झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १४१ नाना ने कहा 'तुम ठीक कहती हो बाईसाहब, अभी हम लोग जनता के पास नही पहुंचे हैं। आशा है जनता शीघ्र जाग्रत हो जावेगी, परन्तु वह बिना नेता के कुछ नही कर सकती।' 'नेता को नेता नही ढूंढना पडता।', रानी बोली, 'समर्थ रामदास का आशीर्वाद नेता को तो बिना विलम्ब उत्पन्न कर देता है।' नाना—'मै समझ गया। निराशा का कोई कारण नही।' रानी—'हा, जो साधन जहा मिले उसका उपयोग करना चाहिये। जनता मुख्य साधन है। राजा और नवाब की पीढी, दो पीढी ही योग्य होती है। परन्तु जनता की पीढियो की योग्यता कभी नही छीजती।' नाना—'अब एक प्रश्न और है—यदि तुम्हारा अधिकार लाट के यहाँ से मान्य रहा तो हमको स्वराज्य प्राप्ति के उपायो के जुटाने में सुविधा रहेगी, परन्तु यदि लाट ने न माना, जैसी कि मुझको आशंका है, तब किस प्रकार कार्य साधन होगा?' रानी—'मैं ऐसा क्षण भर भी नही सोचती कि लाट नही मानेगा। नही मानेगा तो मै मनवाऊँगी। झासी राज्य की जनता सोलहआना मेरे साथ है। और यहा की जनसंख्या महाराष्ट्र के मावलो से अधिक ही है कम नही है। बुन्देलखण्ड में ब्राह्मण से लेकर भगी तक हथियार चलाना जानते हैं और हथियार चलाने की हौस रखते हैं।' जिस समय रानी ने यह बात कही उनका चेहरा तेज से दीप्त हो गया उन दोनो पुरुषो के मन में हर्ष की लहर दौड गई। तात्या ने कहा, 'अंग्रेजी सेना के हिन्दू मुसलमान सिपाहियो को भी टटोलू गा।' रानी बोली, 'अभी नही। पहले उनके घरो को टटोलो, जहा उन्होने जननी से जन्म पाया और उसकी गोद में खेले हैं।' नाना ने पूछा, 'यदि लाट का उत्तर हमारे विरुद्ध आया तो क्या तुम तुरन्त युद्ध छेड दोगी?'