भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६३ यदु से यादव तथा तुर्वसु से यवन लोग हुए । इस तरह ययातिपौत्र यवनों के वंशधर यवन हैं, यूनानी नहीं । उन्हों का राज्य यवनराज्य के नाम से प्रख्यात हुआ है । ब्रह्मपुराण के अनुसार सूर्यवंशीय राजा बाहु पर हैहयादि राजाओं के आक्रमण के समय पञ्चगणाधिपति यवन भी उनके साथ थे— “हैहयेस्तालजङ्घैश्च शकैः सार्द्धं द्विजोत्तम । यवनाः पारदाश्चैव काम्बोजाः पह्लवास्तथा ॥ एते ह्यपि गणाः पञ्च हैहयार्थे पराक्रमन् ॥” (ब्र० पु० २।३ इन्द्रविजय पृष्ठ ४४) जब राजा बाहु के पुत्र सगर ने पितृशत्रुभूत पञ्चगणों को पराजित किया तब वशिष्ठ के शरणागत होने के कारण उनको धर्मभ्रष्ट, आचारभ्रष्ट तथा आर्यसंस्कृतिहीन कर के निर्वासित कर दिया था— “अर्धं शकानां शिरसो मुण्डयित्वा व्यसर्जयत् । यवनानां शिरः सर्वं काम्बोजानां तथैव च ॥ पारदा मुक्तकेशाश्च पह्लवाः श्मश्रुधारिण । सर्वे ते क्षत्रिया विप्रा धर्मस्तेषां निराकृतः ॥” (इन्द्रविजय पृ० ४४।१०,११) मनुस्मृति के अध्याय १० श्लोक ४३, ४४ में कहा गया है । पाण्ड्य, चोल, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, दरद, खश आदि क्षत्रियजातियाँ थीं । ब्राह्मणों के अदर्शन से संस्कारहीन होते हुए वे सब म्लेच्छप्राय हो गये— “शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥” (मनु १०।४३ ) “पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविड़ाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥” (मनु० १०।४४ ) इस तरह यवनों का नाम देखकर उन्हें यूनानी समझना अत्यन्त भ्रम है । इसी लिए शक, यवन आदि प्रयोग अनिर्वासित शूद्रों में प्रयुक्त हुआ है । इसी तरह भारतीय ज्योतिष ज्योतिर्विज्ञान-कालगणना के आधार पर स्थित है । भारतीय कालगणना सृष्टि के आदि से अन्त तक समान रहती है । विराटपर्ववाली भीष्मपितामह की गणना भी उससे विरुद्ध नहीं है । उस समय भी सौरमान और चान्द्रमान दोनों ही मान प्रचलित थे । दोनों के समन्वय के लिए अधिकमास की व्यवस्था थी । उस दृष्टि से भीष्मजी ने व्यवस्था के रूप में कहा था कि इस समय तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन द्यूतक्रीड़ा के दिन से बीत चुके हैं । उसी के अनुसार भगवान् रामचन्द्र ने भी चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण किया था । उसी के अनुसार पाण्डवों ने भी तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा पूरी की थी । वह गणना सौरचान्द्रगणना है । जिसका वर्ष चैत्र शुक्लप्रतिपदा से आरम्भ होकर चैत्रकृष्ण अमावस्या को पूरा होता है । उसके दिन कम से कम ३५४ और अधिक से अधिक ३८४ होते हैं । उसी के अनुसार कौरवों के ठीक चौदहवें वर्ष के प्रथम दिन में वेदाङ्गज्योतिष की गणना के अनुसार तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन होते हैं । यदि द्यूतक्रीडा की मिति वि० सं० १९९० ज्येष्ठ कृष्ण ८मी बुधवार को मान लें तो उस दिन राश्यादि सूर्य ( १।१३।०।४१) ता० १७ मई ई० १९३३ और अर्जुन के प्रकट होने की मिति वि० सं० २००३ ज्येष्ठ कृष्णाष्टमी शुक्रवार को मान लें तो उस दिन राश्यादि सूर्य १।९।५२।९ ता० १४ मई १९४६ ई० द्यूतक्रीडा और अर्जुन का प्रकट होना इन दोनों का अन्तर सौरचान्द्रमान से तेरह वर्ष एक दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का पहला दिन, सौरमान से होगा तेरह वर्ष ६ दिन अर्थात्