भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 938

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अध्याय रामचरित आदि का रचना-काल ८६१ इन सब प्रमाणों से जोन्स का यह मत खण्डित हो जाता है कि पालिबोश्रा पाटलिपुत्र का अपभ्रंश है। मेगस्थनीज के किसी भी अवतरण में पालिबोश्रा का मगध देश में होने का वर्णन नहीं है । पाटलिपुत्र उदायी द्वारा ई० पू० १७१३ में बसाया गया और पालिबोश्रा ई० पू० ३०८२ वर्ष में हेराक्लीज द्वारा बसाया गया । इसी तरह पालिबोश्रा का राजा सैण्ड्राकोट्स पौराणिक मौर्य चन्द्रगुप्त नहीं हो सकता । मौर्य चन्द्रगुप्त के शासनाारम्भकाल से ११८० वर्ष पीछे सैण्ड्राकोट्स का शासनाारम्भ हुआ । हो सकता है शूरसेन देश के पुसई जनपद के प्रभद्रनगर का कोई दूसरा चन्द्रगुप्त या चन्द्रकेतु रहा हो या इसी से मिलते जुलते नाम का शासक रहा हो । जोन्स के वक्तव्य के समर्थन में प्रिसेप बकिङ्घम, ने जिन गुहाभिलेखों और स्तम्भाभिलेखों को खोज निकाला है । उनको बड़े परिश्रम से पढ़कर यह प्रतिपादित किया गया है कि ये सब अशोक के हैं । चौदह प्रज्ञापन- वाले लेख में भी अन्तियोकस, मग, अन्तेकिन, तुरमय और अलीकसिन्धुर पाँच नामों के विषय में यूनान के भिन्न-भिन्न भागों के राजाओं के नामों की कल्पना की है। तथा उन सब राजाओं के समसामयिक ई० पू० २५८ वर्ष पर उन प्रशासनों को अङ्कित होना मानकर अभिलेखों के लिखनेवाले राजा को मौर्य अशोक प्रतिपादित किया गया है। उसी के आधार पर अशोक के पितामह चन्द्रगुप्त का राजत्वकाल वही लिखा है जो जोन्स के अनुसार मान्य होता है । परन्तु ये सब कल्पनाएँ भी भ्रान्तिमूलक ही हैं । वस्तुतः अशोक के नाम से प्रख्यात—'‘देवांनांप्रियः प्रियदर्शी राजा’’ देवानां प्रिय एवं बिना नाम के किसी व्यक्ति के लिखाये गये जितने धर्मलेख गुहाओं, स्तम्भों और शिलाओं के पाये गये हैं, वे धर्मलेख कब लिखे गये इसका कोई उल्लेख नहीं है, केवल इतना ही उल्लेख है कि प्रज्ञापन लिखानेवाले व्यक्ति के अभिषेक से कितने वर्ष पर लिखे गये हैं। अतएव जबतक लिखानेवाले राजा का अभिषेक का काल ज्ञात न हो तब तक उन लेखों का समय नहीं जाना जा सकता । म० म० पं० हीराचन्द्र ओझा के अनुसार किसी लेख या दानपत्र का निश्चित संवत् न होने पर उसकी लिपि के आधार पर समय स्थिर करना चाहिये । पर उसमें भी सैकड़ों वर्षों की चूक होना सम्भव है । प्रथम लघु शिलालेख में जो २५६ वाँ अङ्क है उसको बहुत से इतिहासज्ञ बुद्ध-निर्वाण संवत् मानते थे । हिन्दी टॉड राजस्थान के सम्पादक ओझाजी ने भो प्रकरण ६ की टिप्पणी ४४ में इसका समर्थन किया है, किन्तु पं० जनार्दन- भट्ट ने अशोक के धर्मलेख पृष्ठ ७९ की टिप्पणी १२ में कहा है कि आजकल इस मत का पूरा पूरा खण्डन हो गया है । अतः धर्मलेखों का निश्चित समय निरूपण करना सम्भव नहीं । कहा जाता है उपलब्ध समस्त अभिलेख अशोक के हैं । पर यह असंदिग्ध नहीं है, क्योंकि केवल मासकी के खण्ड प्रथम लघु शिलालेख से अशोकस्तम्भ में अशोकस ये चार अक्षर मिले हैं । शेषों में अशोक का नाम नहीं है । इन अभिलेखों में ‘'देवानांप्रियः प्रियदर्शी राजा” की द्विरुक्ति त्रिरुक्ति तो की गयी है, पर ‘अशोक' ये तीन अक्षर नहीं लिखे गये । अतः इन अभिलेखों को मौर्य अशोकवर्धन के मानना युक्तिसङ्गत नहीं है, क्योंकि जिन विषयों का वर्णन सातवें स्तम्भाभिलेख और तेरहवें विज्ञापन में है । ठीक उसी प्रकार का वर्णन चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने भारत के वर्णन प्रसङ्ग में अपने आश्रयदाता हर्षवर्धन ( शिलादित्य द्वितीय ) के विषय में किया है। देखिये रमेशचन्द्रदत्तकृत प्राचीन भारत की सभ्यता भाग ४ अ० २ पृ० २६ । ऐसी स्थिति में देवानांप्रियः प्रियदर्शी राजा शब्दों को, जो बौद्ध राजाओं की उपाधियां थीं, राजा हर्षवर्धन के लिए भी उपयुक्त मान सकते हैं। देखिये अशोक की लिपियां पृ० ७ की टिप्पणी । यदि उक्त धर्मलेख अशोकवर्धन के मान- कर पौराणिक राजवंशवलियों के राजत्वकालों के आधार पर विचार करें तो मौर्य अशोकवर्धन का राजत्वकाल कलि संवत् १६५०, विक्रम संवत् पूर्व १३९६, ई० पू० १४५३ से कलि संवत् १६७६, वि० पू० १३७०, ई० पू० १४२७