भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 944, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 944

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६७ जयादित्य से प्राचीन भट्टपाद कुमारिल व्यासजी एवं उनके श्लोक का स्मरण करते हैं— “प्रसिद्धो हि तथा चाह पाराशर्योऽत्र वस्तुनि । इदं पुण्यमिदं पापम्…………॥ (श्लोकवार्तिक) धर्मकीर्ति भी भारत की चर्चा करता है— “भारतादिष्वपि इदानीन्तनानामशक्तावपि कस्यचित् शक्तिसिद्धेः । (प्र० वार्तिक ४४७, ४४८) संवत् ६२७ से पूर्ववर्ती वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने वाक्यपदीय काण्ड १।१४२ में अश्वमेध पर्व का श्लोक उद्धृत किया है—“गौरिव प्रक्षरत्येका”। वासवदत्ता में उद्धृत न्यायवार्तिककार उद्योतकरसूत्र ४।१।२१ वार्तिक में महाभारत वनपर्व के ३०।२८ वां श्लोक उद्धृत करते हैं— “अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ॥” योगभाष्य में योगभाष्यकार द्वारा १।४७ और २।४२ में महाभारत शान्तिपर्व १७।२०, १५१।११ तथा महाभारत शान्तिपर्व १७४।४६, २७७।५१, ७७।७ उद्धृत है । “प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् । भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥” महाराज सर्वनाथ के शिलालेख संवत् १९१-२१४ तक के मिल चुके हैं । पाश्चात्य-पद्धति के लोग इस संवत् को कलियुगी संवत् मानते हैं । सर्वनाथ के ताम्रलेख में भारत के १ लाख श्लोक माने गये हैं— उक्तं च महाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां परमर्षिणा पराशरसुतेन व्यासेन । ( गुप्तशिलालेख भाग ३ पृ० १३४ ) शाबरभाष्य के लेखक शबरस्वामी इससे भी प्राचीन हैं । इन्होंने भी ८।१२ में महाभारत आदिपर्व १।४९ का श्लोक उद्धृत किया है— “विस्तीर्यं हि महज्जालमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥” इस उद्धरण के अनुसार महाभारत का अनुक्रमणीपर्व भी व्यासकृत है और महाभारत लक्षश्लोकात्मक है, यह सिद्ध होता है । कामसूत्रकार वात्स्यायन ने १।४ में इस श्लोक को उद्धृत किया— “धर्मकामार्थयुक्तानि शास्त्राणि विविधानि च । लोकयात्राविधानं च सर्वं तद् दृष्टवानृषिः ॥” आचार्य गर्ग स्कन्दस्वामी के पूर्ववर्ती हैं । उन्होंने निरुक्तभाष्य ४।१ में आदिपर्व का यह वचन उद्धृत किया है— “विस्तीर्य हि महज्ज्ञानमृषिः संक्षेपतोऽब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥”