रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६६ रामायणमीमांसा द्वाविंश जिसने मर्त्यरूपी यन्त्र में महाभारतविद्या से चैतन्य का सञ्चार किया था उन व्यास मुनि को नमस्कार है । दण्डिपूर्वभावी बाणभट्ट अपनी कृति कादम्बरी तथा हर्षचरित में अनेक बार महाभारत और व्यास का उल्लेख करते हैं । यथा— पार्थरथपताकेव वानराक्रान्ता, विराटनगरीव कीचकशतावृता । (पृ० ६०) भीष्ममिव शिखण्डिशत्रुम्, पराशरमिव योजनगन्धानुसारिणम् । (पृ० १०७,१०८) महाभारते शकुनिवधः । (पृ०१४३) महाभारतपुराणरामायणानुरागिणा (पृ० १७९) आस्तीकतनुरिवानन्दितभुजङ्गलोका । (पृ० १८२) महाभारते दुःशासनापराधाकर्णनम् । (पृ० १९९, कादम्बरीपूर्वभागे) एकाकी तपस्वी वनमृगैः सह संवर्धितः सहजब्राह्मणमार्दवसुकुमारमनाः कृतनिश्चयः समग्र- मुद्यतमेकविंशतिकृत्वः कृत्तवंशमुत्खातवान् राजन्यकं रामः । (उच्छ्वास षष्ठ, पृ० २९१) हिडिम्बामुखचुम्बनास्वादितमिव रिपुरुधिरामृतमपायि पवनात्मजेन । (उच्छ्वास षष्ठ, पृ० २९२) जामदग्न्येन क्षत्रियक्षतमहाह्रदेषु अस्नायि । (हर्षचरित उच्छ्वास षष्ठ, २९२) “नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविवेधसे । चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥ किं कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी । कथेव भारती यस्य न व्याप्नोति जगत्त्रयम् ॥” (श्रीहर्षचरिते उपोद्घाते ४ और १०) उपर्युक्त वचनों में वानराक्रान्ता पार्थरथपताका को तथा कीचकों से आवृत विराटनगरी को उपमान के रूप में देखा है । शिखण्डिशत्रु भीष्म तथा योजनगन्धानुसारी पराशर को भी उपमान बनाया गया है । महाभारत के शकुनिवध, नागसमुदाय को आनन्दित करनेवाले आस्तीक मुनि, दुःशासन के अपराध, जामदग्न्य के इक्कीस बार क्षत्रोन्मूलन, हिडिम्बा, भीम तथा दुःशासन के रक्तपान, जामदग्न्य का क्षत्रियरक्तमहाह्रद में स्नान आदि का उल्लेख है । यह सब कथावस्तु महाभारत की ही है । श्लोकों में सर्वविद् व्यास एवं उनकी जगत्त्रय-व्यापिनी भारतीय कथा की चर्चा है । काशिकाकार जयादित्य भी बाणभट्ट के समकालिक हैं— “द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् ।” (पा० सू० ४।१।१०३) में “नैवात्र महाभारतद्रोणो गृह्यते” इस वाक्य द्वारा महाभारत की चर्चा करते हैं । मेघदूत में कालिदास ने रामायण और महाभारत दोनों की चर्चा की है । रामायण— “जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु । इत्याख्याते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखी सा ।” महाभारत— “क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुनं कौरवं तद् भजेथाः ।”