रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ रामायणमीमांसा परिशिष्ट भूतशुद्धौ विशेषो यथा अथ भूतोपसंहारः— "पादाद्याजान्वम्बुजान्तां पीतां द्रुहिणदेवताम् । चतुरस्रां पञ्चगुणां ह्नां ह्रः फट् भुवं जले ॥” जान्वाद्या नाभिपद्मान्ताश्चेतदर्धेन्दुवैष्णवम् । रसरूपस्पर्शशब्दं वं ह्रीं ह्रः फट् जलं शुचौ ॥ नाभ्या हृदन्तं प्राद्युम्नं त्रिकोणं स्वस्तिकारुणम् । वह्नि रूपरसस्पर्शं रं ह्रूं ह्रः फट् समीरणे ॥ भ्रूपर्यन्तं हृदो वायोः षड्बिन्दु स्पर्शशब्दवत् । वृत्तं सांकर्षणं धूम्रं यं ह्रैं ह्रः फट् विहायसि ॥ भ्रूमध्याद् ब्रह्मरन्ध्रान्तं वासुदेवं सशब्दकम् । हं ह्लौं ह्रः फदहङ्कारे हं महत्सत्त्वके च तत् ॥ प्रकृतौ तां च रामाख्ये परे ब्रह्मणि संहरेत् ।” ॥ इति भूतोपसंहारः ॥ अथ भूतशुद्धिः— "शरीररूपभूतानां भूतानां यद्विशोधनम् । अव्यक्तब्रह्मसम्पर्काद् भूतशुद्धिरियं मता ॥” शरीररूप में परिणत भूतों का लयक्रम से अव्यक्त ब्रह्मरूपता सम्पादन द्वारा संशोधन ही भूतशुद्धि है । नित्य शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म की भावना करके मूलाज्ञान और उसके कारण उत्पन्न जन्मादि दुःखप्रद पापपुरुष को वामकुक्षि में भावना करनी चाहिये । पापपुरुष के सिर ब्रह्महत्या, भुजाएँ स्वर्णस्तेय, सुरापान हृदय, गुरुतल्पगमन कटि, तत्संसर्ग पाद एवं उपपातक रोम हैं । वह अत्यन्त क्रूर अतिभीषण काले वर्ण का है । उसकी आँखें और दाढ़ी लाल हैं । वह अचेतन है । उसका सिर नीचे की ओर है । उसने खड्ग और चर्म धारण कर रखे हैं । उसका चिन्तन करके— “महापातकपञ्चाङ्गं पातकोपाङ्गसंश्रयम् । उपपातकरोमाणं कृष्णं क्रूरातिभीषणम् ॥” वाम नासिका से पूरक करते हुए ‘यं’ वायुबीज से पापपुरुष का शोषण, ‘रं’ कुम्भक में उसका दहन और रेचक में ‘वं’ अमृतबीज से पीयूषप्रवाह में उस भस्म को प्लावित कर उसे बहिष्कृत कर देना चाहिये । वाग्बीज से या पञ्चमहाभूतबीज से पञ्चमहाभूतों का कारण में विलयन ही पापपुरुष के भस्म का प्लावन है । अखण्ड सच्चिदानन्द ब्रह्मरन्ध्रसहस्राब्ज में स्थित श्रीराम की प्रेरणा से वं बीज द्वारा महदादिक्रमेण पञ्चभूतों का उत्पादन कर दिव्यदेह निर्माण कर परमात्मस्वरूप के साथ एकीभूत जीवकला को हंसः सोहं मन्त्र से हृदय में स्थापित करना चाहिये । अथ प्राणप्रतिष्ठा—अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः ऋग्यजुःसामानि छन्दांसि अतिच्छन्दो वा छन्दः प्राणो देवता आं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रों कीलकम् प्राणप्रतिष्ठायां विनियोगः । ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि । ऋग्यजुःसामच्छन्दोभ्यो नमो मुखे । प्राणदेवतायै नमो हृदये । आं बीजाय नमो गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादयोः । क्रों कीलकाय नमो लिङ्गे ।