झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० झांसी की रानी
तात्या ने उत्तर दिया, बाईसाहब ये लोग अपने स्वार्थ पर अचलरूप से डटे रहते हैं। जब तक स्वार्थ पर ठोकर लगने का अन्देशा नही रहता तब तक हरिश्चन्द्र और युधिष्ठिर का सा बर्ताव करते हैं, परन्तु जहा देखते हैं कि स्वार्थ को धक्का लग जावेगा, तुरन्त पैंतरा बदल देते हैं। और इतने धूर्त हैं कि इनमे से कुछ न्याय करने करवाने का ढोंग बनाते हैं और दूसरे उसी ढोंग की ओट में स्वार्थ की सिद्धि करते हैं। जैसे, हेस्टिङ्गस ने अवध की बेगमो को लूटा। कुछ अंग्रेजो ने उस पर मुकदमा चलाया। बाकी ने इनाम देकर उसको छोड़ दिया। इधर बिचारा नन्दकुमार बंगाली फासी पर चढ़ा दिया गया।' रानी ने प्रश्न किया, 'लखनऊ का अब क्या हाल है ?' नाना ने उत्तर दिया, 'पहले का हाल तात्या बतला गया था। अब तो वहा शून्य है। जनता निस्सन्देह जीवट वाली है।' रानी ने ज़रा सोचकर कहा, 'मैं इन सब बातो को सुनकर इस निष्कर्ष पर पहुची हूं, कि जनता के चित्त का पता अभी पूरा नही लगाया गया। जनता असली शक्ति है। मुझको विश्वास है कि वह अक्षय है। छत्रपति ने जनता के भरोसे ही इतने बड़े दिल्ली सम्राट को ललकारा था। राजाओ के भरोसे नही। मावले, कुणभी किसान थे और अब भी हैं। उनके हलो की मूठ मे स्वराज्य और स्वतन्त्रता की लालसा बँधी रहती है। यहाँ की जनता को भी मै ऐसा ही समझती हू। उसको छत्रपति ने नेतृत्व दिया था। यहा की जनता को तुम दो।' वे दोनो सिर नीचा करके कुछ सोचने लगे। रानी ने अपनी सहेलियो की ओर देख कर कहा, 'तुम लोग क्या कहती हो ?' सुन्दर ने तुरन्त उत्तर दिया, 'मैं सरकार कुणभी हूँ। और क्या कहूँ ? आपकी आज्ञा का पालन करते हुए मरने के समय आगा पीछा नही सोचूगी।'