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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

८६२ रामायणमीमांसा द्वाविंश तक २६ वर्ष होता है। ऐसी स्थिति में शिलालेख के प्रज्ञापनों में यूनान के उन पाँच राजाओं का नाम पढ़ना जिनका राजत्वकाल ई० पू० २८५ से २३९ तक माना जाता है। सर्वथा असङ्गत ही ठहरेगा । अतः उन्हें मौर्य अशोकवर्धन के समसामयिक मानना महान् भ्रम है। वस्तुतः उक्त शिलालेखों के अन्ति- योकस, तुरमय, अन्तेकिन, मग तथा अलीकसिन्धुर ये नाम भारत के पश्चिमीय राज्यों के नाम हैं जो वारुण भारत के पञ्चगण नाम से अयोध्या के महाराज सगर के पूर्व काल से प्रसिद्ध हैं और जो चन्द्रवंशीय ययाति के तुर्वसु आदि तीनों पुत्रों के वंशधर राजाओं के अधिकार में थे। समयानुसार शासकों के नाम तथा प्रदेशों की प्राकृतिक दशाओं के कारण इन गणराज्यों के नामों और सीमाओं में परिवर्तन होता रहा। फिर भी ये पञ्चगण राज्य संस्कृत साहित्य में सिन्धु नदी के पश्चिम भारत के मुख्य राज्य माने गये हैं। इन्हीं का उल्लेख तथाकथित अशोक प्रियदर्शी प्रज्ञापनवाले शिलालेख के दूसरे, पाँचवें और तेरहवें विज्ञापनों में है। एलेक्जेण्डर को एपिरस का राजा कहना कथमपि सङ्गत नहीं। किसी भारतीय सम्राट् के लिखाए हुए भारतीय धार्मिक शिलालेख में यूनानी राजाओं के नामोल्लेख की कोई भी सङ्गति नहीं। इससे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि पाश्चात्यों को हमारे वेदादि शास्त्रों की तथा आर्ष इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि की अपौरुषेयता तथा प्राचीनता खटकती है। इसी लिए तो वेदों को भी वे ई० पू० दो हजार वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं मानना चाहते । आधुनिकों के दृष्टिकोण से किसो ग्रन्थ का या उसके रचयिता का नामोल्लेख किसी ग्रन्थ में देखकर अथवा उस ग्रन्थ का नाम और उसके रचयिता का नाम दूसरे किसी ग्रन्थ में न देखकर दोनों ग्रन्थों के रचना-काल का पूर्वापरत्व निर्णय किया जाता है। अथवा यवनादि जाति अथवा व्यक्तिविशेष के नामों, वारों के नाम, राशियों के नाम, नक्षत्र- गणना के आधार पर निर्धारण किया जाता है। इस दृष्टि से महाभारत में आये हुए नामों एवं ग्रन्थों के आधार पर महाभारत के रचनाकाल का निर्णय किया जाता है। परन्तु जब तक उन नामों और ग्रन्थों का निर्माण-काल निश्चित न कर लिया जाय तब तक महाभारत का निर्माण-काल भी निर्धारित नहीं हो सकता है। पाश्चात्यों के मतानुसार भारतीय ज्योतिर्विज्ञान की महास्थूल गणना वेदाङ्गज्योतिष की गणना से भी स्थूल थी, जिसके अनुसार भीष्मपितामह ने तेरह वर्ष के सौरमान में तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन की व्यवस्था विराटपर्व में दी थी। सिद्धान्तगणित का ज्ञान तो भारत को यूनानी ज्योतिषियों से हुआ था। नक्षत्र-मण्डल के बारह विभाग (राशियों का विभाग) भी यूनानियों की ही देन हैं। भारत में सप्ताह के स्थान षडह की गणना होती थी । वारों का ज्ञान भारतीयों को कल्डियावालों से हुआ था। इसी दृष्टि से जिन संस्कृत ग्रन्थों में (भले वे किसी विषय के हों) राशियों के बारह विभाग एवं सूर्यादि वारों तथा ज्योतिष की सिद्धान्तगणना का उल्लेख हो वे सभी ग्रन्थ ई० पू० ४०० वर्ष से पूर्व के नहीं हैं। चैत्रादि मासों का नाम भी जिन ग्रन्थों में हो उन्हें वेदाङ्गज्योतिष के पूर्व और ब्राह्मण ग्रन्थों के मध्यकाल का निर्माण मानते हैं। पाश्चात्यों के अनुसार महाभारत, पुराण, पातञ्जल महा- भाष्य और जिन ज्योतिषग्रन्थों में यवन जाति की विद्वत्ता, आक्रमणकारिता और वीरता का उल्लेख है वे सभी ग्रन्थ सिकन्दर के आक्रमण ई० पू० ३२३ के पीछे के हैं। अर्थात् ई० पू० ५०० वर्ष के प्रथम के नहीं हो सकते। इसी दृष्टि से लोकमान्य ने भी महाभारत में राशिविभाग का वर्णन न होने से उसे सिकन्दर के आक्रमण से पूर्व का और बौधायनगृह्यसूत्र में मेष, वृष आदि का नाम होने से उसे सिकन्दर के बाद का माना है। परन्तु उपर्युक्त बातें भी निःसार हो हैं, क्योंकि महाभारत आदि में आये हुए यवन शब्द ग्रीक या यूना- नियों के अर्थ में है ही नहीं। किन्तु उन्हें महाराज ययाति के पुत्र तुर्वसु के पुत्र यवन राजाओं के लिए ही समझना चाहिये । “यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ।” (म० भा० १।८५।३४ )

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६३ यदु से यादव तथा तुर्वसु से यवन लोग हुए । इस तरह ययातिपौत्र यवनों के वंशधर यवन हैं, यूनानी नहीं । उन्हों का राज्य यवनराज्य के नाम से प्रख्यात हुआ है । ब्रह्मपुराण के अनुसार सूर्यवंशीय राजा बाहु पर हैहयादि राजाओं के आक्रमण के समय पञ्चगणाधिपति यवन भी उनके साथ थे— “हैहयेस्तालजङ्घैश्च शकैः सार्द्धं द्विजोत्तम । यवनाः पारदाश्चैव काम्बोजाः पह्लवास्तथा ॥ एते ह्यपि गणाः पञ्च हैहयार्थे पराक्रमन् ॥” (ब्र० पु० २।३ इन्द्रविजय पृष्ठ ४४) जब राजा बाहु के पुत्र सगर ने पितृशत्रुभूत पञ्चगणों को पराजित किया तब वशिष्ठ के शरणागत होने के कारण उनको धर्मभ्रष्ट, आचारभ्रष्ट तथा आर्यसंस्कृतिहीन कर के निर्वासित कर दिया था— “अर्धं शकानां शिरसो मुण्डयित्वा व्यसर्जयत् । यवनानां शिरः सर्वं काम्बोजानां तथैव च ॥ पारदा मुक्तकेशाश्च पह्लवाः श्मश्रुधारिण । सर्वे ते क्षत्रिया विप्रा धर्मस्तेषां निराकृतः ॥” (इन्द्रविजय पृ० ४४।१०,११) मनुस्मृति के अध्याय १० श्लोक ४३, ४४ में कहा गया है । पाण्ड्य, चोल, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, दरद, खश आदि क्षत्रियजातियाँ थीं । ब्राह्मणों के अदर्शन से संस्कारहीन होते हुए वे सब म्लेच्छप्राय हो गये— “शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥” (मनु १०।४३ ) “पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविड़ाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥” (मनु० १०।४४ ) इस तरह यवनों का नाम देखकर उन्हें यूनानी समझना अत्यन्त भ्रम है । इसी लिए शक, यवन आदि प्रयोग अनिर्वासित शूद्रों में प्रयुक्त हुआ है । इसी तरह भारतीय ज्योतिष ज्योतिर्विज्ञान-कालगणना के आधार पर स्थित है । भारतीय कालगणना सृष्टि के आदि से अन्त तक समान रहती है । विराटपर्ववाली भीष्मपितामह की गणना भी उससे विरुद्ध नहीं है । उस समय भी सौरमान और चान्द्रमान दोनों ही मान प्रचलित थे । दोनों के समन्वय के लिए अधिकमास की व्यवस्था थी । उस दृष्टि से भीष्मजी ने व्यवस्था के रूप में कहा था कि इस समय तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन द्यूतक्रीड़ा के दिन से बीत चुके हैं । उसी के अनुसार भगवान् रामचन्द्र ने भी चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण किया था । उसी के अनुसार पाण्डवों ने भी तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा पूरी की थी । वह गणना सौरचान्द्रगणना है । जिसका वर्ष चैत्र शुक्लप्रतिपदा से आरम्भ होकर चैत्रकृष्ण अमावस्या को पूरा होता है । उसके दिन कम से कम ३५४ और अधिक से अधिक ३८४ होते हैं । उसी के अनुसार कौरवों के ठीक चौदहवें वर्ष के प्रथम दिन में वेदाङ्गज्योतिष की गणना के अनुसार तेरह वर्ष पाँच महीने बारह दिन होते हैं । यदि द्यूतक्रीडा की मिति वि० सं० १९९० ज्येष्ठ कृष्ण ८मी बुधवार को मान लें तो उस दिन राश्यादि सूर्य ( १।१३।०।४१) ता० १७ मई ई० १९३३ और अर्जुन के प्रकट होने की मिति वि० सं० २००३ ज्येष्ठ कृष्णाष्टमी शुक्रवार को मान लें तो उस दिन राश्यादि सूर्य १।९।५२।९ ता० १४ मई १९४६ ई० द्यूतक्रीडा और अर्जुन का प्रकट होना इन दोनों का अन्तर सौरचान्द्रमान से तेरह वर्ष एक दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का पहला दिन, सौरमान से होगा तेरह वर्ष ६ दिन अर्थात्

८६४ रामायणमीमांसा द्वाविंश चौदहवें वर्ष का छठा दिन तथा अंग्रेजी मान से होगा १३ वर्ष ७ दिन अर्थात् चौदहवें वर्ष का सातवाँ दिन। वेदाङ्गज्योतिष चान्द्रमान के अनुसार तेरह वर्ष ५ महीने १२ दिन होंगे। यही भीष्मजी की व्यवस्था है। इससे स्पष्ट मालूम होता है कि महाभारत-युद्धकाल में सिद्धान्तज्योतिष के अनुसार ही पञ्चाङ्गगणना होती थी, क्योंकि ऊपर की गणना सिद्धान्तज्योतिषगणना के पञ्चाङ्ग द्वारा ही की गयी है। चान्द्र, सावन और सौर भेद से तीन प्रकार के मास होते हैं। संवत्सर भी चान्द्र, सावन और सौर भेद से तीन प्रकार के होते हैं। पहला चैत्र शुक्ला प्रतिपद् से आरम्भ होकर फाल्गुन दर्शान्त होता है, मेष राशि से मीन राश्यन्त सौर संवत्सर होता है एवं तीन सौ साठ अहोरात्र का सावन संवत्सर होता है। चन्द्रकलाओं की वृद्धि और ह्रास के अनुसार प्रतिपदादि ३६० तिथियों का चान्द्र संवत्सर होता है तथा द्वादश राशियों में सूर्य-संक्रमण से निष्पन्न सौर संवत्सर होता है। सोमयाग में प्रातःसवन, मध्याह्नसवन और सायंसवन रूप से तीन सवन अहोरात्रसाध्य होते हैं, अतः सवनत्रय अहोरात्रसंपाद्य होने के कारण अहोरात्र ही सावन शब्द से कहे जाते हैं। तीन सौ साठ अहोरात्रों से सम्पन्न संवत्सर ही सावन संवत्सर कहा जाता है। गोसत्र आदि यज्ञों में तथा लोकव्यवहार में भी सावन संवत्सर का ही उपयोग होता है। यही विष्णुधर्मोत्तरपुराण में कहा गया है— “सत्राण्युपास्यानान्यथ सावनेन लोक्यञ्च यत्स्यात् व्यवहारकर्म ।” श्रुति में गवामयन सत्र का संवत्सर नाम से व्यवहार होता है। अतः संवत्सरकाल उसका अङ्ग है। “गोसत्रं वै संवत्सरो य एवं विद्वांसः संवत्सरमुपयन्त्युदृध्नुवन्त्येव ।” (तै० सं० ७।५।१।१) अतः उस सत्र में सावन ही संवत्सर ग्राह्य है, सौर और चान्द्र नहीं। एक अहोरात्र साध्य सोमयाग वेदों में अहःशब्द से व्यवहृत होता है। ऐसे अहर्विशेषों का गण एक षडह कहा जाता है। षडह अभिप्लव और पृष्ठ्य भेद से दो प्रकार का होता है। चार अभिप्लव षडह एवं एक पृष्ठ्य षडह इन पाँच षडहों से एक मास बनता है। तादृश द्वादश मासों से सावन संवत्सर बनता है। चान्द्र संवत्सर में छः अहोरात्र कम होते हैं। सौर में सपाद पाँच अहोरात्र अधिक होते हैं। “संवत्सरे संवत्सरे यजेत” इस श्रुति में चान्द्र संवत्सर ही ग्राह्य है, क्योंकि ‘सर्वान्ल्लोकान् पशुबन्धयाजी अभिजयति तेन यक्ष्यमाणोऽमावस्यायां वा’ इस तरह कल्पसूत्रकारों ने चान्द्र तिथि में ही उसका अनुष्ठान विहित किया है। सौर संवत् सुजन्मप्राप्ति व्रतों में उपयुक्त होता है। विष्णुधर्मोत्तर में वैसा व्रत विहित है। अतः भारतीय विद्वानों ने नक्षत्र-मण्डल के बारह विभाग कर १२ राशि और सात वासरों का ज्ञान यूनान से सीखा है, यह पाश्चात्यों का कथन सर्वथा निराधार है। क्योंकि वासर-ज्ञान के बिना अहर्गण की गणना ही नहीं हो सकती। सिद्धान्तज्योतिषगणना अहर्गण द्वारा मध्यम सूर्य, चन्द्रादि ग्रहों में मन्दोच्च शीघ्रोच्च संस्कार देकर ही सम्पादित होती है। “एको अश्वो वहति सप्तनामा ।” (ऋ० सं० १।१६४।२) इस मन्त्र से सप्तवासरों का प्रमाण मिलता है— “अमा सोमे तथा भौमे गुरुवारे यदा भवेत् । तत्पवं पुष्करं नाम सूर्यपर्वशताधिकम् ॥”

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६५ हेमाद्रि-दानखण्ड तृतीय प्रकरण में उद्धृत महाभारतवचन । अर्थात् सोम, भौम तथा गुरुवार को अमावस्या होने पर पुष्कर पर्व होता है और वह सौ सूर्य पर्वों से भी अधिक पुण्य काल है । इसी तरह अयन ( कर्क और मकर ), विषुव ( मेष और तुला ), षडशीतिमुख ( मिथुन, कन्या, धनु और मीन ) तथा पर्व अर्थात् विष्णुपद ( वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ ) नामों से संक्रान्तियों का वर्णन महाभारत में विद्यमान है— "ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं शतगुणमृत्ययनादिषु ध्रुवम् । भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहौविषुवति चाक्षयमश्नुते फलम् ।।" (म०भा० ३।२००।२६) “अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखे ध्रुवम् । चन्द्रसूर्योपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते ।।" (म० भा० ३।२००।२५) इन वचनों में अयन, विषुव, षडशीतिमुख आदि उक्त राशियों के संकेत हैं। अतः वेदादि शास्त्रों के समान ही यह गणना भी अनादि ही है। वृद्धवसिष्ठ ने संक्रान्तियों के उक्त नाम बतलाये हैं— “अयने द्वे विषुवे द्वे चतस्रः षडशीतयः । चतस्रो विष्णुपद्यश्च संक्रान्तयो द्वादश स्मृताः ॥” पञ्चाङ्गों के तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण यह ज्योतिषपञ्चाङ्ग प्रसिद्ध ही है । पञ्चाङ्गों के अनुसार आज से (ग्रन्थ निर्माण दिन से) २०२९ वर्ष पूर्व विक्रम संवत् तथा ५०७३ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर संवत् एवं कलि सम्वत् का आरम्भ हुआ था ! धृतराष्ट्र के दिवङ्गत होने के अनन्तर युधिष्ठिर के शासनकाल में ही महाभारत का निर्माण हुआ था । भारतीय साहित्यों के अनुसार तथा विविध लेखों के अनुसार भी महाभारत- निर्माण का काल यही था । संवत् ९७७ शिशुपालवध माघकाव्य के टीकाकार वल्लभदेव ने महाभारत के श्लोकों की सवा लाख संख्या बतलायी है । वल्लभदेव के पुत्र चन्द्रादित्य थे तथा पौत्र कैय्यट थे । कैय्यट ने देवीशतक की विवृति में अपना समय कलि संवत् ४०७८ अर्थात् विक्रम १०३४ लिखा है ( माघ का० २।३८ ) । सपाद लक्ष संख्या हरिवंश सहित महाभारत की समझनी चाहिये । संवत् ९३७ के राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में भारतसंहिता को शतसाहस्री ( लक्षश्लोकोंवाली ) कहा है । गीता की पुष्पिका में भी महाभारत को शतसाहस्रीसंहिता के रूप में स्मरण किया गया है । विक्रम नवमशती के आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोकवृत्ति ३।१५ में महाभारत शान्तिपर्व अ० १५३ के गृध्रगोमायुसंवाद की चर्चा की है। वे अनुक्रमणिकाध्याय और हरिवंश को महाभारत का ही भाग मानते हैं । “ननु महाभारते यावान् विवक्षाविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्व एवानुक्रान्तः••••महाभारतावसाने हरिवंशवर्णनेन तेनैव कविबेधसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः ।” (ध्वन्यालोक चतुर्थ उद्योत ) सातवीं शती के आचार्य कवि दण्डी अपनी अवन्तिसुन्दरी में महाभारत एवं उसके निर्माता व्यासजी का स्मरण करते हैं— "मर्त्ययन्त्रेषु चैतन्यं महाभारतविद्यया । अर्पयामास तत्पूर्वं यस्तस्मै सुनये नमः ।।" ( अवन्तिसुन्दरी )

८६६ रामायणमीमांसा द्वाविंश जिसने मर्त्यरूपी यन्त्र में महाभारतविद्या से चैतन्य का सञ्चार किया था उन व्यास मुनि को नमस्कार है । दण्डिपूर्वभावी बाणभट्ट अपनी कृति कादम्बरी तथा हर्षचरित में अनेक बार महाभारत और व्यास का उल्लेख करते हैं । यथा— पार्थरथपताकेव वानराक्रान्ता, विराटनगरीव कीचकशतावृता । (पृ० ६०) भीष्ममिव शिखण्डिशत्रुम्, पराशरमिव योजनगन्धानुसारिणम् । (पृ० १०७,१०८) महाभारते शकुनिवधः । (पृ०१४३) महाभारतपुराणरामायणानुरागिणा (पृ० १७९) आस्तीकतनुरिवानन्दितभुजङ्गलोका । (पृ० १८२) महाभारते दुःशासनापराधाकर्णनम् । (पृ० १९९, कादम्बरीपूर्वभागे) एकाकी तपस्वी वनमृगैः सह संवर्धितः सहजब्राह्मणमार्दवसुकुमारमनाः कृतनिश्चयः समग्र- मुद्यतमेकविंशतिकृत्वः कृत्तवंशमुत्खातवान् राजन्यकं रामः । (उच्छ्वास षष्ठ, पृ० २९१) हिडिम्बामुखचुम्बनास्वादितमिव रिपुरुधिरामृतमपायि पवनात्मजेन । (उच्छ्वास षष्ठ, पृ० २९२) जामदग्न्येन क्षत्रियक्षतमहाह्रदेषु अस्नायि । (हर्षचरित उच्छ्वास षष्ठ, २९२) “नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविवेधसे । चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥ किं कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी । कथेव भारती यस्य न व्याप्नोति जगत्त्रयम् ॥” (श्रीहर्षचरिते उपोद्घाते ४ और १०) उपर्युक्त वचनों में वानराक्रान्ता पार्थरथपताका को तथा कीचकों से आवृत विराटनगरी को उपमान के रूप में देखा है । शिखण्डिशत्रु भीष्म तथा योजनगन्धानुसारी पराशर को भी उपमान बनाया गया है । महाभारत के शकुनिवध, नागसमुदाय को आनन्दित करनेवाले आस्तीक मुनि, दुःशासन के अपराध, जामदग्न्य के इक्कीस बार क्षत्रोन्मूलन, हिडिम्बा, भीम तथा दुःशासन के रक्तपान, जामदग्न्य का क्षत्रियरक्तमहाह्रद में स्नान आदि का उल्लेख है । यह सब कथावस्तु महाभारत की ही है । श्लोकों में सर्वविद् व्यास एवं उनकी जगत्त्रय-व्यापिनी भारतीय कथा की चर्चा है । काशिकाकार जयादित्य भी बाणभट्ट के समकालिक हैं— “द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् ।” (पा० सू० ४।१।१०३) में “नैवात्र महाभारतद्रोणो गृह्यते” इस वाक्य द्वारा महाभारत की चर्चा करते हैं । मेघदूत में कालिदास ने रामायण और महाभारत दोनों की चर्चा की है । रामायण— “जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु । इत्याख्याते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखी सा ।” महाभारत— “क्षेत्रं क्षत्रप्रधनपिशुनं कौरवं तद् भजेथाः ।”

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६७ जयादित्य से प्राचीन भट्टपाद कुमारिल व्यासजी एवं उनके श्लोक का स्मरण करते हैं— “प्रसिद्धो हि तथा चाह पाराशर्योऽत्र वस्तुनि । इदं पुण्यमिदं पापम्…………॥ (श्लोकवार्तिक) धर्मकीर्ति भी भारत की चर्चा करता है— “भारतादिष्वपि इदानीन्तनानामशक्तावपि कस्यचित् शक्तिसिद्धेः । (प्र० वार्तिक ४४७, ४४८) संवत् ६२७ से पूर्ववर्ती वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने वाक्यपदीय काण्ड १।१४२ में अश्वमेध पर्व का श्लोक उद्धृत किया है—“गौरिव प्रक्षरत्येका”। वासवदत्ता में उद्धृत न्यायवार्तिककार उद्योतकरसूत्र ४।१।२१ वार्तिक में महाभारत वनपर्व के ३०।२८ वां श्लोक उद्धृत करते हैं— “अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ॥” योगभाष्य में योगभाष्यकार द्वारा १।४७ और २।४२ में महाभारत शान्तिपर्व १७।२०, १५१।११ तथा महाभारत शान्तिपर्व १७४।४६, २७७।५१, ७७।७ उद्धृत है । “प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् । भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥” महाराज सर्वनाथ के शिलालेख संवत् १९१-२१४ तक के मिल चुके हैं । पाश्चात्य-पद्धति के लोग इस संवत् को कलियुगी संवत् मानते हैं । सर्वनाथ के ताम्रलेख में भारत के १ लाख श्लोक माने गये हैं— उक्तं च महाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां परमर्षिणा पराशरसुतेन व्यासेन । ( गुप्तशिलालेख भाग ३ पृ० १३४ ) शाबरभाष्य के लेखक शबरस्वामी इससे भी प्राचीन हैं । इन्होंने भी ८।१२ में महाभारत आदिपर्व १।४९ का श्लोक उद्धृत किया है— “विस्तीर्यं हि महज्जालमृषिः संक्षिप्य चाब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥” इस उद्धरण के अनुसार महाभारत का अनुक्रमणीपर्व भी व्यासकृत है और महाभारत लक्षश्लोकात्मक है, यह सिद्ध होता है । कामसूत्रकार वात्स्यायन ने १।४ में इस श्लोक को उद्धृत किया— “धर्मकामार्थयुक्तानि शास्त्राणि विविधानि च । लोकयात्राविधानं च सर्वं तद् दृष्टवानृषिः ॥” आचार्य गर्ग स्कन्दस्वामी के पूर्ववर्ती हैं । उन्होंने निरुक्तभाष्य ४।१ में आदिपर्व का यह वचन उद्धृत किया है— “विस्तीर्य हि महज्ज्ञानमृषिः संक्षेपतोऽब्रवीत् । इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासधारणम् ॥”

८६८ रामायणमीमांसा द्वाविंश

एष वाख्यानसमयः ७।७ पर दुर्गाचार्य कहते हैं । भारते आख्यानसमयः इसके आगे के आख्यानों का निर्देश करते हैं । पृथिवी स्त्रीरूप में ब्रह्मा से याञ्चा करती है ( म० भा० १।६४ ) । अग्नि ने ब्राह्मणरूप में वासुदेव एवं अर्जुन से खाण्डव वन की याञ्चा की थी ( म० भा० १।२२४-२२५ ) । “व्यासः कणाद ऋषभः कपिलः शाक्यनायकः । निर्वृते मम पश्चात्तु भविष्यन्त्येवमादयः ॥ मयि निर्वृते वर्षशते व्यासो वै भारतस्तथा । पाण्डवाः कौरवा राम पश्चान्मोर्यो भविष्यति ॥ मौर्या नन्दाश्च गुप्ताश्च ततो म्लेच्छा नृपाधमाः । म्लेच्छान्ते शस्त्रसंक्षोभः शस्त्रान्ते च कलियुगः ॥” लङ्कावतारसूत्र का चीनी अनुवाद सन् ५७ ई० में हुआ है । उक्त श्लोक लङ्कावतारसूत्र के हैं । इसमें व्यास और भारत का नाम है । वररुचिकृत वाररुच निरुक्तसमुच्चय मिलता है । उसमें “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” ‘इति व्यासवचनम्’ कहा गया है । इससे महाभारत व्यासकृत सिद्ध होता है । वररुचि विक्रमादित्य का पुरोहित था । अतः विक्रम १ शती का था । पैशाची बृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य के अनुसार उसके समय में महा- भारत विद्यमान था । अतएव उसके अनुवादभूत कथासरित्सागर में रुरु मुनि की कथा १४।७६ आदिपर्व अध्याय ८ में मिलती है । सुन्दोपसुन्द कथा ५।१३५ आदि २१२ में मिलती है । कुन्ती दुर्वासा १६।३६ आ० प० ११३।३२ में, पाण्डुमुनिवध-कथा २१-२० आदिपर्व १०८ में तथा शकुन्तला ३२।१०८ आदिपर्व ६२ में मिलती है । अश्वघोष के बुद्धचरित १।४७ में नष्ट वेद का सारस्वत द्वारा उपदेश का वर्णन है । वह महाभारत शल्यपर्व अध्याय ५१ में ही है । आद्य कालिदास ही रघुवंश, कुमारसम्भव, अभिज्ञानशाकुन्तल आदि के प्रणेता हैं । ‘यतो हि रसविशेषदीक्षागुरोः श्रीविक्रमादित्यसाहसाङ्कस्याभिरूपपण्डितभूयिष्ठेयं परिषद्’ इस अभिज्ञानशाकुन्तल के वचन से विक्रमादित्य के स्पष्ट सङ्केत तथा विक्रमोर्वशीयम् एवं मालविकाग्निमित्रम् आदि ग्रन्थों से विक्रमा- दित्य, अग्निमित्र, शूद्रक आदि से उनका विशेष सम्बन्ध निश्चित होता है । कालिदास विक्रमादित्य की सभा के रत्न थे यह प्रसिद्धि ठीक ही है । मृच्छकटिक में शूद्रक अपने को द्विज मुख्यतम कहते हैं । वे अपने को कवि, महासत्त्व, ऋग्वेद, सामवेद, गणितकला, हस्तिशिक्षा आदि में निष्णात, शिवजी के प्रसाद से सर्वज्ञानलब्धा, अश्वमेधयाजी, साग्रशतसंवत्सरजीवी, प्रमादशून्य, वेदविदां ककुद्, तपोधन तथा समरव्यसनी भी कहते हैं— “ऋग्वेदं सामवेदं गणितमथ कलां वैशिकीं हस्तिशिक्षां ज्ञात्वा शर्वप्रसादाद् व्यपगततिमिरे चक्षुषी चोपलभ्य । राजानं वीक्ष्य पुत्रं परमसमुदयेनाश्वमेधेन चेष्ट्वा लब्ध्वा चायुः शताबदं दशदिनसहितं शूद्रकोऽग्निं प्रविष्टः ॥” ( मृच्छकटिक १।४ ) उपर्युक्त श्लोकों में यह भी उल्लेख है कि शूद्रक अन्त में अग्नि में प्रविष्ट हो गया था । यहाँ यह शङ्का होती है कि स्वयं शूद्रक अपने भावी अग्निप्रवेश की 'अग्निं प्रविष्टः' अतीतरूप से कैसे लिख सकता है । अतः ये श्लोक शूद्रकरचित न होकर किसी अन्य के ही होने चाहिये । परन्तु यह शङ्का निरर्थक ही है, क्योंकि शूद्रक शिबजी

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८६९ का गण था । शिवप्रसाद से ही जैसे उसने अन्य चमत्कारपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त की थीं वैसे ही भावी अग्निप्रवेश का भी ज्ञान एवं उल्लेख उसके द्वारा सम्भव है । भावी वृत्तान्त का निर्देश भी सौकर्य-द्योतन के लिए परोक्ष अतीत रूप से किया जाता है । तभी तो 'व्योतेने किरणावलीमुदयनः' प्रयोग हुआ है । किरणावलीकार ग्रन्थ के आरम्भ में ही कहते हैं—'व्यातेने किरणावलीम्' किरणावली का निर्माण मेरे लिए इतना सुकर है कि समझ लेना चाहिये कि उदयन ने किरणावली का निर्माण किया और इतने अनायास से किया कि उसको भी नहीं ज्ञात हुआ । कवि दण्डी भी शूद्रक का वैसा ही स्मरण करते हैं । वे हर्षचरित के टीकाकार रङ्गनाथ अग्निमित्र को ही शूद्रक मानते हैं। वही समरों में आदित्यवत् प्रकाशमान होने में विक्रमादित्य की संज्ञा को प्राप्त हुए थे । उनकी ऐतिहासिकता में उनका प्रचलित विक्रमीय संवत् ही परम प्रमाण है । वह युधिष्ठिरसंवत्, कलिसंवत्, बुद्धसंवत्, वीरसंवत् आदि सबसे अधिक प्रसिद्ध है । विशेषतः आसेतु हिमाचल वैदिक सम्प्रदाय तथा पञ्चाङ्गों में उसी का सर्वाधिक प्राधान्य है । कहा जाता है कि जो पर्याप्त सुवर्णदान के द्वारा भूतल में सभी का ऋण उतार देता है । वही संवत्सर की स्थापना कर सकता है । वीर विक्रमादित्य के सम्बन्ध में जैनसम्प्रदाय में ऐसी ही प्रसिद्धि है । प्रभावकचरित्र नामक ग्रन्थ में निम्नोक्त श्लोक मिलते हैं— “शकानां वंशमुच्छेद्य कालेन कियतापि हि । राजा श्रीविक्रमादित्यः सार्वभौमोपमोऽभवत् ।। स चोन्नतमहासिद्धिसौवर्णपुरुषोदयात् । मेदिनीमनृणां कृत्वाऽचीकरद् वत्सरं निजम् ।।” अर्थात् कुछ ही काल में शकों का वंशोच्छेद कर राजा विक्रमादित्य सार्वभौम तुल्य हो गये थे । उनकी महासिद्धि से सौवर्ण पुरुष का उदय होने से सम्पूर्ण मेदिनी को अनृण कर के उन्होंने अपना संवत्सर चलाया था । फिर भी कुछ लोगों का आक्षेप है कि यह संवत् अपने प्रारम्भ की शताब्दियों में विक्रम के नाम से सम्बद्ध नहीं था । उस समय के ज्योतिषियों ने अपने ग्रन्थों में शक संवत्सर का ही प्रयोग किया है, विक्रम संवत् का नहीं । साथ ही राजस्थान आदि तत्समीपवर्ती प्रान्तों में प्राप्त लेखों में कृत नाम से इस संवत् का उल्लेख है । उदयपुर में नन्दसायूपाभिलेख में कृत संवत् २८२ तथा चैत्र पूर्णिमा तिथि का उल्लेख है— “कृतयोर्द्वयोर्वर्षशतयोः द्व्यशीत्योः चैत्रपूर्णमास्याम् ।” राजस्थान के कोटाराज्य में उपलब्ध बडवायूपाभिलेख में कृत संवत् २९५ का उल्लेख है । मालव में उप- लब्ध दशपुर ( मंदसौर ) के अभिलेख में कृत संवत् और मालव संवत् —“श्रीमालवगणाम्नाते प्रशस्ते कृतसंज्ञके ।” कुमारगुप्त के दशपुराभिलेख में मालवगण संवत् दिया है— “मालवगणस्थितिवशात् कालज्ञानाय लिखितेषु ।” कोटाराज्य में उपलब्ध किसी शिवगणाभिधेय ने कनस्वामिलेख में मालवेश से संवत् का उल्लेख किया है— ‘ संवत्सरशतैर्याते''''मालवेशानाम् ।’ चण्डमहासेन के धौलपुर के अभिलेख में ८९८ विक्रम संवत् का उल्लेख है—‘‘वसुनवाष्टौ वर्षगतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य ।” विद्दग्धराज के बीजापूरीय लेख में ९७३ विक्रमकाल का उल्लेख है—“विक्रमकाले गते ।” बोधगया के लेख में विक्रम संवत् १००५ का उल्लेख है। उदयपुर के राज्य में नरवाहन नामक एकलिङ्ग के अभिलेख में विक्रमादित्य संवत् १०२८ का उल्लेख है— “विक्रमादित्यभूपतः अष्टाविंशतियुक्ते शते दशगुणे सति ।”

सिरोहि पूर्णपाल के वसन्तगढ़ीय लेख में १०९९ विक्रम संवत् का उल्लेख है—'नवनवतिरिहासीद् विक्रमादित्यकाले ।' विद्वानों का मत है कि कृत, मालवा तथा विक्रम नाम से प्रख्यात संवत् एक ही है । यहाँ प्रश्न होता है कि यदि विक्रम ही इस संवत् के स्थापक हैं तो पहले ही से इनके नाम से इसकी प्रख्याति क्यों नहीं हुई ? पहले कृत नाम से, फिर मालव नाम से और फिर विक्रम नाम से प्रख्याति क्यों हुई ? इसका समाधान यह हो सकता है कि विक्रमादित्य मालवगण के प्रमुख थे, निरङ्कुश राजा नहीं थे । अतः उन्होंने मालव संवत् की ही स्थापना की होगी । अपने नाम से ही संवत् स्थापन करने में गणभेद की सम्भावना हो सकती थी । मालवगण के द्वारा बर्बर शकों के पराजित होने पर शान्तियुग का समय आया होगा । जनता में शान्ति और समृद्धि का युग होने के कारण उसे पहले कृत नाम से कहा जाने लगा, परन्तु विक्रम राज्यारोहण से १३५ वर्ष बाद शक फिर से विजयी हो गये थे जैसा कि 'प्रभावकचरित' में उल्लेख है— 'ततो वर्षशते पञ्चत्रिंशता साधिके पुनः तस्य राज्ञोऽन्वयं हत्वा वत्सरः स्थापितः शकैः ।' परन्तु मालवगण का विजयी शकों से सङ्घर्ष बना ही था । फिर भी मालवगण जीवित था । तब कृत काल तो स्वप्नप्राय ही हो गया, अतः अब मालवगण नाम से वही संवत्सर चलने लगा । चौथी शती पूर्वार्ध में गुप्तसाम्राज्य के वृद्धिगत होने पर भी मालवशक्ति विद्यमान थी ही । सम्राट् समुद्र गुप्त ने मालवगण को पराजित करके छोड़ दिया था । इसी लिए समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति में गणतन्त्र-नामावली में मालव का प्रथम नाम है । “मालवार्जुनायनयौधेयभाद्रकाभीरप्रार्जुनसनकानीककाकखर्परिकादिगणानुन्मूल्य साम्राज्यसीमा विस्तारिता पश्चात् महत्त्वमाकाङ्क्षमाणेण द्वितीयचन्द्रगुप्तेन ।” पश्चात् द्वितीय चन्द्रगुप्त ने पूर्वोक्त गणों का उन्मूलन करके अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ायी थी । गुप्त राजाओं ने भी गुप्तसंवत् चलाया था, परन्तु विक्रमादित्य की न्यायप्रियता का प्रभाव जनमानस में बद्धमूल था । अतः गुप्तशासनकाल में भी प्रजा ने विक्रमसंवत्सर का ही आदर किया था । अतः महान् सम्राट् कुमार- गुप्त ने अपने अभिलेख में मालव-संवत्सर का ही उल्लेख किया । फलतः गुप्तसाम्राज्य समाप्त होने पर मालवीय प्रजा फलतः विक्रम संवत् को ही दृढ़ता से ग्रहण करती रही । आठवीं शती में भारत में निरङ्कुश राजतन्त्र की स्थापना हुई । गणतन्त्र की भावना जनमानस से लुप्त हो गयी तब लोकप्रिय प्रभविष्णु विक्रमादित्य सम्राट् के नाम से वही संवत्सर प्रसिद्ध हो गया । प्रारम्भिक शताब्दियों में विक्रम संवत् जैसे विक्रम नाम से प्रख्यात नहीं हुआ, वैसे ही शक-संवत् भी स्वस्थापना से ५०० वर्ष बाद शकनाम से प्रचलित हुआ । सन् संवत् भी स्वप्रचलन से पाँच छः सौ वर्ष बाद ईसा के नाम से सम्बद्ध हुआ था । गुप्त संवत् २२१ वर्ष तक गुप्त नाम से निर्दिष्ट नहीं होता था । हाल प्रतिष्ठान के राजा ( सातवाहन ) प्रथम शती में विद्यमान थे । उन्होंने गाथा-सप्तशती में विक्रमा- दित्य का उल्लेख किया है । “संवाहण सुहरसतो सियेण दन्तेण तुह करे लक्खरूयं चललेण विक्कमा इव चरियम् अणु सिक्खियम् तिस्सा ।” टीकाकार गदाधर के अनुसार “विक्रमादित्योऽपि भृत्यकृत्येन तुष्टः सन् भृत्यस्य करे लक्षं ददाति स्म ।” अर्थात् विक्रमादित्य भृत्य के कार्य से तुष्ट होकर उसके हाथ में लक्ष मुद्रा देते थे । बृहत्कथा के अनुसार भी विक्रमादित्य ईसवीय सन् से पहले के ही हैं । गुणाढ्य ने पिशाची भाषा में बृहत्कथा लिखी थी । गुणाढ्य सात- वाहन की सभा के अलङ्कार थे । अतः सातवाहन के समकालीन ही थे । बृहत्कथा का अनुवाद काश्मीरपरम्परा में ११वीं शती के क्षेमेन्द्र ने बृहत्कथामञ्जरी के नाम से किया था ।

अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल ८७१ दूसरा अनुवाद सोमदेव ने कथासरित्सागर नाम से किया है। क्षेमेन्द्र ने यद्यपि लम्बकों के पौर्वापर्य में कुछ स्वातन्त्र्य का भी अवलम्बन किया था, किन्तु सोमदेव तो कहते हैं — मैं यथामूल ही लिख रहा हूँ। इसमें किञ्चित् भी मूल का अतिक्रम नहीं है— “यथा मूलं तथैवैतत् न मनागप्यतिक्रमः ।” नेपालपरम्परा में आठवीं शती से भी पूर्व बुद्धस्वामी ने श्लोकसंग्रह नाम से बृहत्कथा का अनुवाद किया था। उस बृहत्कथा में कहा गया है कि भगवान् शिव का माल्यवान् नामक गण ही उनके आज्ञानुसार विक्रमादित्य के रूप में आया था। ऋषि सर्वज्ञकल्प होते हैं, अतः विक्रम से कई सौ वर्ष पूर्व नरवाहनदत्त को कण्व द्वारा विक्रम की कथा सुनाना असम्भव नहीं है। जैन मेरुतुङ्गाचार्य ने अपने विचारश्रेणी नामक प्राकृत ग्रन्थ में विशाला (उज्जयिनी) के इतिहास का वर्णन करते हुए कहा है कि महावीरनिर्वाण ईस्वी सन् प्रारम्भ से ५२७ वर्ष पूर्व हुआ था। महावीरनिर्वाण के ४७० वर्षों के पश्चात् शकों का उन्मूलनकर मालव के राजा विक्रमादित्य उदित होंगे— “कालान्तरेण केण वि उप्पाडिता सगाणतं वंशं हो हि । मालव राया नामेण विक्कमा इच्छो ॥” ज्योतिर्विदों की परम्परा में भी संवत्सरकर्त्ता के रूप से विक्रमादित्य का स्मरण होता है— “युधिष्ठिरो विक्रमशालिवाहनौ नराधिनाथौ विजयाभिनन्दनः । इमे तु नागार्जुनमेदिनीविभुर्बली क्रमात् षट् शककारकाः कलौ ॥” संवत् १६९९ की लिखित अभिज्ञानशाकुन्तल की प्रति में निम्न वाक्य है— “आर्ये, रसभावविशेषदीक्षागुरोः श्रीविक्रमादित्यसाहसाङ्कस्य अभिरूपपण्डितभूयिष्ठेयं परिषद् । अस्यां च कालिदासप्रयुक्तेन अभिज्ञानशाकुन्तलनाम्ना नवेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः ।” इसमें स्पष्ट ही विक्रमादित्य की पण्डितभूयिष्ठा परिषद् में कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल के अभिनय की बात कही गयी है। कालिदास के ज्योतिर्विदाभरण में उसके निर्माण का काल कलि संवत् ३०६८ वैशाख कहा गया है— “वर्षेः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणैर्यति कलौ सम्मिते । मासे माधवसंज्ञिते च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः ॥” यह कलि का ५०७३ व्यतीत संवत् है और विक्रमराज्य से २०२९ गताब्द हैं। इस तरह विक्रमादित्य के सिंहासनारोहण से २४ वर्ष बाद २५वें वर्ष के वैशाख में इस ग्रन्थ की रचना प्रारम्भ हुई है। “काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततः कियदहो श्रुतिकर्मवादः । ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो द्विजतो बभूव ॥” इस श्लोक से स्पष्ट है कि कालिदास की कृतियों में रघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत काव्यत्रय तथा कोई मीमांसाग्रन्थ श्रुतिकर्मवाद एवं ज्योतिर्विदाभरण प्रधान ग्रन्थ हैं। कालिदास ने विक्रमादित्य के सभासदों की गणना भी वहीं बतायी है— “शङ्कुः सुवाग् वररुचिर्मणिरङ्गदत्तो जिष्णुस्त्रिलोचनहरी घटखर्पराख्यः । अन्येऽपि सन्ति कवयोऽमरसिंहपूर्वा यस्यैव विक्रमनृपस्य सभासदोऽमी ॥”

८७२ रामायणमीमांसा द्वाविंश उसी ग्रन्थ में विक्रमसभा के नवरत्नों की भी गणना है— “धन्वन्तरिक्षपणकामरसिंहशङ्कुवेतालभट्टघटखर्परकालिदासाः । ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥” उपर्युक्त वचनों में धन्वन्तरि १, क्षपणक २, अमरसिंह ३, शङ्कु ४, वेतालभट्ट ५, घटखर्पर ६, कालिदास ७, वराहमिहिर ८ वररुचि ९ ये विक्रमादित्य की सभा के नौ रत्न हैं। पहले श्लोक में मणि, अङ्गदत्त, विष्णु, त्रिलोचन और हरि अन्य विद्वानों के नाम हैं। ११७३ के महाराज लक्ष्मणसेन के सभापण्डित कवि धोयी ने जिनकी चर्चा जयदेव ने धोयीकविक्ष्मापतिः कहकर की है, अपने को वररुचि के तुल्य प्रशंसित बतलाते हुए वररुचि की चर्चा की है— “ख्यातो यश्च श्रुतधरतया विक्रमादित्यगोष्ठी- विद्याभर्तुः खलु वररुचेराससाद प्रतिष्ठाम् ॥” कथासरित्सागर में वररुचि को सकृच्छ्रुतधर कहा गया है। जिनप्रभसूरि विरचित विविधतीर्थकल्प ग्रन्थ की अनुश्रुति के अनुसार सिद्धसेन दिवाकर के आज्ञानुसार वररुचि ने विक्रमादित्य की शासनपट्टिका (जिसमें विक्रमादित्य के शासन सिद्धान्त का निर्देश है) विक्रम प्रथम संवत् के चैत्रशुक्ल प्रतिपदा तिथि में लिखी है। जिनप्रभ ने स्वयं उसे देखा था। कात्यायन ही वररुचि हैं। वे स्वयं पत्रकौमुदी ग्रन्थ में लिखते हैं— “विक्रमादित्यभूपस्य कीर्तिसिद्धेर्निदेशतः । श्रीमान् वररुचिर्धीमान् तनोति पत्रकौमुदीम् ॥” विक्रमसभा के नवरत्नों में ८वें वराहमिहिर हैं। प्रसिद्ध पञ्चतन्त्र नीति ग्रन्थ का पारसी भाषा में अनुवाद ईसा की पाँचवीं शती में हुआ है, यह निर्विवाद है। उस पञ्चतन्त्र में मित्रभेद-प्रसङ्ग में वराहमिहिर का नाम ग्रहणपूर्वक उनके चार श्लोक उद्धृत हैं। “रोहिणीशकटमर्कनन्दनश्चेद् भिनत्ति रुधिरोऽथवा शशी । किं वदामि तदनिष्टसागरे सर्वलोक उपयाति संक्षयम् ॥” इत्यादि । ग्रन्थ खण्डखाद्य की आमराजकृत टीका में लिखा है— “नवाधिकपञ्चशतसंख्याके शके वराहमिहिरो दिवं गतः ।” अर्थात् ५०९ शक संवत्सर में वराहमिहिर स्वर्ग चले गये। यदि इस वाक्य के शक का अर्थ प्रचलित शक संवत्सर गृहीत है तब तो ५८७ ईसवीय वर्ष में उनकी मृत्यु मानना होगा। ऐसी स्थिति में ईसा की पाँचवी शती में पारसी भाषा में अनूदित पञ्चतन्त्र में वराहमिहिर का नाम कैसे आ सकता था। मूल पञ्चतन्त्र जिसका पाँचवीं ईसवी में पारसी भाषा में अनुवाद हुआ था और भी प्राचीन सिद्ध होता है। फिर उसमें ईसा की छठी शती में मृत वराह- मिहिर का नाम कैसे आ सकता है ? अतः यही विदित होता है कि वर्तमान शक संवत्सर से भिन्न कोई शक संवत्सर ईसा से पूर्व ही प्रचलित था । शक शब्द से संवत्सर ही गृहीत है । शकविशेष नहीं। उसी का उल्लेख खण्डखाद्य की टीका में किया गया है। वराहमिहिर ने भी अपने बृहत्संहिता ग्रन्थ में उसका उल्लेख किया है । “आसन् मघासु मुनयः शासति पृथिवीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्ञश्च ॥” (बृ० सं० १३।३) अर्थात् प्रस्तुत महाराज युधिष्ठिर का समय क्या है ? इस जिज्ञासा का उत्तर देते हुए वराहमिहिर ने कहा था कि शककाल में २५२६ संख्या जोड़ देने से युधिष्ठिर का काल निकल आता है। २०२९ विक्रम संवत्सर बीतने

पर युधिष्ठिर शक या कलिगत संवत् ५०७३ होता है। इस समय से २५४७ वर्ष पूर्व विक्रम संवत्सर आरम्भ से ५१८ वर्ष पूर्व ईसवीय सन् से ५७५ वर्ष पूर्व किसी शक संवत्सर की प्रवृत्ति वराहमिहिराचार्य को मान्य है। इस दृष्टि से स्पष्ट हो जाता है कि वराहमिहिर की स्थिति का काल ईसा की पांचवीं या छठी शती नहीं है। किन्तु ईसा के जन्म से पूर्व विक्रम एवं कालिदास की स्थिति का काल ही उनकी स्थिति का काल है। उसी काल का संकेत खाद्यखण्ड टीका में है। उस शक संवत्सर के अनुसार ४०९ में वराहमिहिर स्वर्गवासी हुए थे। युधिष्ठिरशासन के समय सप्तर्षि मघा पर थे। इसका समर्थक वृद्धगर्ग का भी वचन है, जिसका उद्धरण भट्टोत्पल ने बृहत्संहिता की टीका में किया है— “कलिद्वापरसन्धौ तु स्थितास्ते पितृदैवतम्। मुनयो धर्मनिरताः प्रजानां पालने रताः॥ एकैकस्मिन्नृक्षे शतं शतं ते चरन्ति वर्षाणाम्।” बृहत्संहिता १३।४) इस वचन से एक-एक नक्षत्र पर सप्तर्षियों की स्थिति सौ-सौ वर्ष रहती है। श्रीमद्भागवत में भी इसी का समर्थन है— “ते त्वदीये द्विजाः काले अधुना चाश्रिता मघाः ।” (भाग० १२।२।२८) हे राजन् परीक्षित्, तुम्हारे जन्म के समय और अब मृत्यु के समय भी सप्तर्षि मघा पर ही हैं। राजा सुधन्वा के दानपत्र से (संस्कृतचन्द्रिका खण्ड १-३) तथा राजा सर्वजित् वर्मा के दानपत्र से (संस्कृतचन्द्रिका खण्ड १४ संख्या २-२) और पञ्चाङ्गों की प्रचलित अविच्छिन्न परम्परा के अनुसार भी युधिष्ठिर संवत् और कलि संवत् का ऐक्य ही सिद्ध होता है। पीछे कहा गया है कि ईसवी सन् से ५७५ वर्ष पूर्व कोई शक संवत्सर आरम्भ हुआ था उसमें २५२६ जोड़ने से ३१०१ होता है। वराहमिहिर और आमराज ने उसी संवत् की चर्चा की है। इस शक शब्द से बहुतों को प्रचलित शक संवत्सर का ही भ्रम हुआ है। कल्हण को भी उसी से भ्रम हुआ है। इस लिए उन्होंने ६५३ वर्ष काल घटाकर पाण्डवकाल घोषित किया था। पञ्चसिद्धान्तिका में वराहमिहिर ने उसका निर्माण-काल निम्नोक्त कहा है— “सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ । अर्धास्तमिते भानौ यवनपुरे सौम्यदिवसाद्यः ॥” अर्थात् शक काल में ४२७ घटाने पर चैत्र शुक्ल १ प्रतिपदा को बुधवासर था, भानु का अर्ध अस्तंगमन हो रहा था, भारत में अर्धोदय हो रहा था इस समय इसका निर्माण प्रारम्भ हुआ है। पं० सुधाकर द्विवेदी ने शक शब्द से शालिवाहन शक ग्रहण कर के देखा तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को बुधवार नहीं मिला तब उन्होंने सौम्य का अर्थ सोमवार ग्रहण किया है। इस तरह वराहमिहिर के शब्द का उन्हें परिवर्तन करना पड़ा। परन्तु मद्रास के प्रसिद्ध गणितवेत्ता श्रीवेङ्कटाचार्य ने अपने ‘दी एण्टी क्यूटी ऑफ हिन्दू एस्ट्रोनोमी एण्ड दी तामिल’ ग्रन्थ में ईसवी सन् पूर्वभावी शक को ही शक शब्द से लेकर गणना करके यह घोषित किया है कि ४२७ वर्ष व्यवकलन करने (घटाने) पर अर्थात् ईसा सन् के प्रारम्भ से १२४ वर्ष पूर्व ३ मार्च बुधवार को शुक्लप्रतिपदा थी और उस समय यवनपुर में सूर्य का अर्धास्तगमन भी होता था। अलबरूनी ने भी ३२७ शक काल में पञ्चसिद्धान्तिका का निर्माण माना है। परन्तु यह शक विक्रम संवत् के पूर्व का है। जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। ११०

८७४ रामायणमीमांसा द्वाविंश ८८७ प्रचलित शकाब्द के भट्टोत्पल ने वराहमिहिर के ग्रन्थों पर विवृत्ति लिखी है। उसमें उन्होंने किसी यवनेश्वर का मत लिखा है। “यवनेश्वरेण स्फुजिध्वजेनान्यच्छास्त्रं कृतम्। तथा च स्फुजिध्वजः गतेन साम्यर्धशतेन युक्ता- प्यङ्केन वेषां न गताब्दसंख्याकालः शकानां १०४४ संविशोध्य तस्मादतीतवर्षाद् युगवर्ष जातम्। एवं स्फुजिध्वजकृतं शककालस्यार्वाग् ज्ञायते।।” इससे यह स्पष्ट विदित होता है कि स्फुजिध्वज का समय उन्होंने नहीं लिखा तथापि भट्टोत्पल से अति प्राचीन स्फुजिध्वज थे। उनके समय में किसी शक के १०४४ शकाब्द व्यतीत हुए थे। अतः ईसा के पूर्व कई शकाब्द थे। उनमें से ही एक वराहमिहिर द्वारा निर्दिष्ट काल है। जिसके अनुसार वराहमिहिर ने युधिष्ठिर की स्थिति बतायी है। श्रीशङ्करबालकृष्ण दीक्षित ने रघुनाथ टेंभुकर द्वारा परम्पराप्राप्त एक श्लोक अपने ( भारतीय ज्योतिष ) ग्रन्थ पृष्ठ २९४ में उद्धृत किया है— “स्वस्तिश्रीनृपसूर्यसूनुजशके याते द्विवेदाम्बर- त्रेमानाब्दमिते त्वनेहसि जये वर्षे वसन्तादिके। चैत्रे श्वेतदले शुभे वसुतिथावादित्यदासाद्भूद् वेदाङ्गे निपुणो वराहमिहिरो विप्रो रवेराशिषा॥” अर्थात् सूर्यपुत्र धर्म उनके पुत्र राजा युधिष्ठिर संवत् ३०४२ वर्ष बीतने पर जय नाम संवत् के चैत्र शुक्ल ८मी को सूर्य के आशीर्वाद से आदित्यदास नामक विप्र से वेदवेदाङ्गनिपुण वराहमिहिर उत्पन्न हुए। वराहमिहिर दीर्घायु थे अतएव ईस्वी सन् प्रारम्भ से १४८ वर्ष पूर्व उन्होंने पञ्चसिद्धान्तिका लिखी। बीच में अन्य अनेक ग्रन्थ लिखे। वे ई० ५७ पूर्व विक्रमादित्य सिंहासनारोहण के पश्चात् उनकी सभा के रत्नरूप में थे। आज भी रूस आदि देशों में १५०, २०० वर्ष की आयुवाले लोग मिलते हैं। वराहमिहिर की स्थिति दीर्घकाल तक रही हो, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। पुष्यमित्र के पुरोहित पतञ्जलि महाभाष्य में किसी प्राचीन नाटक का श्लोक उद्धृत करते हैं— “यस्मिन् दशसहस्राणि पुत्रे जाते गवां ददौ। ब्राह्मणेभ्यः प्रियाख्येभ्यः सोऽयमुञ्छेन जीवति॥” यह श्लोक “यस्मिञ्जाते ददौ द्रोणो गवां दशशतं धनम्। ब्राह्मणेभ्यो महार्हेभ्यः सोऽश्वत्थामैष गर्जति॥” द्रोणपर्व १९६।२९ वें श्लोक से मिलता है। ३।३।१६७ पा० सू० में 'कालः पचति भूतानि' श्लोक उद्धृत है, जो महाभारत आदि पर्व १।२४८ में है- “कालः पचति भूतानि कालः संहरति प्रजाः।” चरक संहिता का तीसरा अध्याय दृढ़बल से पूर्व का है। यह पतञ्जलि से भी पहले का है, इसमें विष्णु- सहस्रनाम के पाठ का विधान है। “विष्णुं सहस्रमूर्धानं चराचरपति विभुम्। स्तुवन्नामसहस्रेण ज्वरान् सर्वान् व्यपोहति॥४।२॥

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७५ चक्रपाणि आदि टीकाकारों ने लिखा है यह सहस्रनाम भारत में है । विष्णुसहस्रनाम में 'रामो विरामो विरतः' राम का नाम आता है । फलतः राम और रामायण आदि प्राचीन हैं । विष्णुगुप्त (कौटिल्य) के अर्थशास्त्र में महाभारत की छायावाले श्लोक हैं— “एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्को धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्रं सराजकम् ॥” ( उद्योग पर्व ३३।४२ ) “एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुः क्षिप्तो धनुष्मता । प्राज्ञेन तु मतिः क्षिप्ता हन्याद् गर्भगतानपि ॥३२४॥” ( अर्थशास्त्र १०।६ ) पाणिनि इनसे पूर्व के हैं । वे सूत्र ६।२।३८ में महाभारत शब्दसिद्धि लिखते हैं । 'महान्व्रीहि-अपराह्न- गृष्टि-इष्वास····भार-भारत····रौरव प्रवृद्धेषु' सूत्र में महाभारत के महान् शब्द में प्रकृतिस्वर का विधान किया गया है । उसमें 'विष्वक्सेनार्जुनौ' २।२।३१, 'सात्यकि' २।४।५९, 'भीमभीष्म' ३।४।७४, 'जरत्कारु' ४।१।११२, 'गाण्डीव' २।४।३१, 'श्वाफल्कि' २।४।६२, 'रुक्मिणी' ४।१।१२३ आदि शब्दों की सिद्धि पाणिनि ने की है। इन सबका महाभारत से विशेष सम्बन्ध है । आश्वलायनगृह्यसूत्र में भारत तथा महाभारत दो नाम मिलते हैं ३।३।५ । ये शौनक शिष्य थे । शौनक महाभारतयुद्ध से ३०० वर्ष पश्चात् दीर्घ सत्र कर रहे थे । कौषीतकि गृ० सूत्र २।५।३ में महाभारत नाम पठित है । इससे निश्चित होता है कि कौरव और पाण्डवों के युद्ध के पश्चात् ३०० वर्ष के भीतर महाभारत नाम प्रख्यात था । आन्ध्र और गुप्त काल के शिलालेखों में महाभारत काल के अनेक व्यक्तियों का स्मरण किया गया है । इससे स्पष्ट है कि उस समय के पण्डित महाभारत के इतिहास में विश्वस्त थे । वेबर आदि महाभारत में यवन शब्द का प्रयोग देखकर सिकन्दर के आगमन के बाद का महाभारत समझते हैं । पर यह भ्रान्ति है । क्योंकि यवन शब्द यूनानियों के अर्थ में प्रयुक्त नहीं, किन्तु मनु १०।४३,४४ से मालूम पड़ता है वे कभी आर्य ही थे । कालान्तर में यवन आदि बन गये । अतएव देवकीपुत्र कृष्ण में कारुमान् यवन को मारा था । अतएव यवन शब्द के आधार पर अष्टाध्यायी और मनुस्मृति का कालनिर्णय करना सर्वथा असंगत है । महाभारत में अर्थशास्त्र या राजशास्त्र के अनेक आचार्यों की चर्चा है । “बृहस्पतिर्हि भगवान् न्याय्यं धर्मं प्रशंसति । विशालाक्षश्च भगवान् काव्यश्चैव महातपाः ॥ सहस्राक्षो महेन्द्रश्च तथा प्राचेतसो मनुः । भरद्वाजश्च भगवान् तथा गौरशिरा मुनिः ॥ राजशास्त्रप्रणेतारो ब्रह्मण्या ब्रह्मवादिनः ।” ( म० भा० शा० ५८ ) इसी प्रकार महाभारत में वाल्मीकि के श्लोकों का भी उद्धरण है— “श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना । आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत ॥ राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ॥” ४१ ( शा० ५७ ) “प्राचेतसेन मुनिना श्लोको चेमावुदाहृतौ । राजधर्मेषु राजेन्द्र तदिहैकमनाः शृणु ॥४३॥

८७६ रामायणमीमांसा द्वाविंश षडेतान् पुरुषो जह्याद् भिन्नां नावमिवार्णवे । अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥४४॥ अरक्षितारं राजानं भार्या चाप्रियवादिनीम् । ग्रामकामञ्च गोपालं वनकामञ्च नापितम् ॥४५॥ (शा० ५७) “सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा । पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव तत्।।” (शा० १४३।६७, ६८) इस तरह महाभारत में प्राचीन विशिष्ट पुरुषों का वर्णन है। आधुनिक व्यक्तियों का उल्लेख नहीं है। अतः महाभारत की प्राचीनता सिद्ध है। भास कवि के बालचरित नाटक में कृष्ण की बालकीड़ाओं का वर्णन है। गोपियों का भी उल्लेख है। इससे निःसन्देह सिद्ध होता है कि भास से पहले ही महाभारत एवं हरिवंश की कथाएँ खूब प्रचलित थीं। भास के नाटकों के प्रकाशक गणपति शास्त्री ने स्वप्नवासवदत्त नाटक की भूमिका में लिखा है कि भास के नाटक का एक श्लोक कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उद्धृत है। इससे भास चाणक्य से भी प्राचीन सिद्ध होते हैं। कुछ जैनों के अनुसार महावीर स्वामी विक्रम संवत् से ४०७ वर्ष पूर्व के हैं। महावीर स्वामी ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र को मिथ्या शास्त्र कहा है। इससे कौटिल्य उनसे भी पूर्व के सिद्ध होते हैं। प्रो० वेबर ने सन् १८६० में जर्मनी देश में अश्वघोष-व्याख्या सहित वज्रसूचिकोपनिषद् प्रकाशित किया था। उस व्याख्या में ‘सप्त व्याधा दशार्णेषु’ श्लोक उद्धृत है। जो कि हरिवंश २४।२०,२१ शान्ति पर्व का है। अतः अश्वघोष के समय महाभारत एवं हरिवंश प्रख्यात थे। बौधायनगृह्यसूत्र में विष्णुसहस्रनामस्तव का उल्लेख है तथा गीता के ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयम्’ इस श्लोक का उद्धरण है। इससे ईस्वीय सन् से अति प्राचीन बौधायन से भी प्राचीन महाभारत सिद्ध होता है। इस तरह अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग सभी परीक्षाओं से लक्षश्लोकात्मक महाभारत पाँच हजार वर्ष प्राचीन सिद्ध होता है। ५०७३ वर्ष पूर्व कृष्ण का लीलासंवरण हुआ। वर्तमान कल्पारम्भ से अब तक १९७२९४९०७३ एवं सृष्ट्यारम्भ से अब तक १९५५८८५०७३ वर्ष व्यतीत हुए हैं। इतने समय में ६ मनु बीत गये। सप्तम वैवस्वत मनु के २७ महायुग व्यतीत हो गये। २८ वें महायुग के तीन युग बीत गये। चतुर्थ युग कलि के ५०७३ वर्ष बीत गये। यही युधिष्ठिर का संवत्सर है। विक्रमी प्रारम्भ से २०२९ तथा शकारम्भ से १८९४ वर्ष व्यतीत हुए हैं। “सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः ।” (पातञ्जल सू० २।४२) के व्यासभाष्य में एक वचन उद्धृत है— “यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥” यह श्लोक महाभारत शा० प० १०४।१४६; १७७।५२ में मिलता है। धर्मराज युधिष्ठिर के प्रपौत्र महा- राज जनमेजय का ताम्र शासनपत्र सबसे बड़ा प्रमाण है। उसकी प्रतिलिपि सन् १८७५ नवम्बर में मुद्रित इण्डियन एण्टिक्वेरी पुस्तक में निम्नरूप में है— श्रीगणाधिपतये नमः । “पान्तु नो जलदश्यामाः शार्ङ्गं ज्याघातकर्कशाः । त्रैलोक्यमण्डपस्तम्भाश्चत्वारो हरिबाहवः ॥”

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७७ स्वस्ति श्रीजयाभ्युदये युधिष्ठिरशके प्लवङ्गाख्ये एकोननवतित्संवत्सरे सहस्य (पौष) मासे अमावश्यायां सोम्यवासरे श्रीमन्महाराजाधिराजपरमेश्वरो वीरप्रतापशाली कुरुकुलोद्भवो वैयाघ्रपाद- गोत्रजः श्रीजनमेजयभूपः किष्किन्धानगर्यां सिंहासनस्थः सकलवर्णाश्रमधर्मप्रतिपालकः पश्चिमदेशस्थ- सीतापुरकेदारक्षेत्रे तत्रत्यमुनिवृन्दमठस्य गरुड़वाहनतीर्थश्रीमद्शिष्यकैकयनाथैराराधितसीतारामस्य पूजार्थं कृतभूदानसाधनमस्मत्प्रपितामहयुधिष्ठिराधिष्ठितमुनिवृन्दक्षेत्रेऽस्मिन् चतुःसीमापरमितिक्रमः पूर्वभागे उत्तरवाहिन्याः तुङ्गभद्रायाः पश्चिमे दक्षिणभागे अगस्त्याश्रमसंगमादुत्तरे पश्चिमे पाषाणनद्याः पूर्वे उत्तरभागे भिन्ननद्या दक्षिणे एतन्मध्यस्थमुनिवृन्दक्षेत्रे भवच्छिष्यपरम्परया आचन्द्रार्कपर्यन्तं निधिनिक्षेप-जल-पाषाण-अक्षिणी आगामिसिद्धसाध्यतेजःस्वाम्यसहितं स्वबुद्ध्यनुकूलेन अस्मन्मातापित्रोः विष्णुलोकप्राप्त्यर्थं हरिहरसन्निधौ उपरागसमये सहिरण्येन तुङ्गभद्राजलधारापूर्वकं क्षेत्रं यतिहस्ते दत्तवानस्मि। एतद्धर्मसाधनस्य साक्षिणः आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ।। दानपालनयोर्मध्ये दानाच्छ्रेयोऽनुपालनम् । दानात्स्वर्गमवाप्नोति पालनादच्युतं पदम् । स्वदत्ताद् द्विगुणं पुण्यं परदत्तानुपालनम् । परदत्तापहारेण स्वदत्तं निष्फलं भवेत् । स्वदत्ता पुत्रिका ज्ञेया पितृदत्ता सहोदरा । अन्यदत्ता तु जननी दत्तभूमि परित्यजेत् । अन्येस्तु छर्दितं शूद्रैः श्वभिश्च छर्दितं ननु । ततः कष्टस्ततो नीचः स्वयं दत्तापहारकः । स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्ति हरेच्च यः । षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः ।। इति ।। उक्त ताम्रपत्र जनमेजय राजा का है। उसमें कृष्ण की वन्दना करके युधिष्ठिर शक प्लवङ्गम संवत् में नवासी वर्ष में सहस्य मास (पौष मास) अमावस्या सौम्य वासर के दिन वैयाघ्रपादगोत्रज कुरुकुलोद्भव राजा जनमेजय ने किष्किन्धा नगरी में सिंहासनस्थ होकर तुङ्गभद्रा अगस्त्याश्रम आदि अमुक अमुक तीर्थ सीमायुक्त हिरण्यसहित भूक्षेत्र का दान किया आदि आदि । इसमें जनमेजय द्वारा सीताराम की पूजा के लिए भूक्षेत्र का दान कहा गया है। सुतरां सीताराम-पूजा ईसा से हजारों वर्ष पूर्व से प्रचलित सिद्ध होती है, अतः बुल्के का यह कहना निराधार ही है कि ई० पू० पहली या दूसरी शती में राम की पूजा होने लगी थी। कुछ लोग कहते हैं प्लवङ्गम संवत्सर सहित उक्त योग अब से पहले तेरहवीं शती में आया था, अतः वही महाभारत का समय है। परन्तु वाराणसेय राजकीय संस्कृत महाविद्यालयीय गणिताध्यापक बापूदेव शास्त्री ने उस मत का निराकरण कर के ताम्रशासन का काल ही निर्धारित किया है। उपर्युक्त अनेक उद्धरणों, शिलालेखों एवं ताम्रलेखों से २०२९ वर्तमान विक्रमीय संवत्सर से ३०४४ वर्ष पूर्व ५०७३ कलि संवत्सर युधिष्ठिर संवत् सिद्ध है। धृतराष्ट्र के मरणोपरान्त युधिष्ठिर के राज्यकाल में महाभारत का निर्माण हो चुका था। गीता तो इससे भी पहले युद्धारम्भ के दिन ही प्रकट हुई थी। महाभारत तथा गीता में चर्चित राम एवं उनके समय का ही रामायणग्रन्थ अति प्राचीन सिद्ध होते हैं। तथा च पाश्चात्यों की यह कल्पना अत्यन्त असंगत है कि बुद्ध के पश्चात् ईसा से पूर्व तीसरी शती में रामायण का निर्माण हुआ है। पुराणों के आधार पर भी रामायण एवं राम की अतिप्राचीनता सिद्ध होती है— "द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके । प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मथुरायां भविष्यति ।। (म० भा० शा० ३२९।८९) द्वापर और कलि की सन्धि में कंसवधार्थ मथुरा में कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ है। इस वचन से कृष्ण का भी आविर्भाव काल वही सिद्ध होता है।

८७८ रामायणमीमांसा द्वाविंश चालुक्यवंशीय महाराज पुलकेशिन द्वितीय के बीजापुर एहोल नामक पर्वतीय क्षेत्र में स्थित जैनमन्दिर में उत्कीर्ण शिलालेख से भी महाभारत-संग्राम का यही समय सिद्ध होता है। शिलालेख के श्लोक निम्नोक्त हैं— “त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः । सप्ताब्दशतयुक्तेषु गतेष्वब्देषु पञ्चसु ॥ पञ्चाशत्सु कलौ काले षट्सु पञ्चशतीषु च । समासु समतीतासु शकानामपि भूभुजाम् ॥” अर्थात् महाभारत युद्ध से ३७३५ वर्ष बीतने पर तथा कलि में शक राजाओं-के ५५६ वर्ष बीतने पर यह शिलालेख उत्कीर्ण हुआ है। जो आज से १३५८ वर्ष पूर्वका हैं। ३७३५ में १३३८ मिला लेने पर ५०७३ वर्ष पूर्व भारत-युद्ध का होना सिद्ध होता है। आश्चर्य है कि इस प्रकार समस्त प्राचीन भारतीय साहित्यकार, रामायण तथा महाभारत को वाल्मीकि और व्यासकृत मानते हैं किन्तु कुछ पाश्चात्य तथा उनके अनुयायी अपना हठ नहीं छोड़ते । पुराणों की मान्यता नवीं शताब्दी में मेधातिथि लिखते हैं 'पुराणानि व्यासादिप्रणीतानि' (३।२२२) । ६८७ के ऋग्भाष्यकार स्कन्दस्वामी पुराणों का उद्धरण करते हैं—१।२०।७ पुराणेषु प्रसिद्धम्, (१।२५।१३), पौराणिकाः कक्षीवन्तमङ्गिरसं स्मरन्ति (१।११६।७) । सांख्यकारिका २२ के भाष्य में गौडपादाचार्य पुराणों का उल्लेख करते हैं। दुर्गाचार्य वसिष्ठोत्पत्ति की कथा देकर कहते हैं—इति पुराणे श्रूयते (निरुक्त ५।१४) । यह कथा मत्स्यपुराण (२०।२३-२९) में मिलती है । विक्रम १ श० वररुचि 'निरुक्तसमुच्चय' में कहते हैं—'तथा चाहुः पौराणिकाः ।' न्यायभाष्यकार वात्स्यायन पुरातन ब्राह्मण ग्रन्थ का वाक्य लिखते हैं और कहते हैं कि प्रमाणभूत ब्राह्मण से इतिहास और पुराण का प्रामाण्य सिद्ध होता है। जो ऋषि मन्त्र तथा ब्राह्मणों के द्रष्टा और प्रवक्ता हैं वे ही इतिहास-पुराण तथा धर्मशास्त्र के कर्त्ता हैं— “प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते । ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एनदितिहासपुराणमभ्यवदन् 'इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः' इति । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति ।” पतञ्जलि पुरातन वाङ्‌मय का परिगणन करते हुए पुराण और इतिहास की भी चर्चा करते हैं:— “वाकोवाक्यमितिहासः पुराणं वैद्यकमिति ।” कौटिल्य भी इन पुराणों का उल्लेख करते हैं 'इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रवित् ।' अ० ९६ । वह पौराणिक सूत और सारथि सूत में भेद भी करते हैं 'ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सूतः पौराणिकस्त्वन्यः सूतो मागधश्च ब्रह्मक्षत्राद्विशेषतः ।' पौराणिक सूत अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने से विशिष्ट है (अध्याय ६४) । याज्ञवल्क्य उनसे भी प्राचीन हैं। वे भी पुराणों को जानते हैं— “पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानाम् ।”( १।३ ) गौतमधर्मसूत्रभाष्यकार मस्करी सूत्र १।३९ में कण्वधर्मसूत्र का एक वचन देता है 'अथर्ववेदेतिहास- पुराणानि ध्यायन्' इससे प्रतीत होता है—कण्वसूत्रकार को पुराण विदित थे । गौतमध० सू० ८।६ और ११।२१ में पुराणशब्द मिलता है ।

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८७९ आपस्तम्बधर्मसूत्र १।६।१९।१३।१४ पुराण के दो श्लोक उद्धृत हैं । यह कहा ही गया है कि सर्वप्राचीन मनु ने भी इतिहास-पुराण को श्राद्ध में श्रवण करना कहा है । चरकसंहिता के शारीरस्थान ४।४४ में 'श्लोका- ख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलम्' उल्लेख है। यह बुद्ध से बहुत पहले का है। आरण्यकों और ब्राह्मणों में भी पुराण शब्द है । 'ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् नाराशंसीः' (तै० आ० २।९) । "तानुपदिशति पुराणं वेदः सोऽयमिति सोऽयमिति किञ्चित् पुराणमाचक्षीत ।” ( श० ब्रा० ११।४।३।१३ ) । पराशरज्योतिषसंहिता में "वेदवेदाङ्गेतिहासपुराणशास्त्रावदातम् ।” पुराण इतिहास की चर्चा है । वा० रा० बालकाण्ड अ० २ "नरेन्द्र श्रूयतां तावत् पुराणे यन्मया श्रुतम्” ।।५।। अथर्ववेद ( १५।३०१) में अनेक विद्याओं के साथ पुराणों का भी वर्णन है । तमितिहासं पुराणं च ऋचः सामानिच्छन्दांसि । पुराणं यजुषा सह उच्छिष्टाज्जज्ञिरे तस्माद्दिवि देवाः ।। प्रसिद्ध ऐतिहासिक अलवेरूनी सं० १०८७, १८ पुराणों की स्वल्पभेदवाली दो सूचियाँ देता है। राजशेखर ९९७ काव्यमीमांसा अ० २ में कहता है 'तत्र वेदार्थानोपनिबन्धनप्रायं पुराण- मष्टादशधा ।' बालभारत में “राजशेखर अष्टादशपुराणसारसंग्रहकारिन् ।” (पृ० ४) गौतमधर्मसूत्रमस्करीभाष्य ( ८।६) 'पुराणं ब्रह्माण्डादि' । वाचस्पतिमिश्र ८०८ योगभाष्य टीका में विष्णुपुराण २।३२—५२।५४ में और १।१९-२५, ४।१ में वायुपुराण की चर्चा करते हैं । आद्यशङ्कराचार्य विष्णुसहस्रनामभाष्य में भविष्योत्तरपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण तथा पद्मपुराण की चर्चा करते हैं । ६३७ संवत् के बाणभट्ट ने हर्षचरित में लिखा है 'पवनप्रोक्तं पुराणं पपाठ । महाभारत के वनपर्व ( १९४।१९ ) में वायुप्रोक्त पुराण का उल्लेख है । महाभारत दा० पा० में पुराणविदों की दाशरथिरामविषयक गाथाएँ उद्धृत हैं । ये गाथाएँ वायुपुराण ( ८८।१९६ ) में हैं । कुमारिल ने तन्त्रवार्तिक १।३ में पुराणप्रामाण्य कहा हैं । सांख्यकारिका माठरवृत्ति ( १२।० ) में पुराण- वर्णित भविष्य, कलिक का उल्लेख है । योगभाष्य ( ३।२३ ) का एक वचन न्यायवार्तिक एवं न्यायभाष्य ( १।६ ) में मिलता है— “यस्मिन् परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम् ।” महाभाष्यकार ने भी लिखा है-- “तदपि नित्यं यस्मिन् तत्त्वं न विहन्यते ।” “स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात् स्वाध्यायमासते । स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥” यहाँ वाचस्पतिमिश्र कहते हैं 'वैयासिकीं गाथामुदाहरति' यह वचन विष्णुपुराण ( ६।६।२) में मिलता है । बाण हर्षचरित में पुरूरवा के मरने की एक कथा लिखते हैं । सुबन्धु की वासवदत्ता, अश्वघोष का बुद्धचरित तथा कौटिल्य भी इसका संकेत करते हैं । यह कथा वायुपुराण में मिलती है । “पुरूरवा ब्राह्मणधनतृष्णया विननाश ।” ( वायु० पु० ३।२०-२३ ) पाश्चात्यों ने अर्थशास्त्र को ई० ३री शती का माना है । वस्तुतः वे मौर्य सम्राट् चन्द्रगुप्त के महामात्य थे । ई० सन् पूर्व के थे । दण्डी ने दशकुमारचरित में कहा है विष्णुगुप्त ने ६००० श्लोकों के परिमाण में अर्थशास्त्र रचा—

“आचार्यविष्णुगुप्तेन मौर्यार्थे षड्भिः श्लोकसहस्रैः संक्षिप्ता।” वात्स्यायन न्यायभाष्य में अर्थशास्त्र का वचन उद्धृत करते हैं— “पदसमूहो वाक्यमर्थसमाप्तौ” (अ० शा० अध्या० २१) । न्यायभाष्य (२।१।५४) में लिखा है— “पदसमूहो वाक्यमर्थसमाप्ताविति ।” न्यायभाष्य १।१।१ में लिखा है— “प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तितः ॥” ठीक यही श्लोक अर्थशास्त्र के विद्यासमुद्देश प्रकरण में मिलता है । न्यायवार्तिक का काल वि० २य शती से पहले का है । न्यायभाष्य विक्रम १ श० पूर्व का है । अर्थशास्त्र वि० पू० ३ श० का है । क्षमाकल्याण के दीपमालाकल्प में निर्वाण संवत् ५०९ कल्कि का होना लिखा है । नेमिचन्द्र अपने तिलो- सार ग्रन्थ में निर्वाण संवत् १००० कल्कि को मानता है । इस भेद का कारण परम्पराविच्छेद ही है । महावीरजी का निर्वाण बहुत पुराने काल की बात है । जैन भिक्षु उस काल को भूल गये । विक्रम सं० ४७० यह विवरण नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग १० अंक ४ में मिलता है । यह विवरण मुनि कल्याणविजय का है । बौद्धपरम्परा ह्वेनसांग, जो नालन्दा विश्वविद्यालय में वर्षों पढ़ता था, जिसने अनेक बौद्ध आचार्यों का साक्षात्कार किया था, उसके काल से बौद्धनिर्वाणकाल १२००, १३००, १५०२ और ९०० से १००० वर्ष पूर्व तक का काल भिन्न-भिन्न विद्वान् मानते हैं । हिन्दी अनुवाद पृष्ट ३०४ तथा शमनह्वोली कृत ह्वेनसांग का जीवनचरित, एसवील का अंग्रेजी अनुवाद सन् १९१४ पृ० ९८ बुद्धनिर्वाण काल के विषय में सन् ४०१ से लेकर कई वर्ष तक भारत में भ्रमण करनेवाले फाह्यान कहता हैं मूर्ति की स्थापना बुद्धदेव के परिनिर्वाणकाल से ३०० वर्ष पीछे हुई है । उस समय देश में चाववंशी महाराजा पुङ्ग का राज्य था । (हिन्दी अनुवाद पृ० १६ अनुवादक की टिप्पणी यों है पुङ्ग का शासन काल ७५०-७१९ तक ई० पू० था ।) अर्थात् बुद्धनिर्वाण ई० पू० ११वीं श० अधिक से अधिक ई० से १०९० वर्ष पूर्व हुआ । सिंहल देश को उपलब्ध परम्परा के अनुसार बुद्धनिर्वाण की तिथि और ही है । तत्त्वसंग्रह की भूमिका में पाश्चात्य लेखकों ने सब मतों को छोड़कर उसे ही प्रधानता दी है । जब बौद्ध सम्प्रदाय में अपने धर्मप्रवर्तक के काल के विषय में इतने मत हैं, तब अन्य ऐतिहासिक विषयों में उनका प्रामाण्य कितना हो सकता है ? इसी लिए तो दशरथजातक में सीता को राम की भगिनी कहा है । धम्मपद की टीका में वासवदत्ता को चन्द्रमहासेन की भगिनी कहा है अर्थात् इन बौद्ध ग्रन्थों का सर्वथा प्रामाण्य कहना कठिन है । वेदों में रामायणसम्बन्धी व्यक्तियों का उल्लेख “चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः” ऋ० १।१२६।४ में दशरथ का उल्लेख है । अथर्ववेद १०।२।२८ “देवानां पूरयोध्या ।” में अयोध्या राजधानी का वर्णन है । “नीचीनवारं वरुणः कबन्धं प्र ससर्ज” ऋ० सं० ५।८५।३ में कबन्ध तथा “स इहासं तु वीरवं प्रतिदंनपषडक्षं त्रिशीर्षाणम् ॥” ऋ० १०।९९।६ में त्रिशिरा का वर्णन है ।

अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८८१ “ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः । स सोमं प्रथमः पपौ स चकार रसं विषम् ॥” ( अथ० सं० ४।६।१ ) में दसमुख रावण का वर्णन है— “इन्द्रः सीतां निगृह्णातु” (ऋ०सं० ४।५७), “घृतेन सीता मधुना समक्ता” (अथ०सं० ३।१७।९) में सीता का वर्णन है । “अघो रामो सवित्रिः” ( यजुःस० २९।५९ ) सवितृकुल के राम का वर्णन है । “भद्रो भद्रया सचमान आगात्” ( ऋ० सं० १०।२।३ ) मे रामभद्र का उल्लेख है । वेदों में राम के पूर्वजों का संकेत निम्नोक्त प्रकार से मिलता है— “मनुर्वे यत्किञ्चावदत् तद् भेषजमेवावदत् ।” ( का० सं० ११।५।४९ ) मनु की उक्ति को भेषज तुल्य कहा गया है । “यं त्वा वेद इक्ष्वाको” (अथ०सं० १९।३९।९) तथा “ईज इक्ष्वाको राज” (श० ब्रा० १३।५।४। ९५) में इक्ष्वाकु की चर्चा है । “सुद्युम्नो द्युम्नः यजमानाय धेहि” (मैत्रायणीसं० १।२।१९) में सुद्युम्न की चर्चा है । “विश्वामित्रो यदव हते सुदासम्” (ऋ० सं० ३।५३।९) में सुदास की चर्चा है। “षष्टि सहस्रानवति च कोरम् ।” (अथ०सं० २०११२७।१) में सगर के साठ हजार पुत्रों का संकेत है । “रघुः श्येनः पतयत् ।” (ऋ० सं० ५।४५।९) में रघु का संकेत है । “अथ किमेतैर्वाऽपरेऽन्ये महाधनुर्धराश्चक्रवर्तिनः केचित् सुद्युम्न-भूरिद्युम्नेन्द्रद्युम्नकुवलयाश्व- यौवनाश्व-वध्यश्वाश्वपति-शशबिन्दुहरिश्चन्द्रऽम्बरीषो ननक्तुः शर्यातिर्ययातिरनरण्योऽश्वसेनादयोऽथ मरुत्तभरतप्रभृतयो राजानो मिषतो बन्धुवर्गस्य महतीं श्रियं त्यक्त्वाऽस्माल्लोकादमुं लोकं प्रयाताः” (मैत्रायणीयोपनिषद् अन्तिम आख्यायिका १।१४) में । “यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः । न चेत्पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः ॥ इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥” (वायुपु० १।२००, २०१) “जातमात्रं च यं वेदः उपतस्थे ससंग्रहः ।” (वायुपु० १।४३) “प्राजापत्या श्रुतिर्नित्या तद्विकल्पास्त्विमे स्मृताः । अनित्यभावाद् देवानां मन्त्रोत्पत्तिः पुनः पुनः ॥” (वायुपु० उपो० ६१।७५) जो चारों साङ्गवेदों को जानकर भी पुराणों को नहीं जानता वह विचक्षण नहीं होता है । अल्पश्रुत से वेद भयभीत होता है और यह समझता है कि यह अल्पश्रुत, अर्थ का अनर्थ कर, मुझपर प्रहार करेगा । भारतीय दृष्टिकोण से पैमाना—१८ निमेष की ( १ ) एक काष्ठा ३० काष्ठा की ( १ ) एक कला ३० कला का ( १ ) एक मुहूर्त ३० महर्त का ( १ ) एक अहोरात्र