रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६२ रामायणमीमांसा द्वाविंश तक २६ वर्ष होता है। ऐसी स्थिति में शिलालेख के प्रज्ञापनों में यूनान के उन पाँच राजाओं का नाम पढ़ना जिनका राजत्वकाल ई० पू० २८५ से २३९ तक माना जाता है। सर्वथा असङ्गत ही ठहरेगा । अतः उन्हें मौर्य अशोकवर्धन के समसामयिक मानना महान् भ्रम है। वस्तुतः उक्त शिलालेखों के अन्ति- योकस, तुरमय, अन्तेकिन, मग तथा अलीकसिन्धुर ये नाम भारत के पश्चिमीय राज्यों के नाम हैं जो वारुण भारत के पञ्चगण नाम से अयोध्या के महाराज सगर के पूर्व काल से प्रसिद्ध हैं और जो चन्द्रवंशीय ययाति के तुर्वसु आदि तीनों पुत्रों के वंशधर राजाओं के अधिकार में थे। समयानुसार शासकों के नाम तथा प्रदेशों की प्राकृतिक दशाओं के कारण इन गणराज्यों के नामों और सीमाओं में परिवर्तन होता रहा। फिर भी ये पञ्चगण राज्य संस्कृत साहित्य में सिन्धु नदी के पश्चिम भारत के मुख्य राज्य माने गये हैं। इन्हीं का उल्लेख तथाकथित अशोक प्रियदर्शी प्रज्ञापनवाले शिलालेख के दूसरे, पाँचवें और तेरहवें विज्ञापनों में है। एलेक्जेण्डर को एपिरस का राजा कहना कथमपि सङ्गत नहीं। किसी भारतीय सम्राट् के लिखाए हुए भारतीय धार्मिक शिलालेख में यूनानी राजाओं के नामोल्लेख की कोई भी सङ्गति नहीं। इससे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि पाश्चात्यों को हमारे वेदादि शास्त्रों की तथा आर्ष इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि की अपौरुषेयता तथा प्राचीनता खटकती है। इसी लिए तो वेदों को भी वे ई० पू० दो हजार वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं मानना चाहते । आधुनिकों के दृष्टिकोण से किसो ग्रन्थ का या उसके रचयिता का नामोल्लेख किसी ग्रन्थ में देखकर अथवा उस ग्रन्थ का नाम और उसके रचयिता का नाम दूसरे किसी ग्रन्थ में न देखकर दोनों ग्रन्थों के रचना-काल का पूर्वापरत्व निर्णय किया जाता है। अथवा यवनादि जाति अथवा व्यक्तिविशेष के नामों, वारों के नाम, राशियों के नाम, नक्षत्र- गणना के आधार पर निर्धारण किया जाता है। इस दृष्टि से महाभारत में आये हुए नामों एवं ग्रन्थों के आधार पर महाभारत के रचनाकाल का निर्णय किया जाता है। परन्तु जब तक उन नामों और ग्रन्थों का निर्माण-काल निश्चित न कर लिया जाय तब तक महाभारत का निर्माण-काल भी निर्धारित नहीं हो सकता है। पाश्चात्यों के मतानुसार भारतीय ज्योतिर्विज्ञान की महास्थूल गणना वेदाङ्गज्योतिष की गणना से भी स्थूल थी, जिसके अनुसार भीष्मपितामह ने तेरह वर्ष के सौरमान में तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन की व्यवस्था विराटपर्व में दी थी। सिद्धान्तगणित का ज्ञान तो भारत को यूनानी ज्योतिषियों से हुआ था। नक्षत्र-मण्डल के बारह विभाग (राशियों का विभाग) भी यूनानियों की ही देन हैं। भारत में सप्ताह के स्थान षडह की गणना होती थी । वारों का ज्ञान भारतीयों को कल्डियावालों से हुआ था। इसी दृष्टि से जिन संस्कृत ग्रन्थों में (भले वे किसी विषय के हों) राशियों के बारह विभाग एवं सूर्यादि वारों तथा ज्योतिष की सिद्धान्तगणना का उल्लेख हो वे सभी ग्रन्थ ई० पू० ४०० वर्ष से पूर्व के नहीं हैं। चैत्रादि मासों का नाम भी जिन ग्रन्थों में हो उन्हें वेदाङ्गज्योतिष के पूर्व और ब्राह्मण ग्रन्थों के मध्यकाल का निर्माण मानते हैं। पाश्चात्यों के अनुसार महाभारत, पुराण, पातञ्जल महा- भाष्य और जिन ज्योतिषग्रन्थों में यवन जाति की विद्वत्ता, आक्रमणकारिता और वीरता का उल्लेख है वे सभी ग्रन्थ सिकन्दर के आक्रमण ई० पू० ३२३ के पीछे के हैं। अर्थात् ई० पू० ५०० वर्ष के प्रथम के नहीं हो सकते। इसी दृष्टि से लोकमान्य ने भी महाभारत में राशिविभाग का वर्णन न होने से उसे सिकन्दर के आक्रमण से पूर्व का और बौधायनगृह्यसूत्र में मेष, वृष आदि का नाम होने से उसे सिकन्दर के बाद का माना है। परन्तु उपर्युक्त बातें भी निःसार हो हैं, क्योंकि महाभारत आदि में आये हुए यवन शब्द ग्रीक या यूना- नियों के अर्थ में है ही नहीं। किन्तु उन्हें महाराज ययाति के पुत्र तुर्वसु के पुत्र यवन राजाओं के लिए ही समझना चाहिये । “यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ।” (म० भा० १।८५।३४ )