात्वा पुष्पान्तैरुपचारैः सम्पूज्य, देवाज्ञां गृहीत्वा आवरणपूजां कुर्यात् । इष्टदेव की आज्ञा लेकर आवरणपूजा करनी चाहिये । अञ्जलि में पुष्प लेकर— “संविन्मयः परो देवः परामृतरसप्रिय । अनुज्ञां देहि मे राम परिवारार्चनाय ते ॥” इस मन्त्र से पुष्पाञ्जलि अर्पण करके आवरणपूजा करनी चाहिये । (१) देववामपार्श्वे सीतायै नमः सीताश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (२) अग्निकोणे शां शार्ङ्गाय नमः शार्ङ्गश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः (३) दक्षिणे शं शराय नमः शरश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । (४) वामे चां चापाय नमः चापश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलि दत्त्वा “अभीष्टसिद्धि मे देहि शरणागतवत्सल । भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥” पुनः पुष्पाञ्जलि दत्त्वा प्रथमावरणदेवताः पूजितास्तर्पिताः सन्तु नमः ।”

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