रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६४ रामायणमीमांसा द्वाविंश चौदहवें वर्ष का छठा दिन तथा अंग्रेजी मान से होगा १३ वर्ष ७ दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का सातवाँ दिन। वेदाङ्गज्योतिष चान्द्रमान के अनुसार तेरह वर्ष ५ महीने १२ दिन होंगे। यही भीष्मजी की व्यवस्था है। इससे स्पष्ट मालूम होता है कि महाभारत-युद्धकाल में सिद्धान्तज्योतिष के अनुसार ही पञ्चाङ्गगणना होती थी, क्योंकि ऊपर की गणना सिद्धान्तज्योतिषगणना के पञ्चाङ्ग द्वारा ही की गयी है। चान्द्र, सावन और सौर भेद से तीन प्रकार के मास होते हैं। संवत्सर भी चान्द्र, सावन और सौर भेद से तीन प्रकार के होते हैं। पहला चैत्र शुक्ला प्रतिपद् से आरम्भ होकर फाल्गुन दर्शान्त होता है, मेष राशि से मीन राश्यन्त सौर संवत्सर होता है एवं तीन सौ साठ अहोरात्र का सावन संवत्सर होता है। चन्द्रकलाओं की वृद्धि और ह्रास के अनुसार प्रतिपदादि ३६० तिथियों का चान्द्र संवत्सर होता है तथा द्वादश राशियों में सूर्य-संक्रमण से निष्पन्न सौर संवत्सर होता है। सोमयाग में प्रातःसवन, मध्याह्नसवन और सायंसवन रूप से तीन सवन अहोरात्रसाध्य होते हैं, अतः सवनत्रय अहोरात्रसंपाद्य होने के कारण अहोरात्र ही सावन शब्द से कहे जाते हैं। तीन सौ साठ अहोरात्रों से सम्पन्न संवत्सर ही सावन संवत्सर कहा जाता है। गोसत्र आदि यज्ञों में तथा लोकव्यवहार में भी सावन संवत्सर का ही उपयोग होता है। यही विष्णुधर्मोत्तरपुराण में कहा गया है— “सत्राण्युपास्यानान्यथ सावनेन लोक्यञ्च यत्स्यात् व्यवहारकर्म ।” श्रुति में गवामयन सत्र का संवत्सर नाम से व्यवहार होता है। अतः संवत्सरकाल उसका अङ्ग है। “गोसत्रं वै संवत्सरो य एवं विद्वांसः संवत्सरमुपयन्त्युदृध्नुवन्त्येव ।” (तै० सं० ७।५।१।१) अतः उस सत्र में सावन ही संवत्सर ग्राह्य है, सौर और चान्द्र नहीं। एक अहोरात्र साध्य सोमयाग वेदों में अहःशब्द से व्यवहृत होता है। ऐसे अहर्विशेषों का गण एक षडह कहा जाता है। षडह अभिप्लव और पृष्ठ्य भेद से दो प्रकार का होता है। चार अभिप्लव षडह एवं एक पृष्ठ्य षडह इन पाँच षडहों से एक मास बनता है। तादृश द्वादश मासों से सावन संवत्सर बनता है। चान्द्र संवत्सर में छः अहोरात्र कम होते हैं। सौर में सपाद पाँच अहोरात्र अधिक होते हैं। “संवत्सरे संवत्सरे यजेत” इस श्रुति में चान्द्र संवत्सर ही ग्राह्य है, क्योंकि ‘सर्वान्ल्लोकान् पशुबन्धयाजी अभिजयति तेन यक्ष्यमाणोऽमावस्यायां वा’ इस तरह कल्पसूत्रकारों ने चान्द्र तिथि में ही उसका अनुष्ठान विहित किया है। सौर संवत् सुजन्मप्राप्ति व्रतों में उपयुक्त होता है। विष्णुधर्मोत्तर में वैसा व्रत विहित है। अतः भारतीय विद्वानों ने नक्षत्र-मण्डल के बारह विभाग कर १२ राशि और सात वासरों का ज्ञान यूनान से सीखा है, यह पाश्चात्यों का कथन सर्वथा निराधार है। क्योंकि वासर-ज्ञान के बिना अहर्गण की गणना ही नहीं हो सकती। सिद्धान्तज्योतिषगणना अहर्गण द्वारा मध्यम सूर्य, चन्द्रादि ग्रहों में मन्दोच्च शीघ्रोच्च संस्कार देकर ही सम्पादित होती है। “एको अश्वो वहति सप्तनामा ।” (ऋ० सं० १।१६४।२) इस मन्त्र से सप्तवासरों का प्रमाण मिलता है— “अमा सोमे तथा भौमे गुरुवारे यदा भवेत् । तत्पवं पुष्करं नाम सूर्यपर्वशताधिकम् ॥”