रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६५ हेमाद्रि-दानखण्ड तृतीय प्रकरण में उद्धृत महाभारतवचन । अर्थात् सोम, भौम तथा गुरुवार को अमावस्या होने पर पुष्कर पर्व होता है और वह सौ सूर्य पर्वों से भी अधिक पुण्य काल है । इसी तरह अयन ( कर्क और मकर ), विषुव ( मेष और तुला ), षडशीतिमुख ( मिथुन, कन्या, धनु और मीन ) तथा पर्व अर्थात् विष्णुपद ( वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ ) नामों से संक्रान्तियों का वर्णन महाभारत में विद्यमान है— "ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं शतगुणमृत्ययनादिषु ध्रुवम् । भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहौविषुवति चाक्षयमश्नुते फलम् ।।" (म०भा० ३।२००।२६) “अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखे ध्रुवम् । चन्द्रसूर्योपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते ।।" (म० भा० ३।२००।२५) इन वचनों में अयन, विषुव, षडशीतिमुख आदि उक्त राशियों के संकेत हैं। अतः वेदादि शास्त्रों के समान ही यह गणना भी अनादि ही है। वृद्धवसिष्ठ ने संक्रान्तियों के उक्त नाम बतलाये हैं— “अयने द्वे विषुवे द्वे चतस्रः षडशीतयः । चतस्रो विष्णुपद्यश्च संक्रान्तयो द्वादश स्मृताः ॥” पञ्चाङ्गों के तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण यह ज्योतिषपञ्चाङ्ग प्रसिद्ध ही है । पञ्चाङ्गों के अनुसार आज से (ग्रन्थ निर्माण दिन से) २०२९ वर्ष पूर्व विक्रम संवत् तथा ५०७३ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर संवत् एवं कलि सम्वत् का आरम्भ हुआ था ! धृतराष्ट्र के दिवङ्गत होने के अनन्तर युधिष्ठिर के शासनकाल में ही महाभारत का निर्माण हुआ था । भारतीय साहित्यों के अनुसार तथा विविध लेखों के अनुसार भी महाभारत- निर्माण का काल यही था । संवत् ९७७ शिशुपालवध माघकाव्य के टीकाकार वल्लभदेव ने महाभारत के श्लोकों की सवा लाख संख्या बतलायी है । वल्लभदेव के पुत्र चन्द्रादित्य थे तथा पौत्र कैय्यट थे । कैय्यट ने देवीशतक की विवृति में अपना समय कलि संवत् ४०७८ अर्थात् विक्रम १०३४ लिखा है ( माघ का० २।३८ ) । सपाद लक्ष संख्या हरिवंश सहित महाभारत की समझनी चाहिये । संवत् ९३७ के राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में भारतसंहिता को शतसाहस्री ( लक्षश्लोकोंवाली ) कहा है । गीता की पुष्पिका में भी महाभारत को शतसाहस्रीसंहिता के रूप में स्मरण किया गया है । विक्रम नवमशती के आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोकवृत्ति ३।१५ में महाभारत शान्तिपर्व अ० १५३ के गृध्रगोमायुसंवाद की चर्चा की है। वे अनुक्रमणिकाध्याय और हरिवंश को महाभारत का ही भाग मानते हैं । “ननु महाभारते यावान् विवक्षाविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्व एवानुक्रान्तः••••महाभारतावसाने हरिवंशवर्णनेन तेनैव कविबेधसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः ।” (ध्वन्यालोक चतुर्थ उद्योत ) सातवीं शती के आचार्य कवि दण्डी अपनी अवन्तिसुन्दरी में महाभारत एवं उसके निर्माता व्यासजी का स्मरण करते हैं— "मर्त्ययन्त्रेषु चैतन्यं महाभारतविद्यया । अर्पयामास तत्पूर्वं यस्तस्मै सुनये नमः ।।" ( अवन्तिसुन्दरी )