भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८६८ रामायणमीमांसा द्वाविंश

एष वाख्यानसमयः ७।७ पर दुर्गाचार्य कहते हैं । भारते आख्यानसमयः इसके आगे के आख्यानों का निर्देश करते हैं । पृथिवी स्त्रीरूप में ब्रह्मा से याञ्चा करती है ( म० भा० १।६४ ) । अग्नि ने ब्राह्मणरूप में वासुदेव एवं अर्जुन से खाण्डव वन की याञ्चा की थी ( म० भा० १।२२४-२२५ ) । “व्यासः कणाद ऋषभः कपिलः शाक्यनायकः । निर्वृते मम पश्चात्तु भविष्यन्त्येवमादयः ॥ मयि निर्वृते वर्षशते व्यासो वै भारतस्तथा । पाण्डवाः कौरवा राम पश्चान्मोर्यो भविष्यति ॥ मौर्या नन्दाश्च गुप्ताश्च ततो म्लेच्छा नृपाधमाः । म्लेच्छान्ते शस्त्रसंक्षोभः शस्त्रान्ते च कलियुगः ॥” लङ्कावतारसूत्र का चीनी अनुवाद सन् ५७ ई० में हुआ है । उक्त श्लोक लङ्कावतारसूत्र के हैं । इसमें व्यास और भारत का नाम है । वररुचिकृत वाररुच निरुक्तसमुच्चय मिलता है । उसमें “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” ‘इति व्यासवचनम्’ कहा गया है । इससे महाभारत व्यासकृत सिद्ध होता है । वररुचि विक्रमादित्य का पुरोहित था । अतः विक्रम १ शती का था । पैशाची बृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य के अनुसार उसके समय में महा- भारत विद्यमान था । अतएव उसके अनुवादभूत कथासरित्सागर में रुरु मुनि की कथा १४।७६ आदिपर्व अध्याय ८ में मिलती है । सुन्दोपसुन्द कथा ५।१३५ आदि २१२ में मिलती है । कुन्ती दुर्वासा १६।३६ आ० प० ११३।३२ में, पाण्डुमुनिवध-कथा २१-२० आदिपर्व १०८ में तथा शकुन्तला ३२।१०८ आदिपर्व ६२ में मिलती है । अश्वघोष के बुद्धचरित १।४७ में नष्ट वेद का सारस्वत द्वारा उपदेश का वर्णन है । वह महाभारत शल्यपर्व अध्याय ५१ में ही है । आद्य कालिदास ही रघुवंश, कुमारसम्भव, अभिज्ञानशाकुन्तल आदि के प्रणेता हैं । ‘यतो हि रसविशेषदीक्षागुरोः श्रीविक्रमादित्यसाहसाङ्कस्याभिरूपपण्डितभूयिष्ठेयं परिषद्’ इस अभिज्ञानशाकुन्तल के वचन से विक्रमादित्य के स्पष्ट सङ्केत तथा विक्रमोर्वशीयम् एवं मालविकाग्निमित्रम् आदि ग्रन्थों से विक्रमा- दित्य, अग्निमित्र, शूद्रक आदि से उनका विशेष सम्बन्ध निश्चित होता है । कालिदास विक्रमादित्य की सभा के रत्न थे यह प्रसिद्धि ठीक ही है । मृच्छकटिक में शूद्रक अपने को द्विज मुख्यतम कहते हैं । वे अपने को कवि, महासत्त्व, ऋग्वेद, सामवेद, गणितकला, हस्तिशिक्षा आदि में निष्णात, शिवजी के प्रसाद से सर्वज्ञानलब्धा, अश्वमेधयाजी, साग्रशतसंवत्सरजीवी, प्रमादशून्य, वेदविदां ककुद्, तपोधन तथा समरव्यसनी भी कहते हैं— “ऋग्वेदं सामवेदं गणितमथ कलां वैशिकीं हस्तिशिक्षां ज्ञात्वा शर्वप्रसादाद् व्यपगततिमिरे चक्षुषी चोपलभ्य । राजानं वीक्ष्य पुत्रं परमसमुदयेनाश्वमेधेन चेष्ट्वा लब्ध्वा चायुः शताबदं दशदिनसहितं शूद्रकोऽग्निं प्रविष्टः ॥” ( मृच्छकटिक १।४ ) उपर्युक्त श्लोकों में यह भी उल्लेख है कि शूद्रक अन्त में अग्नि में प्रविष्ट हो गया था । यहाँ यह शङ्का होती है कि स्वयं शूद्रक अपने भावी अग्निप्रवेश की 'अग्निं प्रविष्टः' अतीतरूप से कैसे लिख सकता है । अतः ये श्लोक शूद्रकरचित न होकर किसी अन्य के ही होने चाहिये । परन्तु यह शङ्का निरर्थक ही है, क्योंकि शूद्रक शिबजी