भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 984

९१० रामायणमीमांसा परिशिष्ट तस्योपरिन्यसेद्दिव्यं पीठं रत्नमयोज्ज्वलम् । तन्मध्ये राघवं ध्यायेत् सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥” नीलकमल के तुल्य विशाल नेत्र और विशाल वक्षःस्थलवाले उदीयमान भास्कर के तुल्य कुण्डलों से शोभित सुन्दर वस्त्र एवं सुन्दर किरीट से युक्त, शुभ्रकपोल तथा शुचिस्मित ज्ञानमुद्रायुक्त दो भुजाओं से शोभित कम्बुग्रीव सुन्दर स्निग्ध सुचिकृष्ण श्यामल अलकावलियों से युक्त श्रीराम का ध्यान करना चाहिये । नाना रत्नों से युक्त दिव्यहारों से भूषित अव्यय विद्युत्पुञ्ज के समान देदीप्यमान पीतवस्त्र और उत्तरीयवस्त्र धारण किये हुए सन्तानतरूमूल में वे दिव्य सिंहासन पर स्थित हैं। दिव्य गन्ध, अङ्गविलेपन तथा वनमाला से सुशोभित श्रीराम के वामपार्श्व में तप्तस्वर्ण- वर्ण्य लीलापङ्कजधारिणी चारुहासिनी शुभानना भूषणों से अलंकृत स्निग्ध दृष्टि से श्रीराम को निहारती हुई श्रीसीता विराजमान हैं। छत्र-चामर हाथ में लेकर श्रीलक्ष्मण उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। हनुमान्, सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गद आदि वानरों से सेवित, सनन्दनादि तथा अन्य योगिवृन्दों से संस्तुत, सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ तथा योगसिद्धिप्रद श्रीराम का सदैव हृदय में ध्यान करना चाहिये । १. आवाहन— “आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं विभुम् । कौशल्यातनयं विष्णुं श्रीरामं प्रकृतेः परम् ॥” हम उन विश्व के स्वामी जानकीवल्लभ विभु कौशल्यानन्दवर्धन प्रकृति से पर विष्णुस्वरूप श्रीराम का आवाहन करते हैं । उक्त मन्त्र से आवाहनीमुद्रा में श्रीराम का आवाहन करना चाहिये । २. आसनम्— “राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र महीपते । रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥” हे राजाधिराज, हे राजेन्द्र, हे रामचन्द्र, हे महीपते, आपके लिए रत्नमय दिव्य सिंहासन अर्पित करता हूँ, इसे स्वीकार कीजिये । ३. सन्निधापन— “श्रीरामागच्छ भगवन् रघुवीर नृपोत्तम । जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव सर्वदा ॥ रामचन्द्र महेश्वास रावणान्तक राघव । यावत्पूजां समाप्येऽहं तावत् सन्निहितो भव ॥” हे श्रीराम, हे भगवन्, हे रघुवीर नृपोत्तम, हे राजेन्द्र, जानकी के साथ आइये और हे महेश्वास सुस्थिर होकर, हे रामचन्द्र, हे रावणान्तक जब तक मैं पूजा करूँ तब तक आप सन्निहित रहिये । उक्त मन्त्र से सन्निधापनी मुद्रा से सन्निधापन करना चाहिये । ४. सम्मुखीकरण— “रघुनन्दन राजर्षे राम राजीवलोचन । रघुनन्दन मे देव श्रीरामाभिमुखो भव ॥” हे रघुनन्दन, हे राजर्षे, हे राजीवलोचन, हे देवेश पूजा के लिए मेरे अभिमुख हों उक्त मन्त्र से सम्मुखी- करण करना चाहिये । ५. प्रार्थना— “शरणं मे जगन्नाथः शरणं भक्तवत्सलः । वरदो भव मे राजन् शरणं मे रघूत्तम ॥” जगन्नाथ भक्तवत्सल श्रीराम ही मेरे शरण हैं, आश्रय हैं । राजन्, श्रीराम आप ही मेरे लिए वरद हैं और आप ही मेरे रक्षक हैं उक्त मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिये ।