भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 154

लक्ष्मीबाई १४३

[ १६ ]

सवेरे की उस कपकपाती ठंड में जब सूर्य भी बदली में मुँह छिपाये था, नवाब अलीबहादुर अपने नौकर पीरअली को साथ लिये हाथी पर सवार एलिस को कोठी पर पहुँचे । जिस भवन में आज कल डिस्ट्रिक्ट जज की कचहरी है, उसी में एलिस रहता था । एलिस अलीबहादुर की हवेली पर जाया करता था । अलीबहादुर एलिस को अपना मित्र मानते हुये भी, उसकी खुशामद करने से नही हिचकते थे । जैसे ही वे हाथी से उतरे, एलिस का नौकर पास दौडता हुआ आया। उन्नीसवी शताब्दि के अन्त में साहब के नौकरो और खानसामो का । जो पद गौरव चरम सीमा को पहुँच गया था, उस समय उसका आरम्भ था । नौकर ने झुककर सलाम किया । अलीबहादुर ने मिठास के साथ पूछा, 'साहब क्या कर रहे हैं ? बहुत उलझन में तो नही है ? मिलना चाहता हू ।' नौकर ने जवाब दिया, 'नही हुजूर । दफ्तर में अभी अभी आकर बैठे हैं । हुक्का पी रहे हैं । फौरन इत्तिला करता हू ।' कुछ क्षण पश्चात् ही नौकर अलीबहादुर को भीतर पहुँचा आया । अभिवादन और कुशल-क्षेम प्रश्नोत्तरी के उपरान्त उन दोनो में बातचीत होने लगी । अलीबहादुर ने कहा, 'रानी साहब की अर्जी का कुछ जवाब नही आया । शायद खारिज हो जावेगी ।' एलिस विचार की मुद्रा बनाकर बोला, 'कह नही सकता । आपका ऐसा ख्याल क्यो है ?' अलीबहादुर ने कहा, 'रियासतो के बुरे इन्तजाम को देखकर और जनता की भलाई की नजर से, सरकार ने कई रजवाडो में अपना अदल, अमन और इन्साफ चालू किया है । इसलिये शायद झाँसी में भी सर- कारी बन्दोवस्त किया जावे ।'